पचास साल पहले का 26 जून जब डर गया था आगराः लोकतंत्र के लिए प्रतिरोध का गढ़ भी बना यही शहर

आगरा। 50 साल पहले यानि 26 जून 1975 की वह सुबह आज भी उन लोगों की स्मृतियों में जीवित है, जो उस समय किशोरावस्था में थे। आज वे सभी सीनियर सिटीजन की श्रेणी में आ चुके हैं। दरअसल, यह वही सुबह थी जब देश की जनता को यह ज्ञात हुआ कि लोकतंत्र को निलंबित कर दिया गया है। 25 जून की रात को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देशभर में इमरजेंसी की घोषणा कर दी थी, जिसकी भनक तक आमजन को नहीं लगी। 26 जून की सुबह इंदिरा गांधी के आकाशवाणी से संबोधन के बाद देशवासियों को इस असाधारण राजनीतिक फैसले की जानकारी मिली।

Jun 26, 2025 - 12:32
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पचास साल पहले का 26 जून जब डर गया था आगराः लोकतंत्र के लिए प्रतिरोध का गढ़ भी बना यही शहर
आपातकाल के दो भुक्तभोगीः विधायक पुरुषोत्तम खंडेलवाल और आरएसएस के महानगर संघचालक विजय गोयल।  

जब सड़कों से गलियों तक फैला था सन्नाटा

आगरा में 26 जून 1975 की सुबह भय, सन्नाटे और असहजता से भरी थी। कांग्रेस की सरकार होने के कारण कांग्रेसियों के चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी, मगर जनसंघ, आरएसएस, सोशलिस्ट पार्टी और अन्य गैर कांग्रेसी दलों से जुड़े कार्यकर्ताओं के लिए यह सुबह डरावनी बन चुकी थी। जगह-जगह पुलिस रेड हो रही थीं, नेताओं और कार्यकर्ताओं को पकड़-पकड़ कर जेलों में डाला जा रहा था। हालत यह हो गई थी कि आम लोग भी विरोधी दलों से जुड़े लोगों को देखकर किनारा करने लगे थे, उन्हें डर सताने लगा था कि कहीं वे भी संदिग्ध बनकर गिरफ्तार न हो जाएं।

विजय गोयल के संस्मरण: मोतीकटरा की गली से निकली प्रतिरोध की लहर

लोकतंत्र सेनानी एवं वर्तमान में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के महानगर संघचालक का दायित्व संभाल रहे विजय गोयल आज भी वे घटनाएं स्पष्ट रूप से याद करते हैं। वे बताते हैं कि उस समय आगरा विभाग के विभाग प्रचारक श्यामजी गुप्त थे, जिनके नेतृत्व में आपातकाल के खिलाफ मथुरा, अलीगढ़ और मैनपुरी तक रणनीतियां बनीं। खिलाफत की रणनीति तय करने के लिए अत्यंत गोपनीय मीटिंग्स होती थीं।

विजय गोयल एक प्रसंग साझा करते हैं, जब डॉ. ऋषि महाजन के पिता लाजपत महाजन के मोतीकटरा स्थित घर में एक बैठक रखी गई। यह घर एक पतली सी गली में था और बैठक में केवल दस प्रमुख लोगों को बुलाया गया था। श्यामजी ने सभी को पहले ही सख्त हिदायत दी थी कि कोई भी अपना वाहन बैठक स्थल के सामने न रोके, बल्कि आसपास की गलियों में खड़ा करके आए। यह सावधानी इसलिए बरती जा रही थी ताकि पुलिस को भनक न लगे। विजय गोयल बताते हैं कि आगरा विभाग से सबसे अधिक पॉलिटिकल प्रिजनर्स आपातकाल के दौरान गिरफ्तार हुए, जो श्यामजी गुप्त की कुशल संगठनात्मक क्षमता का परिणाम था।

पुरुषोत्तम खंडेलवाल की कथा: 14 साल की उम्र में जेल की कोठरी

आगरा उत्तर से भाजपा विधायक और लोकतंत्र सेनानी पुरुषोत्तम खंडेलवाल इमरजेंसी की घोषणा के समय केवल 14 वर्ष के थे, लेकिन आपातकाल के प्रतिरोध में उन्होंने जो भूमिका निभाई, वह आज भी प्रेरणास्पद है। वे बताते हैं कि उनके पिता ओम प्रकाश खंडेलवाल स्वयंसेवक थे और इसलिए बचपन से ही वे संघ के संस्कारों में पले-बढ़े।

आपातकाल लगते ही वे संघ के कार्यक्रमों और सत्याग्रह में सक्रिय होने लगे थे। दो मुकदमे दर्ज हो चुके थे, पुलिस लगातार घर पर दबिश दे रही थी। जब घर की कुर्की की नोटिस आ गई, तब उन्होंने ‘जाट हाउस’ में पांच अन्य स्वयंसेवकों के साथ सत्याग्रह किया, जहां से उन्हें गिरफ्तार कर जिला जेल भेज दिया गया। गिरफ्तारी के समय उनकी उम्र 14 वर्ष 6 महीने हो चुकी थी।

पुरुषोत्तम खंडेलवाल याद करते हैं कि उन दिनों विरोधी दलों के लोग आम जनता के लिए ‘अछूत’ बन चुके थे। इतना भय व्याप्त था कि लोग अपने घर बुलाना तो दूर, बात तक करने से कतराते थे। उन्हें डर होता था कि कहीं पुलिस की नजर में न आ जाएं और उन्हें भी जेल में न डाल दिया जाए।

प्रतिरोध की भूमि बनकर उभरा था आगरा

25 जून 1975 की आधी रात से शुरू हुआ आपातकाल भारतीय लोकतंत्र का ऐसा दौर था, जिसने पूरे देश को गहरे भय, दमन और संघर्ष की आग में झोंक दिया था। लेकिन इसी दौर ने असंख्य रेजिस्टेंस हीरोज को जन्म दिया, जिन्होंने साहस और संगठन के बल पर लोकतंत्र की लौ को बुझने नहीं दिया। आगरा भी उस समय प्रतिरोध की भूमि बनकर उभरा और यहां के सेनानियों ने इतिहास में अपनी अमिट छाप छोड़ी।

SP_Singh AURGURU Editor