आगरा के जलकल विभाग में करोड़ों का खेल: सामने आई महाप्रबंधक के घोटालों की आंधी, फाइलें गायब, जांच से बचने की कोशिश, नगर आयुक्त ने वित्तीय अधिकार सीज करने के लिए शासन को लिखा
आगरा। शहर के जलकल विभाग में लंबे समय से सुलग रहे भ्रष्टाचार के आरोप अब बड़े घोटाले के रूप में सामने आ गए हैं। पाइपलाइन लीकेज और नई लाइन बिछाने के नाम पर करोड़ों रुपये के घोटाले, फाइलों के गायब होने और नियमों की खुली अनदेखी के आरोपों के बीच महाप्रबंधक अरुणेंद्र कुमार राजपूत पर शिकंजा कस गया है। नगर आयुक्त अंकित खंडेलवाल ने आरोपों को गंभीरता से लेते हुए महाप्रबंधक के वित्तीय अधिकार सीज करने की संस्तुति शासन को भेज दी है, जिससे जलकल विभाग में हड़कंप मच गया है।
करोड़ों के घोटाले का खुलासा
जलकल विभाग के पास शहर में करीब 1600 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन की मरम्मत और नई लाइन बिछाने का जिम्मा था। आरोप है कि विभाग ने स्वयं निर्धारित दरों पर खरीद-फरोख्त कर भुगतान किया और इसी आड़ में 4 करोड़ रुपये से अधिक का घोटाला किया गया।
शहरवासियों की ओर से पिछले एक वर्ष से लगातार शिकायतें दर्ज कराई जा रही थीं, लेकिन महाप्रबंधक ने उन्हें नजरअंदाज करते हुए कई शिकायतों को फर्जी बताकर खारिज कर दिया।
जांच में फाइलें गायब, टीम के सामने पेश होने से इनकार
इन मामलों की शिकायतें बढ़ीं तो नगर आयुक्त अंकित खंडेलवाल ने अपर नगर आयुक्त शिशिर कुमार की अध्यक्षता में चार सदस्यीय जांच समिति गठित की। समिति ने संबंधित फाइलें मांगीं, लेकिन महाप्रबंधक द्वारा कोई दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए गए। यहां तक कि जांच टीम के सामने उपस्थित होने से भी इनकार कर दिया गया।
इसके बाद समिति ने संकलित साक्ष्यों के आधार पर रिपोर्ट नगर आयुक्त को सौंपी, जिसके बाद नगर आयुक्त द्वारा वित्तीय अधिकार सीज करने के लिए शासन को लिखने की कार्रवाई की गई।
रेन वाटर हार्वेस्टिंग और वाल्व खरीद में भी गोलमाल
जांच में कई और गंभीर अनियमितताएं सामने आईं। रेन वाटर हार्वेस्टिंग में करीब 2.5 करोड़ रुपये का गोलमाल हुआ। लखनऊ की तीन कंपनियों से 80 लाख रुपये के स्लूज वाल्व की खरीद दिखाई गई। एक ही तारीख में 40 लाख रुपये के वाल्व खरीदे गये और 5-5 लाख रुपये की फाइलों से भुगतान किया गया। पाइपलाइन मरम्मत और नई लाइन बिछाने में करीब 1 करोड़ रुपये के भुगतान का हुआ पर इनका सत्यापन नहीं किया गया।
पेंशन, प्रमोशन और नियुक्तियों में भी गड़बड़ी
विभाग में केवल निर्माण कार्य ही नहीं, बल्कि प्रशासनिक स्तर पर भी अनियमितताओं की लंबी सूची सामने आई। सेवानिवृत्त सहायक अभियंता राजकुमार शर्मा को 18 वर्ष बाद भी पेंशन व बकाया भुगतान नहीं हुआ। मृतक आश्रित भर्ती में रजनीश शर्मा, चरणजीत और ललित दक्ष के प्रमोशन पर जांच कमेटी ने सवाल उठाये हैं। सुमित पचौरी की नियुक्ति की फाइल गायब, फिर भी जेई के रूप में कार्य कर रहे हैं।
सत्यापन के बिना भुगतान, जनता के पैसे पर खेल
हन्ना गली छीपीटोला निवासी कैलाश चंद्र ने चमरौली क्षेत्र में पाइपलाइन कार्य के लिए 20 लाख रुपये के भुगतान का सत्यापन न होने की शिकायत की। ऐसे कई मामलों ने विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
तानाशाही रवैया, जनप्रतिनिधियों की भी अनसुनी
महाप्रबंधक अरुणेंद्र राजपूत पर जनप्रतिनिधियों की बातों को नजरअंदाज करने और विभाग में तानाशाही रवैया अपनाने के आरोप भी लगे हैं। विभागीय अनियमितताओं की यह लंबी सूची अब बड़े प्रशासनिक संकट का रूप ले चुकी है।
बड़ा सवाल- क्या होगी कड़ी कार्रवाई?
सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि उत्तर प्रदेश में सख्त शासन के दावे के बीच इतने बड़े भ्रष्टाचार के मामलों में अब तक निर्णायक कार्रवाई क्यों नहीं हुई। नगर आयुक्त द्वारा उठाए गए कदम के बाद अब निगाहें शासन के अगले फैसले पर टिकी हैं।