दिल्ली की सीएम रेखा गुप्ता पर हमला: सुरक्षा तंत्र पर गहरे सवाल, इतिहास से सीखने का वक्त
गुजरात से आए युवक ने दिल्ली की सीएम रेखा गुप्ता पर जनता संवाद के दौरान हमला कर दिया। यह घटना सत्ता, सुरक्षा और समाज की जिम्मेदारी पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है। सख्ती और ईमानदारी से काम करने वालों की सुरक्षा शासन-प्रशासन का सर्वोच्च दायित्व है। यदि सतर्कता और त्वरित न्याय नहीं हुआ तो ऐसे हमले आम होते जाएंगे।
-डॉ. (लेफ्टिनेंट कर्नल) राजेश चौहान-
कैसी विडंबना है कि जनता सत्ता भी चाहती है, और उस सत्ता से बढ़िया से बढ़िया काम भी। पर दूसरी ओर उसी सत्ता, या सत्ता के नेतृत्व पर सरेआम हमला भी होते बर्दाश्त कर लेती है। ऐसा क्यों कि सुदूर गुजरात से एक नवयुवक दिल्ली पहुंचकर पहले रैकी करता है, और फिर सीधे जनता संवाद के दौरान भीड़ मे घुसकर, दिल्ली की सी एम रेखा गुप्ता पर अचानक वार कर देता है? क्या यह बात छोटी सी है? उसे ऐसा क्या बुरा लगा, जो गुजरात प्रदेश मे न हो रहा हो, और दिल्ली के लिए ही अनोखा और हिंसा प्रेरक हो? एक महिला पर हिंसा?
एक वाक्या याद आया। वर्षों पहले, पुणे के कोतवाल "घासीराम पांडे" ने सख्ती, निर्भयता, और कड़ाई से अपने दायित्व निभाया। पर चोर डकैतों के हिमायती लोगों ने उनको मार डाला।
पेशवा शासन काल के दौरान कार्यरत रहे घासीराम कोतवाल का घर, जेल, फांसी की जगह, और पूरा प्रांगण एक वर्ष पहले हमे दिखाया गया था। साथ मे उनका इतिहास भी बताया गया। बड़े बड़े अफसर भी साथ मे थे। पेशवा राज्य के समय घासीराम पांडे जी को उत्तर प्रदेश के प्रयागराज क्षेत्र से बुलवाया गया था, जब पुणे मे भारी अराजकता फैली हुई थी। कहते हैं कि वहां तब लूट पाट, चोरी डकैती, कत्लेआम, इत्यादि, बहुत ज्यादा फैली हुई थी। नागरिक परेशान थे, और शासन प्रशासन भी कुछ भी कर सकने मे असमर्थ हो गया था। तब "घासीराम कोतवाल" ने नियम कानून पुनः लागू किये। सख्ती तो करनी पड़ी। सुधार भी आया। आम जनता प्रसन्न और सुरक्षित थी।
सरकार की कृपा से घासीराम ने बहुत सराहनीय कार्य किया, जो कहें तो आसान नहीं था। उनके अपने नियम, अंतर्रात्मा, और कर्तव्यनिष्ठा साफ थी। किसी ने यदि गलती की है, तो उसके अनुरूप सजा भी मिलेगी। कोई डर, या प्रभाव, या कुटुंम्भ, परिवार, विचारधारा, इत्यादि का उनपर असर नहीं था। सभी को समान रूप से देखते थे।
परन्तु एक समय वह भी आया जब आम जनता को जब उनके साथ दिखना चाहिये था, वे उदासीन और बेपरवाह, कायर की तरह अपने घरों मे घुसे रहे। ऐसा तब हुआ जब उनसे हाल ही मे सजा पाये लोगों के परिवारों, जो समाज के एक विशेष वर्ग से थे, उन्होंने सजायाफ्ताओं के परिवारीजन और निकट व्यक्तियों को घासीराम जी के खिलाफ उकसा दिया।
गलती करो, तो घासीराम कोतवाल छोड़ने वाले नहीं थे। हुआ यूँ कि एक समाज के दस या बारह व्यक्तियों ने एक साथ मिलकर बहुत बड़ा काण्ड जब किया, जिसका अंजाम वे जानते ही होंगे कि फांसी होगी, तो घासीराम कोतवाल कैसे माफ करते। फांसी दी गई सभी को। फिर वैसा ही हुआ जैसा उपरोक्त बता दिया है। फांसी पाने वालों के परिवारी जनों ने पहले के सजा पाये हुए परिवारों को उकसा लिया, और उन सभी ने मिलकर घासीराम कोतवाल को बेदर्दी से तड़पा तड़पा कर मार डाला पुणे की मुख्य सड़कों पर। शासन प्रशासन और समाज मूक बना रहा।
शासन प्रशासन और सत्ता को यह तय करना चाहिये कि "घासीराम पांडे" चाहिये, या जैसा चल रहा है वैसा चलते रहने दें। यदि घासीराम पांडे को बुलाया गया है, तब क्या सत्ता, और शासन प्रशासन का दायित्व उनके साथ खड़े रहने का नहीं बनता? या उन्हें भेड़ियों के सामने छोड़ कर अपनी बला टरकाई जाये?
सी एम रेखा गुप्ता पर हिंसा कैसे होने दी? कौन उनकी निगरानी के लिए जिम्मेदार थे? शासन प्रशासन वो पुलिस और इंटेलिजेन्स के जितने भी लोग जिम्मेदार थे, उनको क्या सजा नहीं मिलनी चाहिये, और वह भी तगड़ी और तत्काल, कि जिस से बाकी को सबक मिले?
लोग बेहिचक अपना कर्तव्य निभाते रहें, और पूरी सुरक्षा भी बनी रहें, ऐसे इंतजाम की जरूरत है। आज ऐसा रेखा गुप्ता के साथ हुआ, कल किसी और के साथ हो सकता है। सतर्कता के लिए दूरी न बने, यह भी सुनिश्चित करना पड़ेगा। अन्यथा देखा तो यह गया है कि जनता से दूरियां बढ़ती ही जा रही हैं। कई बार देखा भी है कि अचानक ही अनजान जगह पर सुरक्षा घेरा स्वयं तोड़ कर प्रधानमंत्री जी भी भीड़ से मिलने निकल पड़ते हैं। डर किस बात का, यदि शासन प्रशासन पुलिस और इंटेलिजेन्स पहले से ही चुस्त दुरुस्त हों।
श्री राजीव गाँधी जी के हत्यारों की रिहाई के खिलाफ हमने आवाज उठाई थी। वे हमारे पूर्व प्रधानमंत्री थे, और उनके कातिलों को रिहाई मिल गई थी। जब समाज की आवाज उठी, तब वह रिहाई रुक गई। समाज को रेखा गुप्ता के समर्थन के लिए भी आवाज उठानी होगी, नहीं तो ऐसा ही चलता रहेगा, और "मैनू की फर्क पैन्दा" का असर और फैलता जायेगा। समझाना पड़ेगा कि फर्क पैन्दा है जी। समझाना पड़ेगा कि यदि ऐसी चेष्टा करोगे, तो त्वरित फल मिलेगा, जिसके लिए समाज, सरकार, शासन प्रशासन, पुलिस, इंटेलिजेन्स, विधि, मीडिया, और सारा विपक्ष भी साथ है।
(लेखक इंडियन आर्मी से सेवानिवृत्त हैं और आपने कई पुस्तकें लिखी हैं।)