लखनऊ रैली से लौटेगा बसपा का पुराना दमखम? मायावती 2027 में चुनौती बनने को तैयार

लखनऊ। बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती एक बार फिर अपने पुराने तेवर और राजनीतिक फॉर्म में दिखने लगी हैं। लंबे समय से लगातार कमजोर हो रहे जनाधार को फिर से मजबूत करने के लिए उन्होंने पार्टी संगठन में गहन बदलावों का काम पूरा करने के बाद अब अपना पूरा फोकस बूथ स्तर पर संगठन में जान फूंकने पर है। इसी क्रम में आगामी नौ अक्तूबर को लखनऊ में होने जा रही बसपा की रैली पर भी सभी की निगाहें टिक गई हैं।

Sep 18, 2025 - 13:19
 0
लखनऊ रैली से लौटेगा बसपा का पुराना दमखम? मायावती 2027 में चुनौती बनने को तैयार

नौ अक्तूबर को लखनऊ में बसपा संस्थापक कांशीराम की पुण्यतिथि पर होने वाली महारैली को मायावती पार्टी के पुनर्जागरण की रैली के तौर पर देख रही हैं। इसमें लाखों की भीड़ जुटाने का लक्ष्य रखा गया है। इसका संदेश साफ है- बसपा न केवल जीवित है बल्कि यूपी की सियासत में निर्णायक ताकत बनने की ओर बढ़ रही है। कुल मिलाकर बसपा 2027 के विधान सभा चुनाव में यूपी में तीसरी बड़ी ताकत के रूप में उतरने की तैयारी में है।

बीते कुछ महीनों में बसपा सुप्रीमो मायावती ने कई कड़े फैसले लिए। कई वरिष्ठ नेताओं की छुट्टी कर दी। यहां तक कि अपने उत्तराधिकारी माने जाने वाले भतीजे आकाश आनंद को भी किनारे कर दिया। इन कदमों से पार्टी भीतर से हिल गई थी, लेकिन अब हालात बदलते दिख रहे हैं। आकाश आनंद समेत कई नेताओं की वापसी हो चुकी है और संकेत हैं कि 9 अक्तूबर की रैली में पुराने दिग्गजों की भी पुनः पार्टी में एंट्री हो जाए तो आश्चर्य नहीं होगा। नसीमुद्दीन सिद्दीकी जैसे नेताओं की वापसी की चर्चाएं तेज़ हैं।

सियासी पर्यवेक्षकों का मानना है कि मायावती 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी उसी पैटर्न पर कर रही हैं, जिस तरह 2007 के यूपी विधान सभा चुनाव में की थी। उस समय बूथ स्तर पर संगठनात्मक मजबूती और जातीय समीकरणों पर आधारित भाईचारा कमेटियों ने निर्णायक भूमिका निभाई थी। इस बार भी वही फॉर्मूला दोहराया जा रहा है। मायावती हर जिले से व्यक्तिगत फीडबैक लेकर यह सुनिश्चित करना चाहती हैं कि कहीं भी ढिलाई न रहे।

बीजेपी का एनडीए गठबंधन और समाजवादी पार्टी का पीडीए, दोनों ही मायावती की इस नई सक्रियता पर पैनी नजर रखे हुए हैं। यह रैली केवल बसपा कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ाने के लिए नहीं बल्कि प्रतिद्वंद्वी दलों को ताक़त का अहसास कराने के लिए भी है। संगठन के कील कांटे दुरुस्त कर मायावती दलित वोट बैंक में चुनौती पेश कर रहे सांसद चंद्रशेखर को भी जवाब देना चाहती हैं कि दलितों की एकछत्र नेता तो वही हैं।

मायावती के इस राजनीतिक दांव का असर कितना गहरा होगा, यह तो 2027 के चुनाव में ही स्पष्ट होगा, लेकिन इतना तय है कि बसपा फिर से सुर्खियों में लौट आई है और पार्टी का कैडर जोश में है।

SP_Singh AURGURU Editor