राजद में सब कुछ ठीक नहीं! मृत्युंजय तिवारी के इस्तीफे ने खोली अंदरूनी कलह की परतें, क्या तेजस्वी की टीम पर उठते सवाल पार्टी के लिए संकट खड़ा कर रहे?

पटना। राजद के वरिष्ठ प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी के इस्तीफे ने बिहार की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। उन्होंने तेजस्वी यादव के हाईजैक होने और पार्टी में कुछ लोगों के वर्चस्व का आरोप लगाकर राजद की अंदरूनी खींचतान को सार्वजनिक कर दिया है। उनके आरोप उन चर्चाओं को भी बल देते हैं, जिनमें पहले रोहिणी आचार्य ने तेजस्वी यादव के आसपास के लोगों पर सवाल उठाए थे।

Jul 17, 2026 - 11:12
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राजद में सब कुछ ठीक नहीं! मृत्युंजय तिवारी के इस्तीफे ने खोली अंदरूनी कलह की परतें, क्या तेजस्वी की टीम पर उठते सवाल पार्टी के लिए संकट खड़ा कर रहे?

बिहार में राजद के अंदर आखिर क्या पक रहा है?

राजद हमेशा से एक परिवार-केंद्रित लेकिन मजबूत संगठन वाली पार्टी मानी जाती रही है। लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व में पार्टी ने अनेक संकट देखे, लेकिन सार्वजनिक रूप से वरिष्ठ नेताओं द्वारा नेतृत्व पर इतने तीखे आरोप कम ही देखने को मिले। मृत्युंजय तिवारी का इस्तीफा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह वर्षों तक पार्टी का आधिकारिक चेहरा रहे और मीडिया में राजद का पक्ष मजबूती से रखते रहे हैं।

संगठन बनाम 'इनर सर्किल' की लड़ाई

मृत्युंजय तिवारी का सबसे गंभीर आरोप यह है कि तेजस्वी यादव के आसपास कुछ लोगों का ऐसा प्रभाव बन गया है, जो पुराने नेताओं और कार्यकर्ताओं को नेतृत्व तक पहुंचने नहीं दे रहा। भारतीय राजनीति में इसे अक्सर इनर सर्किल या किचन कैबिनेट की समस्या कहा जाता है। यदि किसी दल में निर्णय सीमित लोगों तक सिमट जाएं तो असंतोष बढ़ना स्वाभाविक है।

लालू युग से तेजस्वी युग का संक्रमण

राजद इस समय नेतृत्व परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। लालू प्रसाद यादव सक्रिय राजनीति में पहले जैसी भूमिका में नहीं हैं और उनके छोटे पुत्र तेजस्वी यादव पार्टी का चेहरा हैं। ऐसे संक्रमण के समय पुराने नेताओं और नई टीम के बीच तालमेल की चुनौती सामने आती है। यदि यह संतुलन नहीं बनता तो असंतोष सार्वजनिक रूप ले सकता है।

रोहिणी आचार्य के आरोपों से जुड़ती कड़ियां

मृत्युंजय तिवारी के बयान इसलिए भी चर्चा में हैं क्योंकि इससे पहले रोहिणी आचार्य ने भी सोशल मीडिया पर तेजस्वी यादव के आसपास के कुछ लोगों को लेकर असंतोष व्यक्त किया था। दोनों मामलों में समान आरोप दिखाई देते हैं कि नेतृत्व तक पहुंच सीमित हो गई है। हालांकि दोनों घटनाएं अलग-अलग परिस्थितियों में हुईं और इनके आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।

क्या और इस्तीफे होंगे?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि पार्टी नेतृत्व असंतुष्ट नेताओं से संवाद नहीं बढ़ाता, तो कुछ और नेताओं की नाराजगी सामने आ सकती है। वहीं यदि नेतृत्व तत्काल संगठनात्मक बदलाव या संवाद की पहल करता है, तो नुकसान को सीमित किया जा सकता है।

राजद के सामने सबसे बड़ी चुनौती

राजद की सबसे बड़ी चुनौती अब केवल भाजपा या जदयू से मुकाबला नहीं, बल्कि संगठन के भीतर विश्वास बनाए रखना भी है। यदि पुराने कार्यकर्ताओं को सम्मान और भागीदारी का भरोसा नहीं मिला तो इसका असर चुनावी तैयारियों पर पड़ सकता है।

कुल मिलाकर मृत्युंजय तिवारी का इस्तीफा केवल एक नेता का पार्टी छोड़ना नहीं माना जा रहा, बल्कि यह राजद के भीतर चल रहे असंतोष का सार्वजनिक संकेत है। हालांकि यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि पार्टी में बड़ा विभाजन होने जा रहा है। आने वाले दिनों में राजद नेतृत्व की प्रतिक्रिया, संगठनात्मक फैसले और असंतुष्ट नेताओं को साधने की रणनीति तय करेगी कि यह विवाद एक सीमित राजनीतिक प्रकरण बनकर रह जाता है या चुनाव से पहले पार्टी के लिए गंभीर चुनौती साबित होता है।

SP_Singh AURGURU Editor