सांझी महोत्सव में कृष्ण लीलाओं की कलात्मक छटा ने मोहा मन, 40 छात्राओं ने सीखी प्राचीन लोककला
महावन/मथुरा। श्रीकृष्ण की लीलाओं को सांझी कला के विविध रूपों में उकेरने के साथ ब्रज की इस प्राचीन लोककला को नई पीढ़ी से जोड़ने की पहल ने सांझी महोत्सव-2026 को खास बना दिया है। रसखान-ताज बीबी समाधि परिसर में आयोजित महोत्सव में पानी पर तैरती सांझी, गोबर से तैयार पारंपरिक सांझी और पोर्ट्रेट पर श्रीकृष्ण की लीलाओं की कलात्मक प्रस्तुतियां दर्शकों को आकर्षित कर रही हैं। वहीं, कौशल विकास कार्यशाला में करीब 40 छात्राओं ने पेपर कटिंग से सांझी बनाने का प्रशिक्षण लिया। पांच दिवसीय महोत्सव का शनिवार, 10 अक्टूबर को अंतिम दिन है।

उत्तर प्रदेश ब्रज तीर्थ विकास परिषद और जीएलए विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित महोत्सव के चौथे दिन शुक्रवार को बड़ी संख्या में वैष्णव तीर्थयात्री पहुंचे। उन्होंने सांझी कला के विभिन्न स्वरूपों का अवलोकन किया। वृंदावन के प्रसिद्ध चित्रकार रसिक बल्लभ गोस्वामी की पानी पर तैरती सांझी ने दर्शकों का विशेष ध्यान खींचा। चित्रकार विश्वजीत और उनके साथी कलाकारों ने भी इस अनूठी विधा के माध्यम से अपनी कलात्मक प्रतिभा का प्रदर्शन किया।
धौलीप्याऊ निवासी सेवानिवृत्त प्राचार्य उमा जी ने पोर्ट्रेट पर भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं को उकेरा है। मिर्जापुर की चित्रकार खुशबू और बलदेव पब्लिक स्कूल की छात्राओं की ओर से पोर्ट्रेट पर तैयार की गई सांझी की आकर्षक रचनाएं भी दर्शकों को पसंद आ रही हैं। दक्ष एजुकेशन इंस्टीट्यूट की छात्राओं की सांझी और कार्ष्णि इंटर कॉलेज के विद्यार्थियों की रंगोली परिसर की सुंदरता बढ़ा रही हैं।
आगरा की सुनीता और अनुष्का तथा गोकुल की लक्ष्मी ने गोबर से पारंपरिक सांझी तैयार की है, जो लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। अन्य कलाकारों ने भी पोर्ट्रेट पर सांझी के माध्यम से ब्रज की लोककला और श्रीकृष्ण की लीलाओं को नए कलात्मक माध्यमों में प्रस्तुत किया है।
पेपर कटिंग से सांझी बनाने का प्रशिक्षण
महोत्सव के अंतर्गत शुक्रवार को आयोजित कौशल विकास कार्यशाला में करीब 40 छात्राओं ने पेपर कटिंग के माध्यम से सांझी बनाने की कला सीखी। वृंदावन के सांझी कला विशेषज्ञ अमरेश चंद्र भट्ट ने छात्राओं को स्टेंसिल के माध्यम से सांझी तैयार करने का प्रशिक्षण दिया।
उन्होंने बताया कि मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण के गाय चराकर लौटने पर उनके स्वागत में सांझी बनाई जाती थी। कालांतर में यह परंपरा मंदिरों में विकसित हुई और आज भी विभिन्न रूपों में जीवित है। उन्होंने कहा कि बदलते समय में इस प्राचीन कला के संरक्षण के साथ नई पीढ़ी को इससे जोड़ना जरूरी है।
प्रशिक्षण के दौरान छात्राओं ने कागज पर विभिन्न आकृतियां काटकर स्टेंसिल तैयार किए। इसके बाद स्टेंसिल के माध्यम से रंगों का प्रयोग कर सांझी बनाने का अभ्यास किया। खाजानी वूमंस इंस्टीट्यूट की निदेशक शिप्रा राठी ने कहा कि सांझी कला को कौशल विकास से जोड़ने की पहल इसके संरक्षण के साथ रोजगार और स्वरोजगार की संभावनाएं भी बढ़ा सकती है।
महोत्सव में समन्वय कर रहे चंद्र प्रताप सिंह सिकरवार ने बताया कि कार्यशाला में दक्ष एजुकेशन इंस्टीट्यूट और खाजानी वूमंस इंस्टीट्यूट, मथुरा की छात्राओं ने प्रतिभाग किया। कार्यशाला का अगला सत्र 10 अक्टूबर को आयोजित होगा।
संगोष्ठी में संरक्षण और संवर्धन पर मंथन
महोत्सव के तहत आयोजित संगोष्ठी में ब्रज की प्राचीन सांझी कला के संरक्षण, संवर्धन और नई पीढ़ी को इससे जोड़ने के उपायों पर चर्चा की गई। अनीता सिकरवार, मांडवी राठौर और संतोष रिचा सहित अन्य कलाकारों ने सांझी निर्माण की परंपराओं, इसकी कलात्मक विशेषताओं और कौशल विकास के माध्यम से इस कला को संरक्षित करने की संभावनाओं पर अपने विचार साझा किए।