सुप्रीम कोर्ट ने फुटपाथों को दिया मौलिक अधिकार का दर्जा, दो माह में राज्यों को करनी होगी कार्रवाई
आगरा। सुप्रीम कोर्ट ने देश के करोड़ों पैदल यात्रियों के जीवन से जुड़ा ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा है कि साफ, सुरक्षित और दिव्यांग-समर्थ फुटपाथों पर चलना अब हर नागरिक का मौलिक अधिकार है, जिसे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार में शामिल किया गया है।
इस जनहित याचिका की पैरवी आगरा के युवा उद्यमी और सामाजिक कार्यकर्ता हेमंत जैन ने की, जिनकी ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता केसी जैन ने सुप्रीम कोर्ट में प्रभावी बहस की। याचिका में देशभर में फुटपाथों की दुर्दशा, अतिक्रमण और दिव्यांगों के लिए उनकी अनुपलब्धता की ओर न्यायालय का ध्यान खींचा गया था।
न्यायमूर्ति ए.एस. ओका और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुआन की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि सभी राज्य सरकारों और केंद्रशासित प्रदेशों को दो महीने के भीतर यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके नगरों और गांवों में पैदल चलने वालों के लिए साफ, अतिक्रमण-मुक्त और दिव्यांग-समर्थ फुटपाथ उपलब्ध हों।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या-क्या कहा?
-सभी सार्वजनिक सड़कों पर उपयुक्त फुटपाथ बनाएं।
-फुटपाथों से अतिक्रमण हटाना अनिवार्य।
-दिव्यांगजनों के लिए फुटपाथ हो सुगम्य।
-केंद्र और राज्य सरकारें नीति बनाकर 2 महीने में रिपोर्ट दाखिल करें।
-बंबई हाईकोर्ट के दिशा-निर्देशों को आदर्श मानकर पूरे देश में अपनाया जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से यह भी पूछा कि पैदल यात्रियों के अधिकारों की रक्षा के लिए क्या नीति मौजूद है। न्यायालय ने यह भी कहा कि फुटपाथों की गैरमौजूदगी में गरीब, बुज़ुर्ग, बच्चे और दिव्यांगजन सड़कों पर चलने को मजबूर होते हैं, जिससे उनका जीवन खतरे में पड़ता है। यह केवल यातायात का नहीं, बल्कि जीवन के अधिकार का सवाल है।
यह ऐतिहासिक निर्णय उन लाखों नागरिकों के लिए उम्मीद की एक नई किरण है, जो आज तक बुनियादी ढांचे के अभाव में जान जोखिम में डालकर सड़कों पर चलते रहे हैं।