नदियां कराह रही हैं, आस्था सवालों में- अब रस्म नहीं, जिम्मेदारी निभाने का समय

देश में जल स्रोतों और आसपास के पर्यावरण में फैलते कचरे के लिए सामाजिक उदासीनता, जवाबदेही की कमी और भ्रष्टाचार को मुख्य वजहें हैं। स्वच्छता योजनाएं और सरकारी प्रयास मौजूद हैं, लेकिन उनके क्रियान्वयन और निगरानी में गंभीर कमी है। जन-जागरूकता, शिक्षा, मीडिया की भूमिका, धार्मिक संस्थाओं के सहयोग और सख़्त प्रशासनिक कार्रवाई का समय आ गया है। उद्देश्य यही होना चाहिए कि कचरा आम जनजीवन का बोझ न बने और जल स्रोत भविष्य के लिए सुरक्षित रहें।

Dec 20, 2025 - 12:23
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नदियां कराह रही हैं, आस्था सवालों में- अब रस्म नहीं, जिम्मेदारी निभाने का समय

-डॊ. (लेफ्टिनेंट कर्नल) राजेश चौहान-

आज केवल नदियां ही नहीं, बल्कि नाले, तालाब, पोखर, बावड़ी, कुएं, झरने और यहां तक कि समुद्र का जल भी कचरे से दूषित हो चुका है। यह दूषण मीलों तक फैल गया है। इसका मूल कारण एक ही है, हमारी उदासीनता। हमें फर्क ही नहीं पड़ता कि आसपास क्या होता जा रहा है। समयाभाव के नाम पर परिवार संस्कार देना छोड़ चुका है और स्कूलों के पास भी अन्य जिम्मेदारियां गिना दी जाती हैं। रोक-टोक का अभाव ऐसा है कि जहां मन किया, वहीं कचरा फेंक दिया। जिम्मेदार और जवाबदेह लोगों के पास भी और जरूरी काम हैं।

स्वच्छ भारत अभियान चल रहा है। जहां कचरा गाड़ी समयबद्ध तरीके से आती है, वहां सफाई दिखती है। लेकिन बाकी स्थानों पर लोग चोरी-छिपे, इधर-उधर कचरा फेंकते हैं और आगे भी फेंकते रहेंगे। निरीह जानवर वही कचरा खाते नजर आते हैं। ऐसा नहीं कि सरकार ने उनके आश्रय और भरण-पोषण की योजनाएं नहीं बनाई हैं, लेकिन पहले अपना ही प्रबंध सुनिश्चित करना प्राथमिकता बन चुका है। योजनाएं अनेक हैं, पर वे सही ढंग से चल रही हैं या नहीं, यह सुनिश्चित कौन करेगा?

भ्रष्टाचार की भेंट न जाने कितनी योजनाएं और जनहित के मुद्दे चढ़ चुके हैं और यह सिलसिला थमा नहीं है। फैक्ट्रियों और उद्योगों से निकलने वाले दूषित जल और कचरे का निस्तारण वास्तव में कैसे होता है, क्या इसकी समय-समय पर निष्पक्ष जांच होती है? या फिर केवल कागजी औपचारिकता? क्या कहीं यह दूषित जल सीधे ज़मीन के भीतर नहीं उतारा जा रहा, या बिना उपचार नालों, नदियों और समुद्र में नहीं छोड़ा जा रहा?

प्रधानमंत्री की योजना से हर घर में शौचालय बने। आज भी उन्हें ही उपयोग में लाया जाना चाहिए। लेकिन यदि सुबह-शाम जमीनी हकीकत देखी जाए तो खुले में शौच पूरी तरह बंद नहीं हुआ है, केवल थोड़ा कम हुआ है। कचरे के ढेर आज भी जगह-जगह लगे हैं और अनेक लोग नाक-आंख बंद कर उन्हीं के बीच जीवन जीने को मजबूर हैं।

जहां कचरा होगा, वहां बीमारियां होंगी। मक्खियां और कीटाणु पनपेंगे। स्वास्थ्य बजट अनावश्यक रूप से बढ़ता जाएगा। न जाने वह दिन कब आएगा, यदि कभी आया तो, जब आम जनजीवन में कचरा बोझ न लगे।

क्या इससे निजात पाने के उपाय हैं? हां, बिल्कुल हैं। टीवी और मीडिया को लगातार कचरे के सही निस्तारण पर जागरूकता फैलानी चाहिए। स्कूलों में सप्ताह में एक बार केवल पांच मिनट बच्चों को यह सिखाया जाए। आंगनवाड़ी केंद्र, ग्राम पंचायत और नगर निकाय प्रतिदिन केवल दस मिनट इस विषय पर ध्यान दें। जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग अपनी जिम्मेदारी निभाएं, अन्यथा उनके विरुद्ध त्वरित कार्रवाई की व्यवस्था हो।

घपले और भ्रष्टाचार समाप्त हों। आवश्यकता पड़े तो केंद्र और सभी राज्यों में अलग से भ्रष्टाचार निवारण मंत्रालय बने, जहां त्वरित निर्णय हों और जिन्हें वर्षों तक अदालतों में न घसीटा जा सके।

देश के सभी धर्मों के धर्मगुरु एक स्वर में यह समझाएं कि देशहित में क्या उचित है। कई लोग आज भी मूर्ति विसर्जन और धार्मिक सामग्री को नदियों-नालों व जल स्रोतों में प्रवाहित करना ही धर्म मानते हैं। आगरा के पर्यावरणप्रेमी बृज खंडेलवाल ने वर्षों पूर्व सरकार से आग्रह किया था कि मूर्तियों और कचरे का सीधे जलधारा में विसर्जन रोका जाए। उन्होंने सुझाव दिया था कि अलग-अलग छोटे जलकुंड बनाए जाएं, जहां यह सामग्री विसर्जित की जा सके, जिससे नदियां और जल स्रोत सुरक्षित रहें।

प्रधानमंत्री से भी विनम्र निवेदन किया जाना चाहिए कि वे मन की बात कार्यक्रम में इस विषय पर देश को संबोधित करें। इसका व्यापक सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा और राष्ट्र का भला होगा।

सभी ग्राम और नगर पंचायतें हर सप्ताह अपने क्षेत्र का निरीक्षण कर सार्वजनिक प्रमाण-पत्र जारी करें कि उनके इलाके में कचरा नहीं है और जल स्रोत स्वच्छ हैं। समुद्र तट और समुद्र में कचरा न फैले, यह जिम्मेदारी कोस्ट गार्ड को निभानी चाहिए और उन्हें दंडात्मक कार्रवाई के अधिकार भी दिए जाने चाहिए।

जब सबका साथ होगा, तभी हालात सुधरेंगे। आखिर भारत चाहता क्या है?

SP_Singh AURGURU Editor