बाईपास और ओपन सर्जरी के बिना भी संभव इलाज, आगरा में हृदय रोग विशेषज्ञों का राष्ट्रीय मंथन

आगरा इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजी सोसाइटी के तत्वावधान में होटल जेपी पैलेस में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन ‘कार्डियोलॉजी आगरा लाइव 6.0’ के पहले दिन देशभर के करीब 450 डेलीगेट्स ने हिस्सा लिया। 20 तकनीकी सत्रों में हार्ट फेलियर, एंजियोप्लास्टी, TAVR, MitraClip, हृदय-किडनी संबंध और आधुनिक दवाओं पर चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने बताया कि नई इंटरवेंशनल तकनीकों से चुनिंदा हाई-रिस्क मरीजों का भी बिना ओपन सर्जरी उपचार संभव हो रहा है। पद्मश्री डॉ. दलजीत सिंह गंभीर को लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड दिया गया। 25 अक्टूबर को होटल हॉलीडे इन में मेडिकल छात्रों के लिए इकोकार्डियोग्राफी की विशेष व्यावहारिक वर्कशॉप आयोजित होगी।

Oct 24, 2026 - 19:12
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बाईपास और ओपन सर्जरी के बिना भी संभव इलाज, आगरा में हृदय रोग विशेषज्ञों का राष्ट्रीय मंथन
होटल जेपी पैलेस में कार्डियोलॉजी आगरा लाइव 6.0 का दीप जलाकर शुभारंभ करते पद्मश्री डॉक्टर डीके हाजरा।

कार्डियोलॉजी आगरा लाइव 6.0 में हाई-रिस्क मरीजों के उपचार, नई दवाओं और हृदय-किडनी के संबंध पर हुई चर्चा

आगरा। हृदय रोगों के इलाज में तेजी से विकसित हो रही आधुनिक तकनीकों, नई दवाओं और मरीजों की सुरक्षा को लेकर देशभर के विशेषज्ञों ने आगरा में व्यापक मंथन किया। आगरा इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजी सोसाइटी के तत्वावधान में होटल जेपी पैलेस में दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन ‘कार्डियोलॉजी आगरा लाइव 6.0’ का आयोजन किया गया। सम्मेलन के पहले दिन देशभर से आए करीब 450 डेलीगेट्स ने हिस्सा लिया। हार्ट फेलियर, कोरोनरी आर्टरी डिजीज, एओर्टा, कार्डियक सर्जरी और स्ट्रक्चरल हार्ट इंटरवेंशन (TAVR) जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर 20 तकनीकी सत्र आयोजित किए गए।

विशेषज्ञों ने बताया कि इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजी में आधुनिक तकनीकों के विकास से उन मरीजों के उपचार की संभावनाएं भी बढ़ी हैं, जिन्हें पहले अधिक उम्र, गंभीर बीमारी या ऑपरेशन के उच्च जोखिम के कारण ओपन हार्ट सर्जरी के लिए अनुपयुक्त माना जाता था। एंजियोप्लास्टी, TAVR और MitraClip जैसी प्रक्रियाओं के जरिए चुनिंदा मरीजों का इलाज बिना पारंपरिक ओपन सर्जरी के किया जा रहा है। साथ ही, हृदय और किडनी के बीच संबंध, हार्ट फेलियर की समय रहते पहचान, दवाओं के बेहतर इस्तेमाल और उपचार के दौरान मरीजों की सुरक्षा पर विशेष जोर दिया गया।

सम्मेलन का शुभारंभ पद्मश्री डॉ. डीके हाजरा ने दीप प्रज्ज्वलित कर किया। इस दौरान पद्मश्री डॉ. दलजीत सिंह गंभीर को चिकित्सा के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित किया गया। इकोकार्डियोग्राफी के बुनियादी सिद्धांतों पर आधारित एक पुस्तक का लोकार्पण भी हुआ। डॉ. तरुण सिंघल के संयोजन में कार्डियोलॉजी विषय पर ज्ञानवर्धक डिबेट आयोजित की गई।

जीवनशैली में सुधार से कम किया जा सकता है हृदय रोगों का खतरा

सम्मेलन के आयोजन सचिव डॉ. सुवीर गुप्ता ने कहा कि हृदय को स्वस्थ रखने के लिए जीवनशैली में सुधार बेहद जरूरी है। तंबाकू, बीड़ी, सिगरेट और शराब से दूरी बनाने, नियमित टहलने तथा शारीरिक गतिविधियां बढ़ाने से हृदय संबंधी जोखिमों को कम करने में मदद मिल सकती है। जिन परिवारों में पहले से हृदय रोग का इतिहास है, उन्हें अतिरिक्त सतर्कता बरतनी चाहिए और नियमित स्वास्थ्य जांच करानी चाहिए। उन्होंने कहा कि डायबिटीज और धूम्रपान का एक साथ होना हृदय के लिए विशेष रूप से नुकसानदायक है। ऐसे लोगों में हार्ट फेलियर सहित गंभीर हृदय संबंधी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए समय रहते जोखिम कारकों की पहचान और चिकित्सकीय सलाह के अनुसार उपचार जरूरी है।

हृदय को स्वस्थ रखने के लिए किडनी की सेहत भी जरूरी

डॉ. हिमांशु यादव ने ‘हार्ट फेलियर- किडनी इज द की’ विषय पर व्याख्यान देते हुए हृदय और किडनी के बीच गहरे संबंध को समझाया। उन्होंने बताया कि हृदय और किडनी एक-दूसरे के कामकाज को प्रभावित करते हैं। यदि इनमें से कोई एक अंग ठीक से काम नहीं करता, तो दूसरे अंग पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। हृदय की कमजोरी से किडनी तक रक्त का प्रवाह प्रभावित हो सकता है, जबकि किडनी की खराबी से शरीर में तरल पदार्थ और इलेक्ट्रोलाइट्स का संतुलन बिगड़ सकता है। ऐसे मरीजों के उपचार में दोनों अंगों की स्थिति को ध्यान में रखना आवश्यक है।

सर्जरी के लिए अनुपयुक्त मरीजों में भी संभव हुआ जटिल एंजियोप्लास्टी का इलाज

नई दिल्ली से आए डॉ. सुभाष चंद्रा ने कहा कि इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजी में पिछले कुछ वर्षों में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। अब जटिल कोरोनरी एंजियोप्लास्टी उन बुजुर्गों और हाई-रिस्क मरीजों में भी की जा रही है, जिन्हें पहले बाईपास सर्जरी के लिए अनुपयुक्त माना जाता था। उन्होंने बताया कि आधुनिक उपकरणों, बेहतर इमेजिंग तकनीक और विशेषज्ञों के अनुभव से जटिल मामलों में भी उपचार की संभावनाएं बढ़ी हैं। हालांकि, एंजियोप्लास्टी और बाईपास सर्जरी में से किस विकल्प को चुनना है, यह मरीज की बीमारी, रक्त वाहिकाओं की स्थिति और समग्र स्वास्थ्य पर निर्भर करता है। डॉ. सुभाष चंद्रा ने बताया कि TAVR, MitraClip और ट्राइकसपिड वाल्व इंटरवेंशन जैसी तकनीकों ने वाल्व संबंधी बीमारियों के उपचार में भी नई संभावनाएं पैदा की हैं। उपयुक्त मरीजों में इन प्रक्रियाओं के जरिए पारंपरिक ओपन सर्जरी के बिना खराब वाल्व का उपचार या उसकी कार्यक्षमता में सुधार किया जा सकता है।

हार्ट अटैक के बाद दवाओं के चयन में सावधानी जरूरी

नई दिल्ली के डॉ. सुमीत सेठी ने एक्यूट कोरोनरी सिंड्रोम (ACS) के बाद डुअल एंटीप्लेटलेट थेरेपी (DAPT) के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि उपचार के दौरान खून का थक्का बनने से बचाव और रक्तस्राव के जोखिम के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। उन्होंने कहा कि कोरोनरी इंटरवेंशन के बाद कुछ मरीजों में प्रासुग्रेल और टिकाग्रेलर जैसी दवाएं क्लोपिडोग्रेल की तुलना में अधिक प्रभावी हो सकती हैं। हालांकि, दवाओं का चयन मरीज की मेडिकल हिस्ट्री, रक्तस्राव के जोखिम और अन्य बीमारियों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। पूर्व में स्ट्रोक या ट्रांजिएंट इस्केमिक अटैक (TIA) का इतिहास रखने वाले मरीजों में प्रासुग्रेल का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। अधिक ब्लीडिंग रिस्क वाले मरीजों के लिए उपयुक्त परिस्थितियों में क्लोपिडोग्रेल एक विकल्प हो सकता है।

बिना ओपन सर्जरी इलाज में मरीज की सुरक्षा सर्वोपरि

फरीदाबाद के डॉ. सुब्रत अखौरी ने कहा कि आज मरीज ऐसी तकनीकों को प्राथमिकता देना चाहते हैं, जिनमें बड़े चीरे और लंबी रिकवरी अवधि से बचा जा सके। इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजी में विकसित नई प्रक्रियाओं से कई जटिल बीमारियों का कम आक्रामक तरीके से उपचार संभव हुआ है। उन्होंने कहा कि किसी भी आधुनिक प्रक्रिया की सफलता के लिए मरीज का सही चयन और सुरक्षित उपचार व्यवस्था बेहद महत्वपूर्ण है। जटिलताओं को कम करने के लिए सटीक काउंसलिंग, उपचार की स्पष्ट योजना और पूरी प्रक्रिया के दौरान निगरानी जरूरी है। तकनीक कितनी भी उन्नत क्यों न हो, मरीज की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।

हार्ट और किडनी के मरीजों में पोटैशियम का संतुलन जरूरी

फरीदाबाद के डॉ. जितेंद्र कुमार ने हृदय और किडनी रोगियों में हाइपरकलीमिया यानी रक्त में पोटैशियम का स्तर बढ़ने की समस्या पर चर्चा की। उन्होंने बताया कि क्रॉनिक किडनी डिजीज (CKD) और हार्ट फेलियर के मरीजों को दी जाने वाली RAAS और MRA समूह की महत्वपूर्ण दवाओं के इस्तेमाल के दौरान कुछ मरीजों में पोटैशियम बढ़ सकता है। ऐसी स्थिति में दवाओं को तुरंत बंद करने के बजाय मरीज की स्थिति के अनुसार निगरानी और पोटैशियम नियंत्रण की रणनीति अपनाना जरूरी है। उन्होंने बताया कि सोडियम जिरकोनियम साइक्लोसिलिकेट (SZC) जैसी दवाएं बढ़े हुए पोटैशियम को नियंत्रित करने में मदद कर सकती हैं। REALIZE-K ट्रायल के संदर्भ में उन्होंने बताया कि पोटैशियम को सामान्य स्तर पर बनाए रखने से उपयुक्त मरीजों में स्पिरोनोलैक्टोन जैसी दवाओं का उपचार जारी रखने में मदद मिल सकती है।

TAVR वाल्व खराब होने पर जांच और फॉलोअप जरूरी

मैक्स साकेत, नई दिल्ली के डॉ. विवेका कुमार ने TAVR के बाद वाल्व के खराब होने यानी डीजेनेरेशन की समस्या पर विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि एओर्टिक स्टेनोसिस के उपचार में TAVR ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, लेकिन समय के साथ वाल्व में दोबारा संकुचन या उससे रक्त का रिसाव जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं। ऐसी स्थिति में वाल्व थ्रोम्बोसिस, एंडोकार्डाइटिस और पैरावाल्वुलर लीक जैसी अन्य संभावित वजहों से अंतर करना जरूरी है। इसके लिए इकोकार्डियोग्राफी और सीटी स्कैन जैसी जांचों का एकीकृत मूल्यांकन उपयोगी होता है। उन्होंने बताया कि मरीज की स्थिति के अनुसार नियमित निगरानी, एंटीकोआगुलेशन, वाल्व-इन-वाल्व TAVR या चुनिंदा मामलों में सर्जरी पर विचार किया जा सकता है। उपचार का निर्णय विशेषज्ञों की हार्ट टीम द्वारा किया जाना चाहिए और मरीज को लंबे समय तक फॉलोअप में रखना जरूरी है।

नई गाइडलाइंस में हार्ट फेलियर की शीघ्र पहचान पर जोर

फरीदाबाद के डॉ. गजिन्दर गोयल ने हार्ट फेलियर के उपचार और नई गाइडलाइंस पर व्याख्यान दिया। उन्होंने रोकथाम, समय पर पहचान और जल्द उपचार शुरू करने की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि जोखिम वाले मरीजों की पहचान कर सिद्ध उपचारों का उचित इस्तेमाल किया जाना चाहिए। डॉ. गोयल ने मोटापे के साथ हार्ट फेलियर से पीड़ित चुनिंदा मरीजों में नई वेट-लॉस थेरेपी की भूमिका पर भी चर्चा की। उन्होंने बताया कि मरीज की बीमारी, लक्षणों और अन्य जोखिम कारकों के अनुसार उपचार की रणनीति तैयार करना जरूरी है।

हार्ट अटैक के बाद खराब वाल्व का बिना बड़े ऑपरेशन इलाज

मैसूर के डॉ. राजगोपाल जे. ने हार्ट अटैक के बाद होने वाली एक गंभीर जटिलता एक्यूट सीवियर माइट्रल रिगर्जिटेशन पर चर्चा की। उन्होंने बताया कि हार्ट अटैक के बाद कुछ मरीजों में माइट्रल वाल्व अचानक ठीक से काम करना बंद कर सकता है, जिससे स्थिति जानलेवा हो सकती है। पहले ऐसे मरीजों में हाई-रिस्क इमरजेंसी ओपन सर्जरी की जरूरत पड़ सकती थी। अब उपयुक्त मरीजों में MitraClip जैसी मिनिमली इनवेसिव तकनीक से वाल्व की मरम्मत संभव हो रही है। इससे कुछ मरीजों को बड़े ऑपरेशन से बचाने और रिकवरी में मदद मिल सकती है। हालांकि, उपचार का विकल्प मरीज की गंभीरता और विशेषज्ञों के मूल्यांकन पर निर्भर करता है।

पंपिंग क्षमता सामान्य होने पर भी हो सकता है हार्ट फेलियर

आगरा के डॉ. वरुण शर्मा ने हार्ट फेलियर विद प्रिजर्व्ड इजेक्शन फ्रैक्शन (HFpEF) पर जानकारी दी। उन्होंने बताया कि हार्ट फेलियर के कुछ मरीजों में हृदय की पंपिंग क्षमता सामान्य दिखाई देती है, लेकिन इसके बावजूद उन्हें सांस फूलने, थकान और शरीर में सूजन जैसी परेशानियां हो सकती हैं। इकोकार्डियोग्राफी में इजेक्शन फ्रैक्शन सामान्य आने के कारण कई बार इस स्थिति की पहचान में देरी हो जाती है। उन्होंने कहा कि हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, मोटापा और एट्रियल फाइब्रिलेशन जैसे जोखिम कारकों पर ध्यान देना चाहिए। सही क्लिनिकल मूल्यांकन, स्कोर और बायोमार्कर की मदद से समय पर निदान किया जा सकता है।

हार्ट फेलियर में फोर पिलर्स और नई दवा पर चर्चा

हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. सौरभ नागर ने हार्ट फेलियर विद रिड्यूस्ड इजेक्शन फ्रैक्शन (HFrEF) के उपचार में फोर पिलर्स थेरेपी और वेरीसिगुएट (Vericiguat) की भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि HFrEF के मरीजों में सही समय पर प्रमाण-आधारित उपचार शुरू करना महत्वपूर्ण है। फोर पिलर्स थेरेपी में शामिल दवाओं का उचित संयोजन मरीज की स्थिति और सहनशीलता के अनुसार किया जाता है। वहीं, वेरीसिगुएट कुछ चुनिंदा मरीजों में अतिरिक्त उपचार विकल्प हो सकती है, खासकर उन मरीजों में जिन्हें उपचार के बावजूद हार्ट फेलियर बिगड़ने का जोखिम बना रहता है। इससे अस्पताल में दोबारा भर्ती होने के जोखिम को कम करने में मदद मिल सकती है। उन्होंने कहा कि नई दवाओं और शोध के परिणामों से गंभीर हार्ट फेलियर के मरीजों के उपचार की संभावनाएं बढ़ी हैं, लेकिन दवाओं का चयन विशेषज्ञ की सलाह से ही किया जाना चाहिए।

पद्मश्री डॉ. डीएस गंभीर को लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड

सम्मेलन में जाने-माने हृदय रोग विशेषज्ञ पद्मश्री डॉ. दलजीत सिंह गंभीर को लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड प्रदान किया गया। इसके साथ ही इकोकार्डियोग्राफी के बेसिक्स पर आधारित पुस्तक का लोकार्पण किया गया। डॉ. तरुण सिंघल के संयोजन में कार्डियोलॉजी पर डिबेट हुई, जिसमें विशेषज्ञों ने विभिन्न उपचार पद्धतियों और आधुनिक तकनीकों के लाभ तथा सीमाओं पर चर्चा की। सम्मेलन में पद्मश्री डॉ. डीएस गंभीर, डॉ. उमर हसन, डॉ. अनिल भान, डॉ. शरद पालीवाल, डॉ. कैलाश विश्वानी, डॉ. एसके कालरा और डॉ. ईशान गुप्ता सहित अनेक विशेषज्ञों ने अपने शोध और अनुभव साझा किए।

विभिन्न तकनीकी सत्रों में डॉ. शरद पालीवाल, डॉ. एके गुप्ता, डॉ. रजनीश सिंह, डॉ. डीपी अग्रवाल, डॉ. सिद्धार्थ अग्रवाल, डॉ. अनिल सारस्वत, डॉ. केके विश्वानी, डॉ. विकास जैन, डॉ. विजय खुराना, डॉ. आनंद रावत, डॉ. दुर्गेश शर्मा, डॉ. ज्योति गर्ग, डॉ. वीएन कौशल, डॉ. तरुण मित्तल, डॉ. राजीव चुघ, डॉ. एसके कालरा, डॉ. सचिन गोयल और डॉ. अमित गुप्ता ने पैनलिस्ट तथा चेयरपर्सन के रूप में सहभागिता की। कार्यक्रम का संचालन देवेंद्र ढल ने किया, जबकि सुरेश सिंह ने व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी संभाली।

25 अक्टूबर को मेडिकल छात्रों के लिए विशेष वर्कशॉप

आयोजन सचिव डॉ. सुवीर गुप्ता ने बताया कि सम्मेलन के दूसरे दिन 25 अक्टूबर को होटल हॉलीडे इन, संजय प्लेस में सुबह 11 बजे से दोपहर 2 बजे तक मेडिकल छात्रों के लिए विशेष इकोकार्डियोग्राफी वर्कशॉप आयोजित की जाएगी। इसमें छात्रों को इकोकार्डियोग्राफी के व्यावहारिक पहलुओं की जानकारी दी जाएगी। वर्कशॉप के दौरान लेफ्ट वेंट्रिकुलर इजेक्शन फ्रैक्शन (LVEF) मापने, हृदय के वाल्व में खराबी की पहचान करने और इको रिपोर्ट पढ़ने की हैंड्स-ऑन ट्रेनिंग दी जाएगी। इसका उद्देश्य मेडिकल छात्रों को हृदय रोगों की पहचान और जांच के व्यावहारिक कौशल से परिचित कराना है।