पांच करोड़ तो फिर कमा लोगे अगर रेड पड़ी तो...पढ़िए क्या-क्या लिखा है पूरन डावर को भेजे गये पत्र में  

आगरा। शहर प्रमुख उद्योगपति पूरन डावर से पांच करोड़ रुपये झटकने के लिए जिस तरह का ताना-बाना बुना गया, उससे एक बात तो साफ है कि इस सबके पीछे कोई ऐसा शख्स है जो उन्हें नजदीकी से देखता रहा है, लेकिन उसने जो तरीका अपनाया, उससे इस अपराधी की बेवकूफी भी उजागर होती है। जो पत्र पूरन डावर के पुत्र सम्भव डावर के नाम पर भेजा गया, उसमें भेजने वाला उन्हें उनका शुभचिंतक बताकर यह दर्शाने की कोशिश कर रहा है कि वह तो उन्हें मुसीबत से बचाने की कोशिश कर रहा है। इस पत्र की लिखावट और जो बातें लिखी गई हैं, उन्हें देखकर यह भी स्पष्ट होता है कि यह व्यक्ति पढ़ा लिखा तो है ही, उसे सरकारी महकमों की कार्यप्रणाली की भी थोड़ी बहुत जानकारी है। 

Oct 13, 2025 - 20:34
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पांच करोड़ तो फिर कमा लोगे अगर रेड पड़ी तो...पढ़िए क्या-क्या लिखा है पूरन डावर को भेजे गये पत्र में   

इस पत्र में जहां एक ओर शुभचिंतक बताकर उन्हें बचाने की बात कही गई है, वहीं दूसरी ओर नेताओं के चक्कर में न पड़ने जैसी बातें लिखकर भेजने वाले ने अपना डर भी प्रदर्शित कर दिया है। वह जानता है कि जिन पूरन डावर से वह वसूली करना चाहता है, उनकी पहुंच कहां कहां तक है। अपने इसी डर की वजह से ही तो वह बार-बार पत्र में लिखता है कि किसी को बताया तो इनकम टैक्स की रेड हो जाएगी और फिर पैसा, इज्जत और शोहरत सब कुछ चली जाएगी।

इस पत्र के कुछ अंश इस प्रकार हैं-

प्रिय सम्भव भाई,

मैं तुम्हारा शुभचिंतक एक अत्यंत आवश्यक सूचना दे रहा हूं। तुम्हारे किसी अपने खास व्यक्ति ने, जिसे तुम्हारी सारी संपत्तियों की जानकारी है कि किस शहर में कितनी संपत्तियां हैं, कितने एनजीओ चल रहे हैं, कितनी जमीनों पर गैरकानूनी कब्जे हैं, कितनी एक नंबर और कितनी दो नंबर की संपत्तियां हैं, कुल मिलाकर कई सौ करोड़ के हिसाब-किताब की पूरी डिटेल, उसने एक फाइल आयकर विभाग के रेड विभाग के सीक्रेट ऑफिस में जमा कराई है।

मुझे इस बात की जानकारी तब हुई जब मैं एक दिन पहले एक काम से संजय प्लेस गया था। मेरा काम जल्दी निपट गया तो मैं अपने एक मित्र से मिलने आयकर विभाग चला गया, जो रेड विभाग और स्ट्रांग रूम के इंचार्ज हैं। हम दोनों ऑफिस में चाय पी रहे थे तभी रेड कमिश्नर के पी.ए. वहां आए और इंचार्ज साहब से बोले कि इस महीने कोई फाइल आई हो तो कमिश्नर साहब ने मंगाई है। इंचार्ज साहब ने कहा कि दो मिनट बैठिए, मैं अभी देता हूं। वे स्ट्रांग रूम में गए और दो फाइलें लेकर आए। एक फाइल लेकर उन्होंने रजिस्टर में एंट्री करना शुरू किया।

उसी समय मेरी नजर दूसरी फाइल पर पड़ी, जिस पर लिखा था- डावर ग्रुप ऑफ इंडस्ट्रीज, आगरा।  मैंने वह फाइल अपने हाथ में ले ली और उसे देखने लगा। इंचार्ज साहब बोले कि पहले इस फाइल की एंट्री कर लूं, फिर तुम पढ़ लेना। तब मैंने उनसे कहा कि इस फाइल की एंट्री मत करो, क्योंकि अगर रजिस्टर में एंट्री हो जाती तो उस पर नंबर पड़ जाता और वह फाइल कमिश्नर साहब की टेबल पर रखनी पड़ती।

पी.ए. साहब वह फाइल, जो एक चांदी व्यापारी की थी, लेकर कमिश्नर साहब को दे आए, जबकि तुम्हारी फाइल उन्होंने अपने पर्सनल लॉकर में रख ली। उन्होंने मुझसे पूछा कि तुम्हारा इस फाइल से क्या संबंध है, तो मैंने उन्हें बताया कि डावर साहब का मेरे ऊपर एक एहसान है, करीब दस–बारह साल पहले का, इसलिए मेरा भी फर्ज बनता है कि मैं उनके काम आ सकूं। आजकल कौन किसी का एहसान मानता है, इसलिए मैंने सोचा कि जो संभव हो, तुम्हें आगाह कर दूं। पी.ए. ने मुझे समझाते हुए कहा कि किसी जुगाड़ या सिफारिश के चक्कर में मत पड़ना, क्योंकि कमिश्नर साहब बहुत प्रभावशाली घराने से हैं। वे राजघराने से हैं, दो भाई हैं। एक आईएएस हैं जो पीएमओ में हैं और दूसरे आईआरएस, जो आयकर विभाग में हैं। मोदी और शाह भी इनसे कुछ नहीं बोल सकते, क्योंकि गुजरात से लेकर दिल्ली तक के कारनामे इनकी जेब में हैं।

पत्र में कन्नौज के एक इत्र व्यापारी के यहां हुई रेड का जिक्र भी है और लिखा है कि वह छापा भी इन्हीं कमिश्नर साहब ने मारा था। पत्र लिखने वाले ने सम्भव के साथ अपनी बचपन की दोस्ती का हवाला देते हुए लिखा है कि तुम्हारी फाइल को दबाने के लिए आयकर विभाग वाले दस करोड़ रुपये मांग रहे थे, लेकिन मैंने उन्हें पांच करोड़ में मामला निपटाने के लिए तैयार कर लिया है। पत्र में साफ लिखा गया है कि फाइल सौंपने के लिए पांच करोड़ रुपये देने होंगे। यह पैसा गुरुद्वारा गुरु का ताल के सामने फ्लाईओवर के नीचे एक चाय वाले के पास देना है। लिफाफे में तुम्हें एक पर्ची मिलेगी, जिस पर एक कोड नंबर लिखा होगा। पार्सल (जिसमें पांच करोड़ रुपये नकद होंगे) ड्राइवर के माध्यम से दो या तीन कार्टनों में भेजना है। पार्सल भेजने की तय तारीख और समय 12 अक्तूबर 2025, दोपहर 2 बजे पत्र में अंकित है।

पत्र में आगे लिखा है- जब पार्सल भेजो तो चाय वाले को वह कोड वाली पर्ची देना और कहना कि जैसे ही कोई आदमी वैसी ही पर्ची लेकर आए, उसे कार्टन दे देना। अगर चाय वाला कुछ पूछे तो कहना कि कार्टनों में बच्चों की किताबें रखी हैं। पार्सल पहुंचने के पंद्रह दिन के भीतर फाइल की फोटोकॉपी तुम्हारे पास पहुंच जाएगी।

पत्र में यह भी लिखा गया है कि पांच करोड़ रुपये के लालच में मत आना। यह रकम तुम्हारे लिए बहुत छोटी है। तुम्हारे पास दो विकल्प हैं। एक तरफ वह इज्जत, शोहरत और पैसा जो डावर साहब ने कमाई है और दूसरी तरफ ये पांच करोड़ रुपये। फैसला तुम्हें खुद करना है। तुम्हारे भरोसे के लिए उस फाइल की कवर पेज की फोटोकॉपी भी भेज रहा हूं, ताकि तुम्हें यकीन हो जाए कि बात सच है। इसके साथ ही साथ ही चेतावनी दी गई है कि किसी जुगाड़, सिफारिश या राजनीति के चक्कर में मत पड़ना, क्योंकि कमिश्नर साहब ईमानदारी की मिसाल हैं। अगर तुमने कोई गलत कदम उठाया तो सोशल मीडिया के जमाने में एक मिनट में सब खत्म हो जाएगा, फिर पछताना भी बेकार रहेगा।

पत्र के अंत में लिखा है कि पांच करोड़ रुपये तो तुम कुछ ही दिनों में फिर कमा लोगे, लेकिन अगर आयकर की रेड पड़ी तो इज्जत और शोहरत दोनों चली जाएंगी। इसलिए समझदारी इसी में है कि इस मामले को संभालकर चलो।

SP_Singh AURGURU Editor