'नेकी कर दीवार के पीछे डाल'!
एक कहावत है नेकी कर दरिया में डाल। लेकिन आगरा में लोग नेकी को दरिया में नहीं दीवार के पीछे डाल रहे हैं। लगभग 4 साल पहले आगरा की हरीपर्वत क्रॉसिंग पर लोगों ने नेकी की दीवार शुरू की थी। इस दीवार का उद्देश्य था कि जिसके पास ज्यादा है वो यहां दे जाए और जिसके पास कम है वो यहां से ले जाए। मतलब गरीब लोगों को कपड़े मिल सकें, लेकिन शर्त थी कि कपड़े साफ-सुथरे हों, शुरूआत में ऐसा हुआ भी। मगर अब यह उद्देश्य भटक गया है।
पहले लोग घरों में जो कपड़े इस्तेमाल नहीं करते थे वो यहां डालकर जाते थे लेकिन अब वे कपड़ों के नाम का कचरा और साथ में दूसरा कचरा भी फेंक कर चले जाते हैं। पहले कपड़े साफ—सुथरे होते थे तो गरीब लोग भी छंटनी करने पहुंचते थे लेकिन अब गंदे कपड़े और कचरा देख नगर निगम की गाड़ी भले उठा ले जाए गरीब तो यहां नहीं आते। ऐसे में शहर के लोगों का नेकी की दीवार के पीछे का उद्देश्य भले ही नेक रहा हो। लेकिन इस उद्देश्य को कुछ लोगों ने खराब कर दिया है।
अब यहां कपड़े कूड़े की तरह जमा हो जाते हैं। दिवाली के समय तो यह और भी अधिक होता है। वो तो थाना बराबर से है और पुलिस की मौजूदगी है तो समय—समय पर यहां सफाई करा दी जाती है अगर ऐसा किसी और जगह होता तो संभव है कि गंदगी का अंबार लग गया होता और एक नया डलाबघर विकसित हो जाता।
अभी दिवाली का समय है। हर घर में साफ सफाई हो रही है और लोग अपने इस्तेमाल किए गए कपड़ों को नेकी की दीवार के पीछे की साइड फेंक कर चले जा रहे हैं। उसमें ऐसे भी कपड़े हैं जो पहनने के लायक भी नहीं है। कपड़ों की तादाद इतनी ज्यादा हो जाती है कि कूड़े का ढेर जैसा लग जाता है। कई बार कचरे के साथ में अच्छे कपड़े भी खराब हो जाते हैं या नगर निगम के वाहन में फिंक जाते हैं।
हालांकि यह भी सच है कि नेकी की दीवार का उद्देश्य अच्छा था और इस उद्देश्य को बरकरार रखना हम सभी की जिम्मेदारी है। मगर चंद लोग इस उद्देश्य को भी खराब कर रहे हैं। अगर खराब चीजें या कपड़े यहां न फेंके जाएं तो उनके साथ मिलकर अच्छे कपड़े भी खराब नहीं होंगे। गरीब लोग यहां आकर आसानी से छंटनी कर सकेंगे।