बांस बना किसानों की आय और उद्यमिता का आधार, रुहेलखंड विवि कर रहा दुर्लभ प्रजातियों का संरक्षण

-आरके सिंह- बरेली। बांस केवल एक पारंपरिक निर्माण सामग्री ही नहीं, बल्कि रोजगार, उद्यमिता और पर्यावरण संरक्षण का भी सशक्त माध्यम बनता जा रहा है। विश्व बांस दिवस के अवसर पर रुहेलखंड विश्वविद्यालय के पादप विज्ञान विभाग में आयोजित चर्चा में विशेषज्ञों ने इसके बहुआयामी लाभों पर प्रकाश डाला।

Sep 18, 2025 - 18:18
 0
बांस बना किसानों की आय और उद्यमिता का आधार, रुहेलखंड विवि कर रहा दुर्लभ प्रजातियों का संरक्षण

औषधीय और खाद्य महत्व

विशेषज्ञों के अनुसार बांस के अंकुर (कोपलें) भोजन के रूप में इस्तेमाल होते हैं, जो फाइबर का उत्कृष्ट स्रोत हैं। इसके पत्तों में औषधीय गुण मौजूद हैं, जो रक्त शर्करा और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करने में सहायक साबित होते हैं। बांस की जड़ें मिट्टी के कटाव को रोकती हैं और यह कम पानी में भी तेजी से बढ़ता है, जिससे जल संरक्षण को बढ़ावा मिलता है। इस कारण औषधि और खाद्य उत्पादों में बांस के उपयोग से किसानों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि हो रही है।

रुहेलखंड विश्वविद्यालय की पहल

रुहेलखंड विवि के पादप विज्ञान विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. विजय कुमार सिन्हाल ने बताया कि विवि का पादप विज्ञान विभाग लंबे समय से अपने वनस्पति उद्यान में बांस की दुर्लभ प्रजातियों का संरक्षण कर रहा है। यहां काला चांस, सफेद बांस, नर बांस, बंब्यूसा स्पाइनोसा, वल्गरिस, डेंड्रोकैलम्स, मैलोकेना और बंब्यूसा नूटैंस जैसी प्रजातियां संरक्षित की गई हैं। ये प्रजातियां न केवल शोध और अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण हैं, बल्कि उद्यान में आने वाले आगंतुकों के आकर्षण का भी केंद्र बनी रहती हैं।

कृषि से उद्योग तक

डॉ. सिन्हाल ने बताया कि बरेली में बड़े पैमाने पर बांस से फर्नीचर बनाया जाता है। छात्रों को शिक्षा के साथ-साथ उद्यान में भ्रमण कराकर बांस आधारित उद्योगों से जोड़ने का भी प्रयास किया जाता है। उन्होंने कहा कि बांस तेजी से बढ़ने वाला, टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल पौधा है, जो लकड़ी का विकल्प बनकर उभर रहा है।

पारंपरिक रूप से इसका उपयोग छत, फर्श, फर्नीचर और संगीत वाद्ययंत्र (जैसे बांसुरी) बनाने में होता आया है। आधुनिक समय में बांस का उपयोग कागज, कपड़े, माचिस की तीलियां और टूथपिक जैसे दैनिक घरेलू उत्पाद बनाने में भी किया जा रहा है।

SP_Singh AURGURU Editor