हिरासत में मौत पर सिस्टम कटघरे में: राजू गुप्ता केस में मानवाधिकार आयोग का अल्टीमेटम नजदीकी रिश्तेदार खोजो और उसे पांच लाख मुआवजा दो, कोर्ट से एक दरोगा और शिकायतकर्ता को सजा मिल चुकी है
आगरा। सिकंदरा पुलिस हिरासत में हुई राजू गुप्ता की मौत के मामले में जहां अदालत ने एक दरोगा और शिकायतकर्ता को दोषी ठहराते हुए सख्त सजा सुना दी है, वहीं अब मानवाधिकार आयोग ने मृतक के नजदीकी रिश्तेदारों की तलाश कर उन्हें पांच लाख रुपये मुआवजा देने के निर्देश जारी किए हैं। हैरानी की बात यह है कि पुलिस की रिपोर्ट में मृतक का कोई करीबी रिश्तेदार सामने नहीं आया है, जिससे मुआवजा प्रक्रिया अटक गई है।
राजू गुप्ता की पुलिस हिरासत में मौत का मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। इस मामले में न्यायालय ने पुलिस की भूमिका को दोषी मानते हुए दरोगा अनुज सिरोही को 10 वर्ष और शिकायतकर्ता अंशुल प्रताप सिंह को 7 वर्ष की सजा पहले ही सुना दी है। यह मामला तब सामने आया था जब वर्ष 2018 में मानवाधिकार कार्यकर्ता एवं अधिवक्ता नरेश पारस ने इसे राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के समक्ष उठाया था। राजू की मौत का मामला सामने आने पर स्थानीय वैश्य समाज ने भी सड़कों पर उतरकर विरोध जताया था।
आयोग के हस्तक्षेप के बाद मामले की विवेचना सीआईडी को सौंपी गई थी। जांच के दौरान कई गंभीर तथ्य सामने आए, जिसके बाद अदालत ने कड़ी कार्रवाई करते हुए दोषियों को सजा दी।
इस बीच, मृतक के परिजनों को मुआवजा देने का मुद्दा भी प्रमुख बना हुआ है। 25 नवंबर 2024 के आदेश के अनुपालन में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 5 लाख रुपये मुआवजे की संस्तुति की गई थी। 4 जून 2025 को अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त (प्रोटोकॉल/नोडल अधिकारी, मानवाधिकार) द्वारा एक रिपोर्ट प्रस्तुत की गई, जिसमें बताया गया कि मृतक की मां रेनू गुप्ता का निधन हो चुका है और फिलहाल कोई अन्य नजदीकी रिश्तेदार चिन्हित नहीं हो सका है।
यही वजह है कि मुआवजा अब तक किसी को नहीं दिया जा सका है। इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए मानवाधिकार आयोग ने 28 जनवरी को जिलाधिकारी और एसएसपी (वर्तमान में पुलिस कमिश्नर) आगरा को निर्देश जारी किए हैं कि वे मृतक राजू गुप्ता के नजदीकी रिश्तेदारों का पता लगाएं और चार सप्ताह के भीतर आयोग को रिपोर्ट सौंपें।
आयोग ने साफ चेतावनी दी है कि यदि तय समय में रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं की गई तो मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम 1993 की धारा 13 के तहत दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी, जिसमें संबंधित अधिकारियों की व्यक्तिगत उपस्थिति भी सुनिश्चित की जा सकती है।
इस पूरे मामले को उजागर करने वाले मानवाधिकार कार्यकर्ता एवं अधिवक्ता नरेश पारस ने कहा कि मृतक के नजदीकी रिश्तेदारों को खोजने का प्रयास किया जा रहा है और शीघ्र ही आयोग को रिपोर्ट सौंपी जाएगी। उन्होंने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि पुलिस हिरासत में लोगों के साथ अमानवीय व्यवहार और यातनाएं लगातार बढ़ रही हैं, जो बेहद चिंताजनक है।
उन्होंने कहा कि कार्रवाई के बावजूद पुलिस के व्यवहार में अपेक्षित सुधार नहीं दिख रहा है। ऐसे में जरूरी है कि पुलिस न केवल कानून का पालन करे, बल्कि मानवाधिकारों का भी सम्मान सुनिश्चित करे।
यह मामला न सिर्फ एक व्यक्ति की मौत का है, बल्कि पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े करने वाला है कि आखिर हिरासत में सुरक्षा की गारंटी कब सुनिश्चित होगी और पीड़ितों को न्याय मिलने में इतनी देरी क्यों हो रही है।