केंद्रीय बजट की असली कमी: भ्रष्टाचार पर निर्णायक प्रहार का अभाव

भारत की आर्थिक प्रगति के बीच केंद्रीय बजट में एक बड़ी कमी दिखती है। बजट में भ्रष्टाचार पर निर्णायक कार्रवाई का अभाव दिखता है। घुसपैठ, टैक्स चोरी, मिलावट और नकली उत्पादों से सरकारी खजाने को भारी नुकसान हो रहा है। यदि भ्रष्टाचार पर सख़्त, त्वरित और निष्पक्ष व्यवस्था लागू हो, तो विकास के लिए कर्ज़ की आवश्यकता ही न पड़े। यही बजट सुधार की असली दिशा हो सकती है।

Jan 8, 2026 - 12:06
Jan 9, 2026 - 13:53
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केंद्रीय बजट की असली कमी: भ्रष्टाचार पर निर्णायक प्रहार का अभाव

-डॊ. (लेफ्टिनेंट कर्नल) राजेश चौहान-

भारत की निरंतर आर्थिक प्रगति ने पूरे विश्व को चकित कर दिया है। आज भारत दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है, जो निस्संदेह एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। इस आर्थिक शक्ति का प्रभाव बैंकिंग, शेयर बाज़ार, शिक्षा, परिवहन, औद्योगिक विकास, रक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, पर्यावरण संरक्षण, जल प्रबंधन, आजीविका सुधार, महिला एवं वृद्ध पेंशन जैसे लगभग हर क्षेत्र में दिखाई देता है। कभी सोने की चिड़िया कहलाने वाला भारत एक बार फिर उसी दिशा में अग्रसर प्रतीत होता है।

लेकिन इसी प्रगति के बीच कुछ ऐसे मूल प्रश्न हैं, जिन पर केंद्रीय बजट मौन दिखाई देता है। आज यह सर्वविदित है कि बड़ी संख्या में बांग्लादेशी, रोहिंग्या और पाकिस्तानी घुसपैठिये भारत में अवैध रूप से रह रहे हैं। विडंबना यह है कि उनके पास ऐसे सभी दस्तावेज हैं, जो उन्हें काग़ज़ों में भारतीय सिद्ध कर देते हैं। यह भी कोई रहस्य नहीं कि ये दस्तावेज़ भ्रष्ट सरकारी तंत्र की देन हैं। बावजूद इसके, न तो इन भ्रष्ट कर्मचारियों पर सख़्त कार्रवाई होती है और न ही जवाबदेही तय होती है। यहीं से सुधार की असली शुरुआत होनी चाहिए।

प्रश्न उठता है कि क्या केंद्रीय बजट एक ऐसे स्वतंत्र और शक्तिशाली भ्रष्टाचार उन्मूलन मंत्रालय की नींव रख पाएगा, जो छोटे-बड़े हर स्तर के भ्रष्टाचार पर त्वरित और कठोर कार्रवाई करे? क्या ऐसा प्रावधान संभव नहीं कि भ्रष्टाचार में लिप्त सरकारी या अर्ध-सरकारी कर्मचारी को तुरंत बर्खास्त किया जाए और वर्षों तक अदालतों में मामला घसीटने का रास्ता ही बंद कर दिया जाए?

इसी तरह जीएसटी चोरी एक गंभीर समस्या बन चुकी है। हर कुछ महीनों में दस करोड़ से लेकर सैकड़ों-हजारों करोड़ रुपये के घोटाले सामने आते हैं। यह वही धन है, जिससे गांव-कस्बों में आधुनिक स्कूल, अस्पताल और बुनियादी सुविधाएं खड़ी हो सकती हैं। लेकिन यह पैसा कुछ लोगों की जेब में चला जाता है और सरकार को फिर कर्ज़ लेकर योजनाएं चलानी पड़ती हैं, जिस पर ब्याज का अतिरिक्त बोझ भी जनता ही उठाती है। क्यों न जीएसटी चोरी पर ऐसी सख़्त व्यवस्था हो कि पहले पूरी राशि जमा हो, फिर दंड और सजा तय हो, और कानूनी बचाव के अनावश्यक रास्ते बंद हों?

इनकम टैक्स, सेल्स टैक्स, मनोरंजन कर जैसे सभी राजस्व स्रोतों की चोरी पर भी इसी प्रकार कठोर और त्वरित दंडात्मक प्रावधान आवश्यक हैं। विशेषकर उन सरकारी कर्मचारियों के लिए, जो ऐसे अपराधों में सहयोगी बनते हैं, ताकि वे पूरे तंत्र के लिए चेतावनी बन सकें।

मिलावट, घटतौली और नकली उत्पाद, दूध, घी, तेल, दवाइयां, पेट्रोल-डीज़ल, आज आम जीवन का ज़हर बन चुके हैं। कानून मौजूद हैं, एजेंसियां भी हैं, लेकिन जांच की जटिल प्रक्रिया और ढिलाई के कारण अपराधी बेखौफ रहते हैं। नकली दवाइयों से लेकर मिलावटी ईंधन तक, घटनाएं सामने आती हैं, पर मिसाल बनने लायक सज़ा शायद ही कहीं दिखती है।

मोदी सरकार वर्षों से भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़ी मुहिम की बात करती रही है, लेकिन आम नागरिक को ज़मीनी स्तर पर उसका प्रभाव सीमित ही दिखाई देता है। ऑनलाइन फ्रॉड, नकली नोट, फर्जी स्टांप, मिलावट, सब कुछ जारी है। आज आम आदमी भी जानता है कि सरकारी धन का बड़ा हिस्सा भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है। यदि यही धन बचा लिया जाए, तो न बजट में कमी रहेगी और न ही विकास के लिए कर्ज़ का सहारा लेना पड़ेगा।

असल जरूरत इस बात की है कि बजट केवल योजनाओं और आंकड़ों तक सीमित न रहे, बल्कि भ्रष्टाचार की जड़ पर सीधा, कठोर और निर्णायक प्रहार करे। तभी भारत की आर्थिक शक्ति का वास्तविक लाभ देश और समाज तक पहुंचेगा।

SP_Singh AURGURU Editor