जयंती पर विशेषः चौधरी चरण सिंह को जैसा मैंने देखा और जाना
आज (23 दिसंबर 2024) को देश पूर्व प्रधानमंत्री और भारत रत्न चौधरी चरण सिंह का उनकी 122वीं जयंती पर स्मरण कर रहा है। इसी मौके पर ओमान के ट्रेड कमिश्नर और शिक्षाविद प्रो. (डॊ.) केएस राना ने चौधरी चरण सिंह से जुड़ी कुछ यादें ताजा की हैं। प्रो. राना उन सौभाग्यशाली लोगों में से एक रहे हैं, जिन्हें चौधरी चरण सिंह का सानिध्य मिला।
मुलायम सिंह यादव की जीवन रक्षा के लिए सब कुछ किया
इटावा के केके कॊलेज में छात्र जीवन में कभी मुलायम सिंह यादव और बलराम सिंह यादव अभिन्न मित्रों में रहे। हॊस्टल में साथ-साथ रहे। छात्र संघ चुनाव में एक-दूसरे के सहयोगी भी रहे, लेकिन बाद में राजनीतिक विचारधारा के आधार पर दोनों की राहें जुदा हो गईं। बलराम सिंह यादव कांग्रेस में सक्रिय हुए तो मुलायम सिंह यादव ने डॊ. राम मनोहर लोहिया की विचारधारा से प्रभावित होकर समाजवाद का रास्ता चुना। मैनपुरी के चौधरी नत्थू सिंह के आशीर्वाद से वे राजनारायण के झंडावरदार भी बन गए। छोटी सी उम्र में 1967 में विधायक चुन लिए गए।
बाद में राजनीतिक महत्वाकांक्षा के टकराव ने बलराम सिंह यादव और मुलायम सिंह यादव के रिश्तों को खूनी जंग के मुहाने पर ला खड़ा किया। उधर 1974 में चौधरी चरण सिंह ने लोकदल का गठन किया तो मुलायम सिंह भी उनके सम्पर्क में आ गए। 1980 का चुनाव मुलायम सिंह यादव हार गए थे। इसके बाद बलराम सिंह यादव ने उन पर अनेक आपराधिक मुकदमे आरोपित करा दिए। हालात मुलायम सिंह यादव के विपरीत थे। तब चौधरी चरण सिंह ने मुलायम सिंह यादव को विधान परिषद में भेज दिया था।
इसके बाद शुरू हुआ था यादवी गैंगवार (बलराम सिंह यादव और मुलायम सिंह का टकराव), जिसकी गूंज उस समय दिल्ली लखनऊ तक पहुंचती थी। इन घटनाओं से चौधरी चरण सिंह को मुलायम सिंह यादव के जीवन को लेकर चिंता होने लगी थी। तब उन्होंने तत्कालीन विधान परिषद के कार्यवाहक सभापति शिव प्रसाद गुप्त को दिल्ली बुलाकर उनसे कहा कि मुलायम सिंह यादव की जान को खतरा है। मुझे इसकी सुरक्षा चाहिए। आप कोई युक्ति निकालकर इसे विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष बनवा दें तो इसका (मुलायम सिंह यादव) का जीवन सुरक्षित हो सकता है।
तब शिव प्रसाद गुप्त ने चौधरी साहब को युक्ति बताई थी कि इस समय सदन में संख्या आधी से भी कम है। केवल दो सदस्य लोकदल से जुड़ जाएं तो मैं निर्णय कर दूंगा। उस समय चौधरी साहब के दामाद गुरुदत्त सोलंकी (खेरागढ़, आगरा) विधान परिषद में निर्दलीय रूप में थे। उनसे नाराजगी के चलते स्वयं चौधरी चरण सिंह ने ही उन्हें पार्टी से निकाल दिया था। पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं को भेजकर चौधरी साहब ने गुरुदत्त सोलंकी को फिर से पार्टी में शामिल कराया।
सदन के दूसरे सदस्य बलवीर सिंह दबथुआ मेरठ से शिक्षक सीट के एमएलसी थे। इसी दरम्यान चौधरी चरण सिंह एक दिन मसूरी से लौटते समय रात के समय मेरठ में अचानक दबथुआ के घर पर जा पहुंचे। दबथुआ ने गेट खोला और सामने चौधरी साहब को खड़े देख पानी-पानी हो गए। चौधरी साहब ने घर में प्रवेश करते हुए दबथुआ से कहा, भैया तुमको मैंने रात में परेशान किया। मैं बड़े कष्ट में हूं, इसका निदान तुम कर सकते हो। मुझे वचन दो, मेरी बात मानोगे।
दबथुआ ने वचन दिया तो चौधरी साहब ने लोकदल सदस्यता का फार्म मंगाकर उनकी तरफ बढ़ाया और बोले, तुम एक महीने को सदन में लोकदल के एसोसिएट मेंबर बन जाओ। नेता प्रतिपक्ष का चुनाव हो जाए तो भले ही वापस लौट जाना। चौधरी साहब ने यह भी कहा, मैं दबाव नहीं दे रहा। आज हमारे लड़के (मुलायम सिंह यादव) की जान खतरे में है, अतः मैं उसे नेता प्रतिपक्ष बनवाकर सुरक्षित करना चाहता हूं।
एमएलसी दबथुआ ने तत्काल सदस्यता फार्म पर हस्ताक्षर कर दिए। मुलायम सिंह यादव नेता प्रतिपक्ष चुन लिए गए। इस प्रकार चौधरी साहब ने उत्तर प्रदेश में अपना उत्तराधिकार निर्विघ्न रूप से मुलायम सिंह यादव को सौंपने की ओर एक कदम बढ़ा दिया था। अंततः 80 के दशक में यूपी में अपना उत्तराधिकार मुलायम सिंह यादव को सौंपते हुए उन्हें पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बना दिया। 1985 में राजेंद्र सिंह को हटाकर मुलायम सिंह यादव को विधान सभा में भी नेता प्रतिपक्ष बनाया। यह चौधरी चरण सिंह की दूरदृष्टि ही थी कि दूसरी श्रेणी में कौन कहां नेतृत्वकर्ता होगा।
उदयन शर्मा को आगरा से चुनाव लड़ाकर रिश्ते निभाए
पंडित श्रीराम शर्मा स्वाधीनता सेनानी के साथ चौधरी चरण सिंह के छात्र जीवन से ही निकट संबंधों में रहे थे। इन संबंधों में प्रगाढ़ता उनके पुत्रों प्रो. रमेश कुमार शर्मा (कश्मीर यूनिवर्सिटी) और उदयन शर्मा (तत्कालीन संपादक रविवार, आनंद बाजार पत्रिका) ने भी बना रखी थी।
चौधरी चरण सिंह जब केंद्र की राजनीति में पहुंचे तो उदयन शर्मा ने चौधरी साहब को मीडिया में पूरा सहयोग किया। वे चौधरी साहब की ईमानदारी से बहुत प्रभावित थे। राजनीतिक लॊबिंग का कार्य भी करते थे। चूंकि उदयन शर्मा की गिनती देश के जाने-माने पत्रकारों में थी, अतः सभी दलों के शीर्ष नेताओं में उनके निकटतम सम्पर्क बने रहते थे।
1984 के लोकसभा चुनाव के द्वारा राजनीति की नई पारी की शुरुआत करने हेतु चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व में देश में एक नई टीम तैयार हो रही थी। इसमें शरद यादव, लालू यादव, रामविलास पासवान, नीतीश कुमार (बिहार), कुं. यदुनाथ सिंह, मोहन प्रकाश, डॊ. चंद्रभान (राजस्थान), मुलायम सिंह यादव, केसी त्यागी, बेनी प्रसाद वर्मा, सतपाल मलिक, मोहन सिंह, आरिफ मोहम्मद, रसीद मसूद, राजेंद्र चौधरी, हरेंद्र मलिक, किरन पाल सिंह, आजम खान आदि उत्तर प्रदेश से थे।
लोकसभा चुनाव के लिए प्रत्याशियों के चयन हेतु दलित मजदूर किसान पार्टी (दमकिपा, अब राष्ट्रीय लोकदल) की बैठकें सभी प्रदेशों में चल रही थीं। उत्तर प्रदेश में आगरा की लोकसभा सीट महत्वपूर्ण होने के नाते पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव एवं नेता प्रतिपक्ष राजेंद्र सिंह को विशेष निर्देश चौधरी चरण सिंह ने जारी किए थे कि आगरा का सदेश पूरे देश में जाएगा, अतः अच्छा जिताऊ प्रत्याशी खोजो।
आगरा सीट पर वैश्य, पिछड़े एवं मुस्लिम समुदाय की ज्यादा संख्या होने के कारण इन दोनों नेताओं ने प्रदेश में सहमति बनाते हुए शिव प्रसाद गुप्त (तत्कालीन उप सभापति विधान परिषद), तत्कालीन नगर अध्यक्ष आनंद प्रकाश जैन तथा हाजी इस्लाम कुरैशी के नाम संसदीय बोर्ड के पास प्रस्तावित सूची में भेजे।
मैं (लेखक डॊ. केएस राना) उस समय युवा लोकदल का कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष था। आगरा में लोकदल को प्रभावी बनाने की रणनीति पर साथियों से चर्चा की। वरिष्ठ पत्रकार उदयन शर्मा के बल्का बस्ती आवास पर उनसे मुलाकात की। दो घंटे की मशक्कत के बाद उदयन शर्मा को आगरा से लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए तैयार किया। उदयन शर्मा को तैयार करने में पत्रकार मित्र राजीव शुक्ला, डॊ. हर्षदेव, राजीव सक्सेना और अनुराग शुक्ला ने भी सहयोग किया।
उदयन शर्मा इस शर्त के साथ तैयार हुए कि वह स्वयं अपनी ओर से चौधरी साहब से कुछ नहीं कहेंगे। पार्टी की ओर से ऒफर दिया जाए। इसी समय यह तय हुआ कि इस बात को डॊ. केएस राना, राजेंद्र सिंह को साथ लेकर चौधरी साहब के समक्ष रखेंगे। इसके बाद मैंने (डॊ. राना) राजेंद्र सिंह से मुलाकात की और उदयन शर्मा को प्रत्याशी बनाने पर चर्चा की। आगरा को वैश्यों की राजधानी बताकर राजेंद्र सिंह पहले तो इसके लिए तैयार नहीं थे, लेकिन बाद में मान गए और मुलायम सिंह यादव को इसके लिए तैयार करने को कहा। मुलायम सिंह यादव से बात की गई तो उन्होंने तत्काल इस पर हामी भर दी।
इसके बाद शरद यादव, राजेंद्र सिंह और मुलायम सिंह यादव की मौजूदगी में मैंने चौधरी साहब के समक्ष आगरा सीट को लेकर उदयन शर्मा के नाम का प्रस्ताव किया। चौधरी साहब ने बगैर देरी किए इस पर सहमति जता दी। इस प्रकार पत्रकार उदयन शर्मा को आगरा से लोकसभा का चुनाव लड़ाकर चौधरी साहब ने पं. श्रीराम शर्मा के साथ के एक रिश्ते को निभाया।