क्या उत्तर प्रदेश की अदालतों में हर साल हो रही है करोड़ों पन्नों की बर्बादी? पहले ए-4 पेपर को दी मंजूरी, फिर खुद ही वापस लिया निर्णय; वरिष्ठ अधिवक्ता के.सी. जैन ने मुख्य न्यायाधीश से की पुनर्विचार की मांग
आगरा। उत्तर प्रदेश की न्यायपालिका में हर वर्ष करोड़ों पन्नों की संभावित बर्बादी का गंभीर मुद्दा सामने आया है। वरिष्ठ अधिवक्ता एवं पर्यावरणविद् के.सी. जैन ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को विस्तृत प्रतिवेदन भेजकर इलाहाबाद हाईकोर्ट सहित प्रदेश के सभी अधीनस्थ दीवानी एवं फौजदारी न्यायालयों में ए-4 आकार के कागज पर दोनों ओर प्रिंटिंग अनिवार्य किए जाने की मांग की है। प्रतिवेदन के साथ सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत प्राप्त दस्तावेज भी संलग्न किए गए हैं, जिनसे खुलासा हुआ है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वर्ष 2020 में ए-4 पेपर को स्वीकार कर लिया था, लेकिन बाद में अपना ही निर्णय बदल दिया।
के.सी. जैन ने 21 जून 2026 को भेजे गए प्रतिवेदन में कहा है कि यदि वर्तमान में प्रयोग किए जा रहे लीगल (फुलस्केप) आकार के कागज के स्थान पर ए-4 आकार के कागज पर दोनों तरफ प्रिंटिंग लागू कर दी जाए तो प्रतिवर्ष करोड़ों पन्नों की बचत संभव है। इससे हजारों पेड़ों की कटाई रोकी जा सकेगी, जल एवं ऊर्जा की बचत होगी और सरकारी धन का भी बड़ा हिस्सा बचाया जा सकेगा।
आरटीआई में सामने आया हाईकोर्ट के फैसले का पूरा घटनाक्रम
सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत इलाहाबाद हाईकोर्ट से 9 जून 2026 को प्राप्त सूचना के अनुसार 5 नवंबर 2020 को हाईकोर्ट की प्रशासनिक समिति ने ए-4 आकार के कागज को अपनाने का निर्णय लिया था। इसके बाद 28 जनवरी 2021 को नियम समिति ने आवश्यक संशोधनों की अनुशंसा की। फुल कोर्ट ने भी इस निर्णय को अनुमोदित किया और 29 मई 2021 को अधिसूचना जारी कर इसे राजपत्र में प्रकाशित कर दिया गया। इसके बाद कार्यान्वयन के लिए प्रशासनिक आदेश का मसौदा भी तैयार किया गया।
हालांकि 10 मार्च 2022 को प्रशासनिक समिति ने अपने पूर्व निर्णय को पलट दिया और बाद में 10 अगस्त 2022 को नियम समिति ने पुनः पुराने फुलस्केप (लीगल) आकार के कागज की व्यवस्था लागू करने का निर्णय ले लिया।
के.सी. जैन का कहना है कि जब विस्तृत विचार-विमर्श के बाद नीति बन चुकी थी और नियमों में संशोधन भी हो चुके थे, तब उस निर्णय को वापस लेने के कारणों की पुनः गंभीर समीक्षा की जानी चाहिए।
एक करोड़ से अधिक लंबित मुकदमे, हर महीने लाखों नए मामले
प्रतिवेदन में कहा गया है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट में प्रतिवर्ष लगभग चार लाख नए मुकदमे दायर होते हैं। वर्तमान में हाईकोर्ट में 6,29,735 दीवानी तथा 5,99,699 फौजदारी मामलों सहित कुल 12,29,434 मामले लंबित हैं। प्रत्येक माह 33 हजार से अधिक नए मामले दर्ज होते हैं।
वहीं उत्तर प्रदेश के जिला न्यायालयों में 18,73,635 दीवानी एवं 1,00,27,742 फौजदारी मामलों सहित कुल 1,19,01,377 मामले लंबित हैं। प्रतिमाह 8 लाख 50 हजार से अधिक नए मुकदमे दायर किए जाते हैं। इन मामलों में याचिकाएं, शपथपत्र, परिशिष्ट, आदेश एवं अन्य दस्तावेजों के लिए भारी मात्रा में कागज का उपयोग होता है।
के.सी. जैन के अनुसार यदि केवल कागज का आकार बदलकर दोनों तरफ प्रिंटिंग लागू कर दी जाए तो हर वर्ष करोड़ों पन्नों की बचत संभव है।
ई-कोर्ट की बात, लेकिन कागज पुरानी व्यवस्था वाला
प्रतिवेदन में कहा गया है कि न्यायपालिका ई-फाइलिंग, ई-कोर्ट, स्कैनिंग, डिजिटल रिकॉर्ड तथा पेपरलेस कार्यप्रणाली की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है। इसके बावजूद लीगल आकार के कागज पर केवल एक तरफ प्रिंटिंग जारी रहना समय की आवश्यकता के अनुरूप नहीं है।
उन्होंने बताया कि ए-4 आकार का कागज विश्व स्तर पर मानक माना जाता है। इससे स्कैनिंग और डिजिटाइजेशन आसान होता है, फोटोकॉपी का खर्च कम आता है, रिकॉर्ड रखने के लिए कम स्थान की आवश्यकता होती है, परिवहन एवं भंडारण पर कम खर्च होता है तथा पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिलता है।
सुप्रीम कोर्ट में वर्षों से लागू है यह व्यवस्था
प्रतिवेदन में उल्लेख किया गया है कि भारत का सर्वोच्च न्यायालय कई वर्षों से ए-4 आकार के कागज पर दोनों तरफ प्रिंटिंग की व्यवस्था सफलतापूर्वक लागू किए हुए है। इससे न्यायिक कार्य में किसी प्रकार की कठिनाई नहीं आई है। देश के अधिकांश उच्च न्यायालयों में भी ए-4 आकार के कागज पर दोनों तरफ प्रिंटिंग की अनुमति है। ऐसे में इलाहाबाद हाईकोर्ट भी इस व्यवस्था को पुनः लागू कर सकता है।
सुप्रीम कोर्ट में भी लंबित है जनहित याचिका
के.सी. जैन ने बताया कि इसी विषय पर उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में रिट पिटीशन (सिविल) संख्या 324/2024 दायर की है। इस याचिका पर तत्कालीन भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति डी.वाई. चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला तथा न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने 8 जुलाई 2024 को नोटिस जारी किया था। मामले की अगली कंप्यूटर जनित तिथि 17 जुलाई 2026 निर्धारित है।
केसी जैन बोले- यह केवल कागज बदलने का नहीं, न्यायपालिका को आधुनिक बनाने का अवसर
वरिष्ठ अधिवक्ता एवं पर्यावरणविद् के.सी. जैन ने कहा कि यह केवल कागज बदलने का विषय नहीं है, बल्कि न्यायपालिका को अधिक आधुनिक, पर्यावरण-अनुकूल और किफायती बनाने का अवसर है। जब इलाहाबाद हाईकोर्ट स्वयं इस नीति को स्वीकार कर चुका था और नियमों में संशोधन भी कर चुका था, तब उस निर्णय पर पुनर्विचार पूरी तरह न्यायसंगत है। यदि उत्तर प्रदेश की समस्त न्यायपालिका में ए-4 आकार के कागज पर दोनों तरफ प्रिंटिंग अनिवार्य कर दी जाए तो प्रतिवर्ष करोड़ों पन्नों की बचत होगी, हजारों पेड़ कटने से बचेंगे, जल एवं ऊर्जा की बचत होगी, सरकारी खर्च कम होगा और ई-कोर्ट व्यवस्था को वास्तविक मजबूती मिलेगी। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि माननीय मुख्य न्यायाधीश पर्यावरण, जनहित और न्यायिक प्रशासन—तीनों दृष्टियों से इस विषय पर गंभीरतापूर्वक विचार करेंगे।