संभल में अब वह कुआं खोदा जा रहा, जिसमें 1978 के दंगे के दौरान राम शरण दास रस्तोगी को तराजू से बांधकर फेंक दिया गया था
संभल में 1978 के भयावह दंगे की यादें एक बार फिर ताज़ा हो गईं, जब प्रशासन ने उस बंद पड़े ऐतिहासिक कुएं की खुदाई शुरू कराई, जिसमें दंगे के दौरान राम शरण दास रस्तौगी को तराजू से बांधकर फेंक दिया गया था। जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक के निर्देश पर सुरक्षा घेरे में इस कुएं की दोबारा खुदाई की जा रही है।
-आरके सिंह-
संभल। सदर कोतवाली क्षेत्र के एकता पुलिस चौकी के पास स्थित वह पुराना कुआं, जिसका नाम 1978 के दंगे की दर्दनाक यादों से जुड़ा है, एक बार फिर सुर्खियों में है। दशकों से बंद पड़े इस कुएं की खुदाई का कार्य जिला प्रशासन ने शुक्रवार से शुरू करा दिया है। यह वही कुआं है जिसमें दंगे के दौरान राम शरण दास रस्तौगी को तराजू से बांधकर फेंककर उनकी हत्या कर दी गई थी।
24 नवंबर को संभल हिंसा की बरसी पर निरीक्षण के दौरान जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक ने इस कुएं की खुदाई का आदेश दिया था। आदेश के बाद अब प्रशासनिक और पुलिस सुरक्षा की मौजूदगी में कुएं को खोला जा रहा है। खुदाई कार्य की निगरानी सिटी मजिस्ट्रेट सुधीर कुमार और नगर पालिका के अधिशासी अधिकारी डॉ. मणिभूषण तिवारी स्वयं कर रहे हैं।
कुएं को वर्षों पहले बंद कर दिया गया था, लेकिन दंगे से जुड़े कई बिंदुओं की जांच और ऐतिहासिक तथ्यों की पुष्टि के लिए प्रशासन ने इसे दोबारा खोलने का निर्णय लिया। पुलिस बल की मौजूदगी में मजदूरों द्वारा सावधानीपूर्वक खुदाई की जा रही है। स्थानीय लोगों में भी अचानक शुरू हुई इस कार्रवाई को लेकर जिज्ञासा के साथ-साथ 45 साल पुरानी दर्दनाक यादें ताज़ा होती दिख रही हैं।
प्रशासन का कहना है कि यह कदम न केवल ऐतिहासिक तथ्यों की पुष्टि के लिए आवश्यक है, बल्कि दंगे से जुड़े रिकॉर्ड को स्पष्ट करने के प्रयासों के तहत भी महत्वपूर्ण है। फिलहाल खुदाई कार्य जारी है और अधिकारियों का कहना है कि प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही आगे की जानकारी साझा की जाएगी।
1978 के संभल दंगेः इतिहास और घटनाक्रम
बता दें कि वर्ष 1978 में उत्तर प्रदेश के संभल शहर में सांप्रदायिक तनाव से उपजे एक विवाद ने बड़ा रूप ले लिया और शहर भीषण दंगों की चपेट में आ गया था। इस हिंसा में कथित तौर पर 184 लोगों की मृत्यु हुई और स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि लगभग दो महीने तक कर्फ्यू लागू रहा।
दंगों के बाद अनेक हिंदू परिवारों को अपने घर, व्यवसाय और जमीनें छोड़कर पलायन करना पड़ा। कई संपत्तियों पर कब्जा हो गया या उनका उपयोग धार्मिक तथा अन्य गतिविधियों के लिए बदल दिया गया। इस हिंसा ने शहर के सामाजिक ढांचे और सामुदायिक विश्वास पर गहरा असर छोड़ा।
47 साल बाद न्याय की दिशा में पहल- पुनरावलोकन और कार्रवाई
जनवरी 2025 में राज्य सरकार ने लगभग 47 वर्ष पुराने इन मामलों की फाइलें फिर से खोजने और जांच पुनः आरंभ करने का आदेश दिया था। इसके तहत दंगे से प्रभावित परिवारों के भूमि विवादों पर भी पुनर्विचार किया जा रहा है।
इसी प्रक्रिया में कुछ परिवारों को दशकों पहले छोड़ी गई भूमि वापस दिलाई गई। उदाहरणस्वरूप, तीन परिवारों को करीब 10,000 वर्ग फुट भूमि पुनः आवंटित की गई, जो उनके पुराने मकानों या बाग़ों की भूमि थी। प्रशासन ने हत्या, जमीन कब्जा और अन्य गंभीर आरोपों से जुड़े पुराने मामलों की भी समीक्षा तेज की है।
दंगों से जुड़े विवाद और चुनौतियां
दंगों से जुड़े अनेक मामले और एफआईआर रिकॉर्ड अधूरे या लापता बताए जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि कई अभियुक्तों के विरुद्ध कार्रवाई आरंभ हुई थी, लेकिन वर्षों के दौरान वे बरी हो गए या मामले ठंडे पड़ गए।
पीड़ित परिवारों को न्याय में अत्यधिक देरी का सामना करना पड़ा। भूमि वापसी जैसे सकारात्मक कदम आज दिखाई दे रहे हैं, लेकिन विस्थापन, सामाजिक तनाव और व्यक्तिगत पीड़ा का प्रभाव दशकों तक बना रहा।
अब क्यों फिर से चर्चा में आया 1978 का दंगा?
दिसंबर 2024 में संभल में पुराने धार्मिक स्थलों और मंदिर-भूमि की समीक्षा के दौरान 1978 के दंगों की स्मृतियां फिर ताजा हो उठी थीं। स्थानीय राजनीति, भू-स्वामित्व के मुद्दे, सांप्रदायिक सद्भाव की बहस और ऐतिहासिक तथ्यों की पुनः समीक्षा की मांग ने इस पुराने संघर्ष को दोबारा चर्चा में ला दिया।