वीरता की गाथा का शतक: प्रो. केआर कानूनगो की अमर कृति 'जाटों का इतिहास’

‘जाटों का इतिहास’ पुस्तक के प्रकाशन को 100 वर्ष पूरे हो रहे हैं। यह ग्रंथ 1925 में प्रो. के.आर. कानूनगो द्वारा सेठ छज्जूराम के आर्थिक सहयोग से लिखा गया था। उन्होंने रामजस कॉलेज के अपने जाट विद्यार्थियों से किए वादे के तहत यह इतिहास रचा। यह ग्रंथ जाट समुदाय की भूली-बिसरी वीरगाथाओं और वंश परंपरा को खोजने का एक ऐतिहासिक प्रयास था, जैसा कि राजपूतों, मराठों और सिखों के लिए पहले हो चुका था।

Jul 27, 2025 - 11:38
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वीरता की गाथा का शतक: प्रो. केआर कानूनगो की अमर कृति 'जाटों का इतिहास’

-चोब सिंह वर्मा-

‘जाटों का इतिहास’ नामक प्रतिष्ठित पुस्तक इस वर्ष अपने प्रकाशन के 100 वर्ष पूरे कर रही है। यह ग्रंथ वर्ष 1925 में प्रकाशित हुआ था। इसे हरियाणा के हिसार ज़िले के अलखपुरा गांव में जन्मे सेठ छज्जूराम के आर्थिक सहयोग से प्रोफेसर कालिकारंजन कानूनगो ने लिखा और प्रकाशित कराया। उस समय प्रो. कानूनगो लखनऊ विश्वविद्यालय में इतिहास के सहायक प्रोफेसर थे।

प्रोफेसर कालिकारंजन कानूनगो (1895–1972) एक प्रतिष्ठित इतिहासकार थे, जिनका जन्म बंगाल के चटगांव (अब बांग्लादेश में) स्थित कानूनगोपाड़ा गांव के एक ज़मींदार परिवार में हुआ था। उन्होंने 1917 में कलकत्ता विश्वविद्यालय से इतिहास में एम.ए. की डिग्री प्रथम श्रेणी में प्राप्त की और साथ ही क़ानून की पढ़ाई भी पूरी की। इसके बाद उन्होंने प्रख्यात इतिहासकार प्रो. जदुनाथ सरकार के निर्देशन में पीएचडी हेतु शोध कार्य आरंभ किया।

वर्ष 1920 से 1923 तक वह दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज में इतिहास पढ़ाते रहे। इसके बाद 1924 से 1948 तक उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर और रीडर के रूप में कार्य किया। बाद में वे ढाका विश्वविद्यालय में इतिहास विभाग के अध्यक्ष और प्रोफेसर नियुक्त हुए।

अखिल भारतीय जाट महासभा ने वर्ष 1965 में पुष्कर सम्मेलन के ऐतिहासिक अधिवेशन में प्रोफेसर कानूनगो को उनके अमूल्य योगदान के लिए भव्य रूप से सम्मानित किया था। उस समय इस सम्मेलन को संबोधित करते हुए प्रोफेसर कानूनगो ने कहा था- ‘यह ग्रंथ मेरे उन जाट विद्यार्थियों के उत्साह का परिणाम है, जो रामजस कॉलेज, दिल्ली में मेरे छात्र थे। मैंने 1921 में उन्हें उनके समुदाय के इतिहास पर पुस्तक लिखने का वादा किया था, जिसे मैंने 1925 में पूरा किया।‘

उन्होंने यह भी कहा था- ‘मैंने भारतीय प्राचीनता और जातीयता के अंधकारमय और अपरिचित क्षेत्रों में उतरकर जाटों की खोई हुई वंशावली को खोजने का प्रयास किया।‘

जैसे राजपूतों का इतिहास 1832 में कर्नल जेम्स टॉड ने, मराठों का इतिहास 1818–22 में जेम्स ग्रांट डफ ने और सिखों का इतिहास 1849 में जोसेफ डैवी कनिंघम ने लिखा, वैसे ही जाटों के इतिहास को शब्दबद्ध करने का महान कार्य प्रो. के. आर. कानूनगो ने किया। यह समस्त जाट समुदाय के लिए गौरव की बात है।

हम जाट समाज के लोग, प्रोफेसर कानूनगो के इस अद्वितीय योगदान को आदर और कृतज्ञता के साथ सदा याद करते हैं, जिन्होंने हमारे वीरों के इतिहास और गौरवशाली अतीत को उजागर किया।Bottom of Form

(लेखक सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी हैं।)

SP_Singh AURGURU Editor