श्रीकृष्ण जन्माष्टमीः एकल परिवार और आधुनिकता की मार में परंपराएं

  कृष्ण जन्माष्टमी पहले सामूहिक उल्लास, झांकियों और घर-घर की तैयारियों का पर्व था। लेकिन एकल परिवार और पाश्चात्य प्रभाव के चलते यह उत्सव अब सिमटकर बाजार और होटल-रेस्टोरेंट की थालियों तक सीमित हो गया है। समय की यह मार परंपराओं को धीरे-धीरे खोखला कर रही है।

Aug 16, 2025 - 22:50
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श्रीकृष्ण जन्माष्टमीः एकल परिवार और आधुनिकता की मार में परंपराएं

कृष्ण जन्माष्टमी केवल भारत ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व में बसे सनातनियों के लिए हर्ष और भक्ति का उत्सव है। यह त्योहार केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि विश्व कल्याण और मंगल की कामना का प्रतीक है। उत्तर भारत में इस उत्सव की तैयारी कई बार दस दिन पहले से शुरू हो जाती है। हर सनातनी परिवार अपने इष्ट लाला के जन्म को उत्सव की तरह मानकर भक्ति, उल्लास और सांस्कृतिक परंपराओं के संग इसे मनाता है।

25 साल पहले तक की झलकियां याद आती हैं

आगरा समेत समूचे ब्रज में सन् 2000 तक इस उत्सव की एक अलग ही छटा हुआ करती थी। घर-घर में बूढ़े-बच्चे सभी जन्मोत्सव की तैयारी में भाग लेते थे। सजावट, झांकियां, हिंडोले, पकवान और संस्कार, सब मिलकर यह आयोजन एक अनूठी पाठशाला जैसा बनाते थे।
शहर के कोने-कोने में कृष्ण वासुदेव के जन्म की झांकियां सजती थीं, जिनमें पहाड़, गुफाएं, यमुना और जेल की झलकियां बनाई जाती थीं। बर्फ और रंग-बिरंगी रोशनी से सजा आकाश, बाल-हृदय में अद्भुत आकर्षण जगाता था।

बदलता समय और एकल परिवार का असर

पाश्चात्य प्रभाव और न्यूक्लियर फैमिली (एकल परिवार) के बढ़ते प्रचलन ने त्योहारों की सामूहिकता को गहरी चोट दी है। अब त्योहार महज चार से छह घंटे का आयोजन रह गए हैं।
जहां पहले महिलाएं घर पर पकवान, पंजीरी और छप्पन भोग तैयार करती थीं, वहीं अब यह जिम्मेदारी हलवाई और मिष्ठान विक्रेताओं ने अपने हाथ में ले ली है। होटल्स और रेस्टोरेंट्स भी व्रत-उपवास के बाद फास्ट फूड थाली और फलों की थाली उपलब्ध कराने लगे हैं।

जन्माष्टमी के बदलते स्वरूप

पहले हर परिवार में परिवार के सभी सदस्य आधी रात 12 बजे श्रीकृष्ण जन्म की प्रतीक्षा करते थे। बच्चे हिंडोले और बाजार में नए खिलौने देखने जाते। अब फ्लैट कल्चर और सुविधानुसार जीवन ने यह परंपरा बदल दी है। लोग अपनी सुविधा अनुसार कान्हा का जन्म कर लेते हैं। कुछेक परिवार आज भी 12 बजे पूजा करते हैं, लेकिन खीरे में वासुदेव का जन्म कराने की परंपरा लगभग विलुप्त हो चुकी है।
मंदिरों की भव्य झांकियों और भीड़-भाड़ वाले हिंडोलों की जगह अब कॉलोनियों और बिल्डिंग परिसर के छोटे-छोटे मंदिरों में साधारण पूजन हो रहा है। यहां तक कि आरती भी अब मोबाइल पर यू ट्यूब भजन से गा ली जाती है।

‘हे प्रभु श्रीकृष्ण! हम एकल परिवार की विवशताओं में बंधे लोग हैं। हमें क्षमा करना।‘

-राजीव गुप्ता, जनस्नेही कलम से
लोक स्वर, आगरा।

SP_Singh AURGURU Editor