तृणमूल कांग्रेस में शुरू हो गई 'असली टीएमसी' की लड़ाई, चुनाव आयोग का फैसला तय करेगा बंगाल की सियासत की दिशा

नई दिल्ली/कोलकाता। पश्चिम बंगाल की राजनीति एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गई है, जहां तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के संगठनात्मक नियंत्रण को लेकर शुरू हुआ विवाद केवल पार्टी के भीतर का मामला नहीं रह गया है। पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी और ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले गुटों के बीच चुनाव आयोग तक पहुंचा यह विवाद अब कानूनी, संगठनात्मक और राजनीतिक तीनों स्तरों पर महत्वपूर्ण बन गया है। आने वाले समय में निर्वाचन आयोग का फैसला न केवल पार्टी के नेतृत्व, बल्कि उसके चुनाव चिह्न और संगठनात्मक भविष्य को भी प्रभावित कर सकता है।

Jul 7, 2026 - 14:06
 0
तृणमूल कांग्रेस में शुरू हो गई 'असली टीएमसी' की लड़ाई, चुनाव आयोग का फैसला तय करेगा बंगाल की सियासत की दिशा

दोनों गुटों ने निर्वाचन आयोग के समक्ष अपने-अपने दावे पेश किए हैं। ममता बनर्जी गुट का कहना है कि पार्टी की वर्तमान राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय समितियां वर्ष 2027 तक वैध हैं और पार्टी का संगठन संविधान के अनुसार संचालित हो रहा है। वहीं, ऋतब्रत बनर्जी गुट का दावा है कि पार्टी में नेतृत्व परिवर्तन हो चुका है और संगठन का बहुमत उनके साथ है। यही कारण है कि दोनों पक्ष पार्टी के नाम, चुनाव चिह्न और संगठन पर अपना अधिकार जता रहे हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे मामलों में निर्वाचन आयोग आमतौर पर केवल राजनीतिक दावों के आधार पर निर्णय नहीं देता। आयोग यह देखता है कि किस गुट के पास पार्टी के संविधान के अनुरूप वैध संगठनात्मक ढांचा है, किसे निर्वाचित जनप्रतिनिधियों और संगठन के पदाधिकारियों का अधिक समर्थन प्राप्त है तथा पार्टी के आंतरिक नियम क्या कहते हैं।

इस पूरे घटनाक्रम का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि यदि आयोग को दोनों पक्षों के दावों में गंभीर विवाद दिखाई देता है और स्पष्ट बहुमत तय करना कठिन होता है, तो चुनाव चिह्न को लेकर भी विशेष निर्णय लेना पड़ सकता है। भारतीय राजनीति में पहले भी कई दलों के भीतर विभाजन के मामलों में आयोग को इसी प्रकार के फैसले लेने पड़े हैं।

विद्रोही गुट द्वारा पार्टी मुख्यालय पर दावा किए जाने से विवाद और अधिक राजनीतिक हो गया है। दूसरी ओर, ममता समर्थक नेताओं ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि यदि आवश्यकता पड़ी तो वे न्यायिक विकल्प भी अपनाएंगे। इससे यह संभावना भी बनती है कि आयोग के निर्णय के बाद मामला अदालत तक पहुंच सकता है।

राजनीतिक दृष्टि से यह विवाद ऐसे समय सामने आया है, जब पश्चिम बंगाल की राजनीति पहले से ही काफी सक्रिय दौर में है। ऐसे में टीएमसी के भीतर संगठनात्मक अस्थिरता दूसरे दलों के लिए अवसर भी बन सकती है, जबकि यदि विवाद का शीघ्र समाधान हो जाता है तो पार्टी अपने संगठनात्मक ढांचे को फिर से मजबूत करने का प्रयास करेगी।

फिलहाल सभी निगाहें निर्वाचन आयोग पर टिकी हैं। आयोग द्वारा दोनों पक्षों के दस्तावेजों, संगठनात्मक रिकॉर्ड और कानूनी दलीलों की समीक्षा के बाद जो भी निर्णय आएगा, उसका प्रभाव केवल तृणमूल कांग्रेस तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पश्चिम बंगाल की भविष्य की राजनीतिक दिशा पर भी पड़ सकता है। इसलिए यह मामला सिर्फ एक पार्टी के नेतृत्व विवाद का नहीं, बल्कि राज्य की व्यापक राजनीतिक तस्वीर से भी जुड़ गया है।

Top of Form

Bottom of Form

SP_Singh AURGURU Editor