योग, साधना और शोध का अद्भुत संगम बना डीईआई, अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस की पूर्व संध्या पर पीएचडी शोधार्थियों ने दिया समग्र विकास का संदेश

आगरा। अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर दयालबाग एजुकेशनल इंस्टीट्यूट (डीम्ड टू बी यूनिवर्सिटी) में योग, शोध, अनुशासन और जीवन मूल्यों के समन्वय को रेखांकित करते हुए समग्र विकास का संदेश दिया गया। संस्थान ने कहा कि योग केवल शारीरिक व्यायाम या आसनों तक सीमित नहीं है, बल्कि स्वस्थ जीवन, मानसिक संतुलन, आत्मविकास, सेवा, अनुशासन और आध्यात्मिक उन्नति की समग्र जीवनशैली है। इस अवसर पर विभिन्न विभागों के पीएचडी शोधार्थियों ने भी अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि दयालबाग का वातावरण उन्हें बेहतर शोधकर्ता ही नहीं, बल्कि बेहतर इंसान बनने की प्रेरणा देता है।

Jun 20, 2026 - 21:28
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योग, साधना और शोध का अद्भुत संगम बना डीईआई, अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस की पूर्व संध्या पर पीएचडी शोधार्थियों ने दिया समग्र विकास का संदेश
गजल माथुर, दीक्षा, निकिता और पूनम।

दयालबाग की जीवनशैली भारतीय ज्ञान परंपरा पर आधारित है, जहां अनुशासन, सेवा, आत्मविकास और संतुलित जीवन मूल्यों को विशेष महत्व दिया जाता है। संस्थान का मानना है कि "योगः कर्मसु कौशलम्" का संदेश दयालबाग की कार्यसंस्कृति में पूरी तरह परिलक्षित होता है। यहां योग को केवल शारीरिक अभ्यास नहीं, बल्कि जीवन जीने की संपूर्ण पद्धति के रूप में अपनाया जाता है।

संस्थान में प्रतिदिन बच्चों को योगाभ्यास और सरल आसनों का प्रशिक्षण दिया जाता है। नियमित योग, व्यायाम और संतुलित दिनचर्या को दैनिक जीवन का हिस्सा बनाने के लिए प्रेरित किया जाता है। दयालबाग की आध्यात्मिक परंपरा में सहज सुरत-शब्द योग का विशेष महत्व है। प्रातःकालीन ध्यान एवं साधना के माध्यम से मन की एकाग्रता, आत्मचिंतन और आंतरिक शांति के विकास पर विशेष बल दिया जाता है।

दयालबाग की जीवनशैली में शारीरिक स्वास्थ्य को भी प्रमुख स्थान प्राप्त है। नियमित योगाभ्यास, व्यायाम, प्रकृति के निकट रहकर कार्य करना तथा सेवा-भाव से किए जाने वाले शारीरिक श्रम को स्वस्थ जीवन के आवश्यक अंग के रूप में अपनाया गया है। कृषि कार्यों में सहभागिता, सामुदायिक श्रम और नियमित शारीरिक गतिविधियां शरीर को सक्रिय रखने के साथ सहयोग, अनुशासन और उत्तरदायित्व की भावना भी विकसित करती हैं।

संस्थान में निस्वार्थ सेवा, सादगी और अनुशासन को कार्यसंस्कृति का आधार माना जाता है। समाजहित में किए जाने वाले कार्य, सामूहिक उत्तरदायित्व और सेवा-भाव के साथ दायित्वों का निर्वहन व्यक्ति के समग्र विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास को भी जीवनशैली का अभिन्न हिस्सा बनाया गया है। स्वच्छ एवं हरित वातावरण, जैविक खेती, सौर ऊर्जा के उपयोग और प्रकृति के अनुरूप दिनचर्या के माध्यम से पर्यावरण के प्रति उत्तरदायी जीवनशैली को बढ़ावा दिया जाता है।

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर डीईआई के पीएचडी शोधार्थियों ने शोध, योग और जीवन मूल्यों के संबंध में अपने विचार भी साझा किए। भौतिकी विभाग के शोधार्थी संत सरन ने कहा कि डीईआई में शोध करना केवल अकादमिक प्रक्रिया नहीं बल्कि आत्मविकास की यात्रा है। यहां शोध निर्देशक विद्यार्थियों के मार्गदर्शक, सहयोगी और संरक्षक के रूप में हर चुनौती में उनका साथ देते हैं।

संस्कृत विभाग की शोधार्थी ग़ज़ल माथुर ने कहा कि शोध केवल नए ज्ञान की खोज नहीं, बल्कि व्यक्ति के दृष्टिकोण, धैर्य और जीवन को समझने की क्षमता का भी विकास करता है।

शोधार्थी निकिता सत्संगी ने कहा कि पीएचडी के दौरान अनेक चुनौतियां आती हैं, लेकिन दयालबाग का सकारात्मक वातावरण, योग और ज्ञान आधारित नियमित दिनचर्या मानसिक संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण सहयोग प्रदान करती है।

शोधार्थी दीक्षा शर्मा ने कहा कि डीईआई का वातावरण विद्यार्थियों को उत्कृष्ट शोधकर्ता बनने के साथ-साथ संवेदनशील, जिम्मेदार और नैतिक मूल्यों से परिपूर्ण नागरिक बनने की प्रेरणा देता है।

संस्कृत विभाग की शोधार्थी पूनम सिंह ने कहा कि दयालबाग की जीवनशैली में शारीरिक स्वास्थ्य को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है तथा प्रतिदिन योग को नियमित दिनचर्या का अनिवार्य हिस्सा बनाया गया है।

शोधार्थियों ने सामूहिक रूप से संदेश दिया कि जब शिक्षा और शोध में ज्ञान के साथ योग, साधना, अनुशासन, सेवा और मानवीय मूल्यों का समावेश होता है, तब शिक्षा केवल व्यक्तिगत उपलब्धि तक सीमित नहीं रहती, बल्कि समाज और राष्ट्र निर्माण का सशक्त माध्यम बन जाती है।

SP_Singh AURGURU Editor