साहस, संकल्प और नेतृत्व – नरेंद्र मोदी के राजनीतिक जीवन के 25 वर्ष
नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के रूप में 25 वर्ष के राजनीतिक सफर में गुजरात के विकास, तकनीक के इस्तेमाल, जनसंवाद और निर्णायक नेतृत्व से लेकर राष्ट्रीय राजनीति में उनके उभार तक की यात्रा सामने आती है। 2013 की आगरा विजय शंखनाद रैली से लेकर 2014 में प्रधानमंत्री बनने और आत्मनिर्भर भारत व 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य तक उनके राजनीतिक नेतृत्व के विभिन्न पड़ाव इसमें शामिल हैं।
-पूरन डावर चिंतक एवं लेखक-
नरेंद्र मोदी के राजनीतिक नेतृत्व के 25 वर्ष पूरे हो रहे हैं। वर्ष 2001 में गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शुरू हुई यह यात्रा आज देश के प्रधानमंत्री के रूप में विश्व के मंच तक पहुंच चुकी है। इन 25 वर्षों में उनके राजनीतिक सफर, नेतृत्व शैली और देश की दिशा पर पड़े प्रभाव को पीछे मुड़कर देखना इस यात्रा के विभिन्न पड़ावों को समझने का अवसर है।
मोदी जी ने 2001 में गुजरात के मुख्यमंत्री का दायित्व संभाला। भूकंप के झटकों से उबर रहे राज्य को नई दिशा देना उस समय एक बड़ी चुनौती थी। 2002, 2007 और 2012—लगातार तीन चुनावों में जनता ने उन्हें अपना विश्वास दिया। इस दौर में उन्होंने बिजली, कृषि, गांवों और उद्योग को विकास के केंद्र में रखा। 2003 में शुरू की गई ज्योति ग्राम योजना के माध्यम से गांवों में गैर-कृषि कार्यों के लिए नियमित बिजली पहुंचाने का प्रयास किया गया। ई-ग्राम जैसी पहल ने तकनीक को गांवों तक ले जाने की सोच को आगे बढ़ाया। गुजरात को निवेश और उद्योग के लिए दुनिया के सामने रखने की पहल भी इसी दौर में आकार लेने लगी। 2003 में शुरू हुआ वाइब्रेंट गुजरात सम्मेलन आगे चलकर निवेश, उद्योग और अंतरराष्ट्रीय संवाद का बड़ा मंच बना।
इन पहलों के साथ मोदी जी की पहचान एक ऐसे नेता के रूप में बनने लगी, जो बड़े लक्ष्य तय करता है, शासन को गति देता है और अपने विचारों को योजनाओं के रूप में जमीन पर उतारने का प्रयास करता है।
लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, सुषमा स्वराज सहित अनेक वरिष्ठ नेताओं की संघ और जनसंघ से लेकर भारतीय जनता पार्टी बनने तक में बड़ी भूमिका रही थी। राम जन्मभूमि आंदोलन के बाद भाजपा की छवि उभरी और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेता के नेतृत्व में भाजपा सबसे बड़ा दल बनकर एनडीए की सरकार बनाने में सफल हुई। अटल जी के बाद लालकृष्ण आडवाणी साफ-सुथरी छवि वाले नेता अवश्य थे, लेकिन जातिगत समीकरण हों या अन्य कारण, जनता उन्हें उस करिश्माई नेता के रूप में नहीं देख रही थी, जिसकी उस समय देश को तलाश थी।
2012 में बैंक ऑफ इंडिया के जोनल मैनेजर श्री सिंगला मुझसे मिलने आए। बातचीत में मैंने पूछा, इससे पहले आप कहाँ थे? उन्होंने बताया कि वे लुधियाना से आए हैं और उससे पहले पांच वर्ष गांधीनगर में रहे थे। गांधीनगर का नाम आते ही मेरी उत्सुकता बढ़ गई। मैंने तुरंत पूछा—गुजरात मॉडल और मोदी जी की बहुत चर्चा होती है। इसमें कुछ खास है या केवल बातें हैं?
सिंगला जी का तुरंत उत्तर आया—“अगर यह व्यक्ति देश का प्रधानमंत्री नहीं बना, तो देश का बड़ा दुर्भाग्य होगा।”
मैं आश्चर्यचकित था, क्योंकि इससे पहले मैंने मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने की संभावना के बारे में नहीं सुना था। मैंने उनसे इसका कारण पूछा। उन्होंने मोदी जी की कार्यशैली और क्षमता के बारे में बताया कि कैसे तकनीक का उपयोग, निर्णय लेने की क्षमता, जनता से संपर्क और संवाद, ऑनलाइन सुझाव आमंत्रित करना तथा अच्छे सुझाव देने वाले लोगों को बुलाकर सहज भाव से उनकी बात सुनना और उन्हें लागू करने पर विचार करना उनकी खूबियां हैं। सिंगला जी उन लोगों में थे, जिन्होंने मोदी जी को ऑनलाइन सुझाव दिए थे। एक साधारण बैंकर को आमंत्रित किया गया और उनसे लगभग 20 मिनट तक सहजता से बातचीत हुई। यह बात मुझे बहुत प्रभावित कर गई।
2014 के लोकसभा चुनाव आने वाले थे। 2013 की शुरुआत में ही चारों ओर “मोदी, मोदी” की आवाज सुनाई देने लगी। मेरे सहित संघ-भाजपा की विचारधारा से जुड़े हर व्यक्ति को बड़ी आतुरता से उस घोषणा की प्रतीक्षा थी कि मोदी जी को प्रधानमंत्री पद के चेहरे के रूप में तय किया जाएगा। एक-एक दिन भारी लगता था।
यह समझना होगा कि राजनीति में भारत ही नहीं, विकसित देशों में भी पार्टी के साथ-साथ नेता को अधिक तरजीह दी जाती है। नेता का करिश्मा हमेशा से अहम रहा है। देश में नेहरू जी के बाद इंदिरा गांधी और फिर राजीव गांधी को इंदिरा जी की हत्या से उपजी सहानुभूति का लाभ मिला और उन्हें एकतरफा समर्थन मिला। उसके बाद कांग्रेस लंबे समय तक प्रभावी नेतृत्व के अभाव से जूझती रही और कोई भी दल पूर्ण बहुमत की सरकार नहीं बना पाया।
2013 आते-आते मोदी जी के नेतृत्व के लिए पार्टी में जनआवाज बन गई और पार्टी को उन्हें प्रधानमंत्री पद के चेहरे के रूप में घोषित करना पड़ा। गोवा में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के बाद पूरा देश “वोट फॉर इंडिया” के नारे से गूंज उठा। गोवा में मोदी जी के भाषण में वेदों के मंत्रों और भारतीय दर्शन की गूंज सुनाई दी—“वसुधैव कुटुम्बकम्”, “एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति”, “सर्वे भवन्तु सुखिनः।” मोदी जी में देश ही नहीं, विश्व का नेतृत्व करने की क्षमता दिखाई देने लगी।
2013 में आगरा का भी सौभाग्य था कि विजय शंखनाद रैली की शुरुआत आगरा से हुई। मुझे भाग्यवश स्वागताध्यक्ष के रूप में मोदी जी के साथ मंच साझा करने का अवसर मिला। मुझे उनके उस भाषण का एक-एक शब्द आज भी अक्षरशः स्मरण है।
2014 में मोदी जी पूर्ण बहुमत से प्रधानमंत्री बने। संसद में प्रवेश से लेकर शपथ ग्रहण समारोह में पड़ोसी देशों को आमंत्रित करने तक उन्होंने संदेश दिया—हमें आपस में नहीं, गरीबी से लड़ना है; भारत और उसके पड़ोसियों की साझा समस्या गरीबी है। यह अलग बात है कि पड़ोसी देश द्वेष की मानसिकता में उलझे रहे, जबकि भारत आज विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है और पड़ोसी देश आर्थिक रूप से बहुत पीछे रह गए हैं।
उनकी नेतृत्व क्षमता, साहसिक निर्णय, “सबका साथ, सबका विश्वास”, आत्मनिर्भर भारत और 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य—इन सबकी दिशा में देश तेजी से कदम बढ़ा रहा है।
महामारी के कठिन समय में भी भारत ने जिस क्षमता से चुनौतियों का सामना किया, उसका लोहा आज भारत ही नहीं, पूरा विश्व मानता है। आज वे 75 प्रतिशत के अग्रणी नेताओं में गिने जाते हैं। नरेंद्र मोदी जी को सक्रिय राजनीति में मुख्यमंत्री एवं प्रधानमंत्री के रूप में 25 वर्ष की यात्रा पर कोटिशः बधाई। उनके दीर्घायु और दीर्घकाल तक देश का नेतृत्व करने की कामना करता हूं।
जब तक कर्तव्य है, क्षमता है और जनता की कार्यक्षमता है, तब तक रिटायरमेंट की सोच भी नहीं आनी चाहिए-
“कैसे कह दूं कि थक गया हूं मैं,
जाने कितनों का हौसला हूं मैं…”