एआई बनेगा टैक्स अधिवक्ताओं का सबसे बड़ा हथियार, आंख मूंदकर भरोसा पड़ सकता है भारी- सीए प्रवीण शर्मा ने जीएसटी और आयकर की प्रैक्टिस में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की संभावनाओं और जोखिमों से किया आगाह
आगरा। जीएसटी और आयकर की प्रैक्टिस में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) टैक्स अधिवक्ताओं के लिए बड़ा हथियार साबित हो सकता है। रिटर्न के आंकड़ों का विश्लेषण करने, टैक्स नोटिस का अध्ययन करने, कानूनी फैसले तलाशने और अपील का प्रारूप तैयार करने जैसे काम इससे तेजी से किए जा सकेंगे। हालांकि, एआई से मिलने वाली जानकारी पर आंख मूंदकर भरोसा करना और क्लाइंट के गोपनीय दस्तावेज असुरक्षित प्लेटफॉर्म पर अपलोड करना भारी पड़ सकता है। दिल्ली के प्रख्यात चार्टर्ड अकाउंटेंट सीए प्रवीण कुमार शर्मा ने शुक्रवार को लोहामंडी स्थित महाराजा अग्रसेन सेवा सदन में आयोजित ज्ञान-व्याख्यान में टैक्स अधिवक्ताओं को तकनीक की संभावनाओं के साथ इन खतरों के प्रति आगाह किया।
आगरा के कर अधिवक्ताओं के संगठन की ओर से सत्र 2026-27 के प्रथम ज्ञान-व्याख्यान में जीएसटी और आयकर की प्रैक्टिस में एआई की उपयोगिता, व्यावहारिक चुनौतियों और भविष्य की संभावनाओं पर विस्तार से चर्चा हुई। बड़ी संख्या में अधिवक्ताओं की मौजूदगी ने टैक्स प्रैक्टिस में नई तकनीक के बढ़ते महत्व को रेखांकित किया।
मुख्य वक्ता सीए प्रवीण कुमार शर्मा ने बताया कि जीएसटी के क्षेत्र में रिटर्न के आंकड़ों का मिलान, ई-इनवॉइस का सत्यापन और संदिग्ध इनपुट टैक्स क्रेडिट की पहचान जैसे कार्यों में डेटा विश्लेषण की तकनीक उपयोगी साबित हो रही है। इसी तरह, आयकर के मामलों में AIS, TIS और फॉर्म 26AS सहित विभिन्न वित्तीय जानकारियों का विश्लेषण कर कर विवरणियों और उपलब्ध आंकड़ों के बीच अंतर पहचानने में मदद मिल सकती है। एआई बड़ी मात्रा में रिकॉर्ड का कम समय में अध्ययन कर अधिवक्ताओं की कार्यक्षमता बढ़ा सकता है।
उन्होंने अपील तैयार करने में एआई की भूमिका पर विशेष जोर देते हुए कहा कि संबंधित दस्तावेजों का विश्लेषण करने, प्रासंगिक न्यायिक निर्णय तलाशने और अपील का प्रारूप तैयार करने में यह तकनीक मददगार हो सकती है। इससे अधिवक्ताओं का समय बचेगा और वे मामले के कानूनी पहलुओं पर अधिक ध्यान दे सकेंगे। हालांकि, एआई द्वारा सुझाए गए न्यायिक निर्णयों, कानूनी संदर्भों और तथ्यों की आधिकारिक स्रोतों से पुष्टि करना जरूरी है।
गलत जानकारी और डेटा लीक का खतरा
सीए शर्मा ने चेताया कि एआई पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता नुकसानदेह हो सकती है। यदि उसे गलत या अधूरी जानकारी दी जाती है तो वह गलत निष्कर्ष दे सकता है। इसी तरह, क्लाइंट का पैन, आधार, बैंक विवरण या बैलेंस शीट असुरक्षित एआई टूल पर अपलोड करने से गोपनीय वित्तीय जानकारी उजागर होने का खतरा रहता है। उन्होंने अधिवक्ताओं को न्यायिक निर्णयों की प्रामाणिक स्रोतों से जांच करने, क्लाइंट के डेटा की सुरक्षा सुनिश्चित करने और आवश्यक सहमति लेने की सलाह दी। उनका स्पष्ट संदेश था कि एआई अधिवक्ताओं का सहायक साधन है, विकल्प नहीं। अंतिम कानूनी राय देने और मामले से जुड़े निर्णयों की जिम्मेदारी अधिवक्ता की ही रहेगी।
अध्यक्ष राजकिशोर ने कहा कि एआई अब केवल आधुनिक तकनीक नहीं, बल्कि पेशेवर कार्यप्रणाली का महत्वपूर्ण हिस्सा बनता जा रहा है। आने वाले वर्षों में इस तकनीक को समझकर जिम्मेदारी से इस्तेमाल करने वाले अधिवक्ता अपने क्लाइंट को बेहतर सेवाएं दे सकेंगे।
महासचिव अखिलेश भटनागर ने बताया कि व्याख्यान के बाद आयोजित प्रश्नोत्तर सत्र में अधिवक्ताओं ने एआई के व्यावहारिक इस्तेमाल, कानूनी शोध, अपील ड्राफ्टिंग और डेटा सुरक्षा से जुड़े सवाल पूछे। जीएसटी स्टडी सर्किल के चेयरमैन सुभाष अग्रवाल और आयकर स्टडी सर्किल के को-चेयरमैन नवीन गर्ग का आयोजन में विशेष सहयोग रहा। अंत में आयकर स्टडी सर्किल के चेयरमैन अनिल वर्मा ने अतिथियों और उपस्थित सदस्यों के प्रति आभार व्यक्त किया।
इस अवसर पर कोषाध्यक्ष अब्दुल अख्तर खान, जीएसटी उपाध्यक्ष पीपी सिंह, आयकर उपाध्यक्ष अनुराग गुप्ता, जीएसटी सचिव संचिता अग्रवाल, अभिनव बंसल, राकेश कुमार सारस्वत, शांतनु बंसल, आरपी दीक्षित, सुनील आनंद, मोनल अग्रवाल, सोमेंद्र जैन, रोहित अग्रवाल, वैभव जैन, मुकेश खंडेलवाल, कृष्ण मुरारी अग्रवाल, मोहित अग्रवाल, रोहन अग्रवाल, संजीव वशिष्ट, रजनीकांत वर्मा, अक्षय कुमार कुलश्रेष्ठ, सतीश चंद्र बंसल, राम मोहन सिंह कोटिया, अनुराग भटनागर, अभिषेक आनंद, संजीव यादव और पीयूष खंडेलवाल आदि उपस्थित रहे।