यूपी में ‘बुलेट जस्टिस’ से लॉ एंड ऑर्डर में सुधार तो हुआ, लेकिन न्यायालय को ऐतराज!

योगी आदित्यनाथ के शासन में यूपी में अपराध पर सख़्ती से नियंत्रण और कानून-व्यवस्था में उल्लेखनीय सुधार देखने को मिला है, लेकिन पुलिस की एनकाउंटर संस्कृति पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गहरी आपत्ति जताई है। अदालत का कहना है कि सजा देने का अधिकार न्यायपालिका का है, पुलिस का नहीं, जबकि सरकार इसे अपराध नियंत्रण की मजबूरी मानती है। यह टकराव सुरक्षा और संविधान के बीच संतुलन की सबसे बड़ी बहस बन गया है।

Feb 6, 2026 - 22:26
Feb 6, 2026 - 22:27
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यूपी में ‘बुलेट जस्टिस’ से लॉ एंड ऑर्डर में सुधार तो हुआ, लेकिन न्यायालय को ऐतराज!
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-बृज खंडेलवाल-

क्या उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था योगी आदित्यनाथ के शासन में वाकई में सुधरी है, या शांति सिर्फ बंदूक की नोक पर थोप दी गई है?

यही सवाल इलाहाबाद हाईकोर्ट और यूपी सरकार के बीच विवाद का केंद्र बन गया है। यह बहस किसी एक एनकाउंटर या टिप्पणी तक सीमित नहीं है, बल्कि उस शासन-दृष्टि पर है, जो कानून, न्याय और भय के बीच संतुलन तय करना चाह  रही है।

टकराव की चिंगारी बनी हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी, जिसमें उसने प्रदेश में उभरती “एनकाउंटर संस्कृति” पर  चिंता जताई। अदालत ने  कहा कि कानून के राज में सजा देने का अधिकार न्यायपालिका का है, पुलिस का नहीं। खास तौर पर पुलिस की प्रचलित शब्दावली: “हाफ फ्राई” और “ऑपरेशन लंगड़ा”, पर कोर्ट ने कड़ा ऐतराज जताया। ये शब्द संदिग्धों को पैर में गोली मारने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं, जो न्यायिक प्रक्रिया को दरकिनार करने का संकेत देते हैं।

कोर्ट ने आशंका जताई कि कुछ मुठभेड़ें आत्मरक्षा से कम और पदोन्नति, इनामी रकम या सोशल मीडिया की वाहवाही से अधिक प्रेरित लगती हैं। इसी पृष्ठभूमि में अदालत ने कड़े दिशा-निर्देश दिए, हर एनकाउंटर में एफआईआर अनिवार्य हो, सीबीसीआईडी से स्वतंत्र जांच कराई जाए, पीड़ित या परिजनों के बयान दर्ज हों, जांच पूरी होने तक वीरता पुरस्कार रोके जाएं और उल्लंघन की स्थिति में जिलाधिकारियों तक पर अवमानना की कार्रवाई हो।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का जवाब उतना ही सीधा और राजनीतिक रूप से धारदार था। उनका संदेश स्पष्ट था, एंकाउंटर जारी रहेंगे। उनके अनुसार, पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाना बलों का मनोबल तोड़ता है और अपराधियों को हौसला देना हो सकता है। उन्होंने प्रतिप्रश्न किया, अगर अपराधी पहले गोली चलाए, तो क्या पुलिस चुपचाप खड़ी रहे? पुलिस के लिए कठोर बल कोई चॉइस नहीं, बल्कि एक जरूरत है। अपराधी सिर्फ एक भाषा समझते हैं और राज्य उसे बोलने से नहीं हिचकेगा।

यह टकराव सिर्फ रणनीति का नहीं, बल्कि शासन के दो अलग-अलग नजरियों का है। एक तरफ न्यायिक सोच है, जो प्रक्रिया, अधिकार और संविधान को सर्वोपरि मानती है। दूसरी तरफ एक ऐसा प्रशासनिक दृष्टिकोण है, जो दशकों से अपराध, भय और राजनीतिक संरक्षण से जूझते राज्य को तुरंत नियंत्रण में लाने को प्राथमिकता दे रहा है।

योगी मॉडल को समझने के लिए 2017 से पहले के उत्तर प्रदेश को याद करना जरूरी है। तब कानून-व्यवस्था का मतलब अक्सर अव्यवस्था होता था। गैंगस्टर राजनीतिक संरक्षण में समानांतर सत्ता चलाते थे। अपहरण, वसूली, जमीन कब्जा और सुपारी किलिंग रोजमर्रा की घटनाएं थीं। आम नागरिक अपराधियों से ज्यादा डरता था, पुलिस से कम। थाने जाना बदले को न्योता देना माना जाता था। सांप्रदायिक दंगे बार-बार होते थे और पुलिस राजनीतिक दबाव में निष्क्रिय दिखती थी। इस असुरक्षा का सीधा असर अर्थव्यवस्था पर पड़ता था—निवेशक डरते थे, बाजार जल्दी बंद होते थे। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों से यह स्पष्ट होता है कि 2012-2017 के बीच प्रदेश में 815 सांप्रदायिक दंगे हुए, जिसमें 192 मौतें हुईं। अपहरण के मामले 2016 में 12,000 से अधिक थे, जबकि डकैती और लूट की घटनाएं हाईवे पर आम थीं।

2017 में सत्ता संभालते ही योगी आदित्यनाथ ने यह ढांचा तोड़ने की कोशिश की। पुलिस को साफ संदेश मिला: कार्रवाई करो, सरकार साथ है। नतीजा सामने आया। हजारों मुठभेड़ें हुईं, कुख्यात अपराधी गिरफ्तार हुए, घायल पड़े या मारे गए। “पैर में गोली” अब त्वरित और विवादास्पद न्याय का प्रतीक बन गई। जो भय कभी अपराधियों का हथियार था, वही अब उनके खिलाफ इस्तेमाल होने लगा। यूपी पुलिस के आंकड़ों के मुताबिक, 2017 से 2025 तक 16,284 ऑपरेशन हुए, जिसमें 266 अपराधी मारे गए और 10,990 घायल हुए। 2025 में अकेले 48 मौतें हुईं, जो 2017 के बाद सबसे अधिक हैं।

सरकार अपने पक्ष में आंकड़े रखती है। 2017 के बाद गंभीर अपराधों में गिरावट आई। एनसीआरबी डेटा से पता चलता है कि 2016 की तुलना में 2023 तक डकैती में 94% और रोबरी में 82% की कमी आई। फिरौती के लिए अपहरण लगभग खत्म हो गए। 2023 में सांप्रदायिक दंगों की संख्या शून्य बताई गई। महिलाओं से जुड़े मामलों में चार्जशीट और सजा की दरों में सुधार हुआ; 2023 में यूपी में महिलाओं के खिलाफ अपराध की संख्या 66,381 थी (राष्ट्रीय कुल का 14.8%), लेकिन अपराध दर 58.6 प्रति लाख महिला आबादी थी, जो राष्ट्रीय औसत 66.2 से कम है। एंटी-रोमियो स्क्वायड और मिशन शक्ति जैसे अभियानों ने सार्वजनिक भरोसा बढ़ाया।

आंकड़ों से इतर, जमीनी अनुभव भी बदला है। व्यापारी देर रात तक दुकानें खोलने लगे हैं। ट्रांसपोर्टर बेखौफ होकर माल ढो रहे हैं। पुराने अपराधी या तो प्रदेश छोड़ चुके हैं या आत्मसमर्पण कर चुके हैं। थाने फिर से अधिकार के प्रतीक बने हैं। सीसीटीवी, UP-112 और तकनीकी निगरानी ने पुलिस को ज्यादा सक्रिय और जवाबदेह बनाया है। हाईवे और शहर अपेक्षाकृत सुरक्षित महसूस होते हैं, जिसका असर निवेश, राजस्व और औद्योगिक गतिविधियों पर साफ दिखता है। 2023 तक यूपी की कुल अपराध दर 335.3 प्रति लाख आबादी थी, जो राष्ट्रीय औसत 448.3 से 25% कम है।

यही है “योगी फॉर्मूला”; राजनीतिक इच्छाशक्ति और निश्चितता के जरिए भय का उलटा इस्तेमाल। यह किसी शैक्षणिक सिद्धांत से नहीं, बल्कि इस विश्वास से संचालित है कि अपराध की तात्कालिक और कठोर प्रतिक्रिया अपराधी को बैकफुट पर धकेल देती है। अफसरों का दावा है कि इसी नीति ने दंगे रोके, अपहरण गिरोह तोड़े और वह किया, जो पहले का नरम रवैया नहीं कर सका।

आज का उत्तर प्रदेश दस साल पहले वाला राज्य नहीं है। सड़कें अपेक्षाकृत शांत हैं, पुलिस मुखर है और अपराधी सतर्क। यह बदलाव वास्तविक है और काफी हद तक मापने योग्य भी। लेकिन असली सवाल अब भी कायम है; क्या यह बंदूक से हासिल की गई व्यवस्था समय के साथ इतनी परिपक्व होगी कि कानून को फिर से सर्वोच्च बना सके? या फिर ‘बुलेट जस्टिस’ खुद न्याय के रास्ते में सबसे बड़ी चुनौती बन जाएगा?Top of Form

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SP_Singh AURGURU Editor