जब नाकाम मोहब्बत शायरी और ख़ामोशी छोड़कर पोस्टमार्टम रिपोर्ट, क्राइम फ़ाइल और अदालतों की भाषा बोलने लगे

कभी नाकाम मोहब्बत शायरी, गीत और ख़ामोशी में ढल जाया करती थी, आज वही प्यार हत्या, साज़िश और पोस्टमार्टम तक पहुंच रहा है। रिश्ते टूटने की तमीज़, भावनात्मक शिक्षा और आसान क़ानूनी रास्तों के अभाव में इश्क़ ज़हरीला बनता जा रहा है। आज़ादी बढ़ी है, लेकिन अलगाव को संभालने की समझ नहीं। नतीजा यह कि मोहब्बत अब दर्द की भाषा नहीं, अपराध की पटकथा लिख रही है।

Jan 22, 2026 - 13:38
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जब नाकाम मोहब्बत शायरी और ख़ामोशी छोड़कर पोस्टमार्टम रिपोर्ट, क्राइम फ़ाइल और अदालतों की भाषा बोलने लगे

-बृज खंडेलवाल-

एक ज़माना था जब हिंदुस्तान में नाकाम मोहब्बत से शायर पैदा होते थे। टूटे दिल गीत लिखते थे। देवदास शराब में डूबकर अफ़साना  बन जाता था। मजनूं रेगिस्तान में दीवाना हो जाता था। दर्द की एक ज़बान  होती थी, शायरी, ख़ामोशी, और आँसू। हैं सबसे मधुर वो गीत जिन्हें हम दर्द के सुर में गाते हैं....

लेकिन, वो दौर अब ख़त्म हो चुका है। आज नाकाम प्यार पुलिस फ़ाइलों, फ़ॉरेंसिक रिपोर्टों और टीवी बहसों में दर्ज होता है। इश्क़  अब कविता में नहीं, क्राइम सेक्शन में नज़र आता है। मोहब्बत की कहानियाँ अब आह  पर नहीं, सूटकेस, सीमेंट के ड्रम, तेज़ाब और क़ब्र पर ख़त्म होती हैं। शायरी की जगह पोस्टमार्टम ने ले ली है।

दिल्ली से त्रिपुरा तक, बेंगलुरु के सस्ते होटलों से मेरठ की शांत कॉलोनियों तक, एक डरावना पैटर्न  उभर रहा है। प्रेमी अब सिर्फ़ अलग नहीं हो रहे, वे एक-दूसरे को मिटा  रहे हैं।

ये अचानक ग़ुस्से में किए गए जुर्म नहीं हैं। ये ठंडे दिमाग़ से रची गई साज़िशें  हैं। कहीं पति को प्रेमी की मदद से ज़हर दिया गया। कहीं शादी से इंकार पर औरत के टुकड़े कर दिए गए। कहीं हनीमून मौत का सफ़र बन गया। लाशें छुपाई जाती हैं, बहाने  गढ़े जाते हैं, सीसीटीवी से बचा जाता है। जज़्बात  हैं, मगर वे गर्म नहीं, बर्फ़ जैसे ठंडे हैं।

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के आँकड़े इस हक़ीक़त पर मुहर लगाते हैं। प्रेम संबंधों से जुड़े क़त्ल  अब कुल हत्याओं का बड़ा हिस्सा बन चुके हैं। पहले ऐसे जुर्म गिनती के होते थे, आज चिंता का कारण हैं। कई राज्यों में हर चार में से एक हत्या के पीछे कहीं न कहीं नाकाम मोहब्बत की परछाईं है।

यही आधुनिक भारत का  पैराडॉक्स है। आज़ादी बढ़ी है, मगर समझ पीछे छूट गई है।

आज का नौजवान अपनी पसंद से साथी चुनता है। जाति और मज़हब की दीवारें टूट रही हैं। लिव-इन रिश्ते सामने हैं। दूसरी शादी अब छुपी बात नहीं। डेटिंग ऐप्स तुरंत कनेक्शन का वादा करते हैं। ये सब तरक़्क़ी  है!!

लेकिन जब ये रिश्ते टूटते हैं और टूटते ज़रूर हैं, तो संभलने की तालीम  नहीं मिलती। ठुकराए जाने को सहने की सीख नहीं। अलग होने का कोई सभ्य तरीक़ा नहीं। तलाक़ आज भी बदनामी, लंबी क़ानूनी लड़ाई और खर्च से जुड़ा है। काउंसलिंग  अमीरों की चीज़ मानी जाती है। भावनात्मक शिक्षा घरों और स्कूलों से ग़ायब है।

नतीजा यह कि प्यार ज़हरीला हो चुका है। धीरे-धीरे साथी एक “मुसीबत” नज़र आने लगता है। रुकावट। बोझ। अगर रिश्ता खुलने से इज़्ज़त  पर आँच आए, अगर अलग होने से समाज में सवाल उठें, अगर क़ानूनी रास्ता थकाने वाला लगे, तो विकृत  सोच के लिए क़त्ल एक “आसान हल” बन जाता है।

एक वरिष्ठ पुलिस अफ़सर ने थकी आवाज़ में कहा था, इन जुर्मों में कोई जुनून नहीं होता। कोई पागलपन नहीं। सिर्फ़ हिसाब-किताब होता है। मक़सद होता है, एक इंसान को ज़िंदगी से मिटा देना।

तकनीक भी मददगार बन गई है। मोबाइल लोकेशन, कैमरों से बचने की चालाकी, चैट डिलीट करना, सब प्लान का हिस्सा है। प्रेम पत्रों की जगह अब व्हाट्सऐप चैट सबूत बनती है। जज़्बात, जैसे किसी ने कहा, अब “कॉरपोरेट” हो गए हैं, योजना वाले, फायदे-नुकसान गिनने वाले।

इस हिंसा की जड़ में मोहब्बत की एक ख़तरनाक ग़लतफ़हमी है। आज़ादी को मालिकाना हक़ समझ लिया गया है। “तुम मेरी हो” धीरे-धीरे “तुम पर मेरा क़ब्ज़ा है” बन जाता है। इंकार  को दुख नहीं, बेइज़्ज़ती समझा जाता है। दिल से पहले अहंकार  ज़ख़्मी होता है।

यह सिर्फ़ मर्दों या औरतों की कहानी नहीं है। समाज का दबाव, शर्म, नाज़ुक मर्दानगी, और बदनामी का डर, सबको जकड़ लेता है। कुछ औरतों के लिए, जो बुरी शादियों में फँसी हैं, नए प्रेमी के साथ साज़िश एकमात्र रास्ता लगने लगता है। यह दहेज हिंसा का उल्टा लेकिन उतना ही ख़ौफ़नाक रूप है।

मीडिया इस आग में घी डालता है। हर केस एक थ्रिलर बन जाता है। टीवी एंकर अंदाज़े लगाते हैं। सोशल मीडिया मौत को कंटेंट बना देता है। असली सवाल पीछे छूट जाते हैं।

क्या हम युवाओं को सिखा रहे हैं कि प्यार से कैसे बाहर निकला जाए?

क्या हम अलगाव को बिना बदनामी के स्वीकार कर रहे हैं?

क्या तेज़ और इंसानी तलाक़ी व्यवस्था है?

क्या हम भावनात्मक संतुलन पर बात कर रहे हैं?

जवाब साफ़ है.....नहीं।

अगर हालात नहीं बदले, तो ये सिलसिला बढ़ेगा। सच्ची अपराध कहानियाँ असली अपराधों को जन्म देंगी। रिश्ते अपराध स्थल बनते जाएँगे। प्रेमी आँसू या वकील नहीं, आरी और चाकू से अंत लिखेंगे।

हमें नाकाम मोहब्बत के लिए एक नई ज़बान चाहिए, जो इज़्ज़त, अलगाव और भरपाई  की इजाज़त दे। वरना देवदास इतिहास में गुम रहेगा और शायरों की जगह जासूस (डिटेक्टिव) लेते रहेंगे।

SP_Singh AURGURU Editor