तिरंगे से नैरेटिव युद्ध की जीत: ऑपरेशन सिंदूर के बाद क्या भाजपा ने पलट दिया विपक्ष का खेल
ऒपरेशन सिंदूर के तहत सेना की जवाबी कार्रवाई जितनी प्रभावशाली थी, उससे कम नहीं थी उसके बाद सरकार की जवाबदेही और भाजपा की राजनीतिक चतुराई। जब तक विपक्ष हमले और सीजफायर के बीच संतुलन साध पाता, तब तक भाजपा तिरंगे के सहारे जनमत को अपने पक्ष में मोड़ने के लिए सड़कों पर उतर चुकी है।
-एसपी सिंह-
पहलगाम में हुए आतंकी हमले ने एक बार फिर पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। इसके जवाब में भारतीय सेना ने 'ऑपरेशन सिंदूर' के ज़रिए पाकिस्तान के आतंक के अड्डों पर जो प्रत्यक्ष और निर्णायक प्रहार किया तो देशवासियों की भावनाएं भी राहत और गौरव से भर उठीं। लेकिन तीन दिन बाद जैसे ही सीजफायर की घोषणा हुई, राष्ट्रवाद की यह लहर राजनीतिक संदेहों के सागर में बहाने की कोशिशें शुरू हो गईं।
विपक्ष, विशेषकर कांग्रेस ने इसे सरकार की कमजोरी करार देना शुरू किया। सोशल मीडिया के एक हिस्से ने इसे अमेरिका जैसी वैश्विक ताकतों के दबाव में लिया गया फैसला बताना शुरू कर दिया। कहा गया कि सरकार ने अधूरा काम छोड़ दिया। क्या यह तर्क थे या फिर एक सुनियोजित नेरेटिव युद्ध का हिस्सा, जहां सैन्य कार्रवाई के बाद की चुप्पी को विपक्ष ने अपने शब्दों से भरना चाहा।
पहलगाम के आतंकी हमले ने एक बार फिर भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद के मुद्दे को केंद्र में ला खड़ा किया था। सरकार ने तुरंत सर्वदलीय बैठक बुलाकर विपक्ष का समर्थन हासिल किया और जवाब में ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया। एक तेज और निर्णायक सैन्य कार्रवाई, जिसने पाकिस्तान को सीधा संदेश दे दिया।
सरकार की ओर से जवाब के लिए चौतरफा मोर्चा
लेकिन जब तीसरे दिन सीजफायर की घोषणा के बाद राजनीतिक नैरेटिव बदलने की कोशिशें शुरू हुईं तो न केवल सरकार अपितु भाजपा भी सतर्क हो गईं। सरकार ने इस बार प्रतिक्रिया में केवल बयानबाज़ी नहीं की, बल्कि चार-स्तरीय रणनीति अपनाई।
ऒपरेशन सिंदूर का ब्यौरा सार्वजनिक किया गया
भारतीय सेना, वायुसेना और नौसेना ने सामने आकर पाकिस्तान को पहुंचाए गए नुकसान के आंकड़े जारी किए। बताया गया कि ऑपरेशन सिंदूर के तहत कितने आतंकियों के कैंप ध्वस्त किए गए, पाक रडार सिस्टम को कितना नुकसान हुआ और पाकिस्तान पार कितना दबाव बनाया गया।
विदेश मंत्रालय का स्पष्ट संदेश
जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा कि वे कश्मीर के मसले पर मध्यस्थता करने को तैयार हैं तो कांग्रेस ने एक बार फिर सरकार को घेरने की कोशिश की। सरकार ने बगैर देरी किए विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल को आगे किया। जायसवाल ने साफ कह दिया कि कश्मीर भारत का आंतरिक विषय है, इसमें किसी तीसरे देश की मध्यस्थता स्वीकार नहीं। यह बयान अमेरिका की भूमिका को लेकर उठे सवालों का साफ जवाब था।
फेक नैरेटिव पर कड़ा कंट्रोल
सरकार समर्थित डिजिटल इकाइयों ने मीडिया और सोशल प्लेटफॉर्म्स पर चलाए जा रहे झूठे दावों की मॉनिटरिंग शुरू की। तथ्यों के साथ जवाब दिए गए कि सीजफायर कोई दबाव नहीं, बल्कि एक रणनीतिक निर्णायकता का हिस्सा है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के युद्ध रुकवाने के दावे का स्वयं पीएम नरेंद्र मोदी ने यह कहकर जवाब दे दिया कि हमने ऒपरेशन सिंदूर स्थगित किया है, रोका नहीं है।
बीजेपी का राष्ट्रवादी जनआंदोलन: तिरंगा यात्राएं
विपक्ष सरकार को घेरने के लिए कुछ कर पाता, इससे पहले भाजपा मैदान में उतर आई। भाजपा का यह कदम सबसे निर्णायक रहा। सरकार और सत्ताधारी पार्टी ने यह समझ लिया कि विपक्षी नैरेटिव का मुकाबला सिर्फ तथ्य से नहीं, भावना से किया जा सकता है। इसलिए 13 से 23 मई तक देशव्यापी तिरंगा यात्राओं की योजना आनन-फानन में बनी और भाजपा के लोग तिरंगे लेकर सड़कों पर उतरने लगे।
तिरंगा यात्राएं भावनात्मक जुड़ाव का जरिया
13 से 23 मई तक देशव्यापी तिरंगा यात्राएं भाजपा की केवल एक राजनीतिक रणनीति नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रवादी भावना को जगाने की पुनर्पुष्टि है। इसमें तीन उद्देश्य स्पष्ट नजर आते हैं। हर तिरंगा यात्रा में यह बताया जा रहा है कि भारत ने किस प्रकार सीमापार घुसकर आतंकवाद के अड्डों को खत्म किया। तिरंगा यात्राएं एक तरह से लोगों को यह कह रही हैं कि आप देखिए, समझिए और खुद तय कीजिए कि देश ने क्या हासिल किया। तिरंगा, भारत माता और सेना, तीनों को एक फ्रेम में प्रस्तुत कर देशवासियों से भावनात्मक जुड़ाव कायम किया जा रहा है।
जब विपक्ष बोलने चला था, बीजेपी चलने लगी
कांग्रेस और अन्य दलों ने सोचा था कि ऑपरेशन सिंदूर के सीजफायर को लेकर सरकार को बैकफुट पर ला पाएंगे, लेकिन भाजपा ने नैरेटिव मोर्चे पर तुरंत हमला बोलकर फिलहाल तो पूरा परिदृश्य बदल दिया है। नेरेटिव पलटने का असर दिखने भी लगा है। टीवी डिबेट्स, सोशल मीडिया और जमीनी स्तर पर भी सरकार के पक्ष में बातें तेज़ हुई हैं।