नेपाल से आए हाथियों ने बदला बसेरा, पीलीभीत के जंगलों में छह महीने से डेरा; क्या बन रहा है नया स्थायी आशियाना?

-आरके सिंह- बरेली। अपनी समृद्ध जैव विविधता और बाघों के प्राकृतिक आवास के लिए प्रसिद्ध पीलीभीत टाइगर रिजर्व में इन दिनों वन्यजीवों के व्यवहार में एक बड़ा और चिंताजनक बदलाव देखने को मिल रहा है। सामान्यतः नेपाल और उत्तराखंड के जंगलों से आने वाले प्रवासी हाथी यहां 15 से 20 दिन तक रुकने के बाद अपने पुराने आवासों की ओर लौट जाते थे, लेकिन इस बार दो प्रवासी हाथियों ने पिछले करीब छह महीनों से पीलीभीत टाइगर रिजर्व को ही अपना ठिकाना बना लिया है। हाथियों का इतने लंबे समय तक यहां डेरा जमाए रखना वन्यजीव विशेषज्ञों के लिए अध्ययन और चिंता का विषय बन गया है। विशेषज्ञ इसे तराई के जंगलों में बदलते पारिस्थितिक संतुलन और सीमा पार बढ़ते मानवीय हस्तक्षेप का संकेत मान रहे हैं।

Jul 27, 2026 - 13:12
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नेपाल से आए हाथियों ने बदला बसेरा, पीलीभीत के जंगलों में छह महीने से डेरा; क्या बन रहा है नया स्थायी आशियाना?
पीलीभीत टाइगर रिजर्व में विचरण करते हाथी।

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पीलीभीत टाइगर रिजर्व के निदेशक एवं बरेली के मुख्य वन संरक्षक पी.पी. सिंह ने बताया कि वर्ष 2019 में भी नेपाल से दो हाथी इस क्षेत्र में आए थे। उस समय उन्होंने क्षेत्र में काफी उत्पात मचाया था और जनहानि की घटनाएं भी हुई थीं। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए वन विभाग ने उन हाथियों को 19 ट्रकों में लादकर नेपाल सीमा के समीप छोड़ दिया था। उनका कहना है कि इस बार हाथियों का लंबे समय तक यहां रुकना सामान्य प्रवास से अलग स्थिति है और वन विभाग इस पर लगातार नजर बनाए हुए है।

जाने-माने वन्यजीव एवं हाथी विशेषज्ञ दबीर हसन का कहना है कि जब किसी वन्यजीव के मूल प्राकृतिक आवास में मानवीय गतिविधियों का दबाव बढ़ता है, तो वह सुरक्षित और अनुकूल स्थानों की तलाश करता है। उनका मानना है कि नेपाल के तराई क्षेत्रों में बढ़ती आबादी, नई बस्तियों का विस्तार, सड़क एवं अन्य बुनियादी ढांचों के विकास ने हाथियों के पारंपरिक रास्तों और प्राकृतिक आवासों को प्रभावित किया है। ऐसे में हाथी अपने पुराने परिवेश में स्वयं को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं और नए सुरक्षित जंगलों की तलाश कर रहे हैं।

उन्होंने बताया कि ठीक ऐसी ही स्थिति पहले कतर्नियाघाट वन्यजीव प्रभाग में भी देखने को मिली थी। शुरुआत में नेपाली हाथी वहां कुछ दिनों के लिए आते थे, लेकिन धीरे-धीरे अनुकूल वातावरण मिलने और मूल आवासों में व्यवधान बढ़ने के कारण उन्होंने कतर्नियाघाट को ही स्थायी ठिकाना बना लिया। अब पीलीभीत टाइगर रिजर्व में भी वही परिस्थितियां बनती दिखाई दे रही हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यह प्रवृत्ति जारी रही और प्रवासी हाथियों ने पीलीभीत को स्थायी आवास के रूप में स्वीकार कर लिया, तो आने वाले समय में पूरे क्षेत्र में मानव-हाथी संघर्ष की घटनाएं बढ़ सकती हैं। वर्तमान में भी ये हाथी जंगल की सुरक्षा के लिए लगाई गई मजबूत चेन लिंक फेंसिंग को तोड़ रहे हैं और जंगल से लगे गांवों में घुसकर किसानों की फसलों को भारी नुकसान पहुंचा रहे हैं।

लगातार फसल बर्बाद होने और रिहायशी क्षेत्रों के आसपास हाथियों की मौजूदगी से ग्रामीणों में भय और नाराजगी का माहौल है। वन विभाग के सामने एक ओर वन्यजीव संरक्षण की चुनौती है तो दूसरी ओर ग्रामीणों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी भी है।

वन्यजीव विशेषज्ञों का सुझाव है कि वन विभाग को हाथियों की लगातार मॉनिटरिंग, उनके मूवमेंट की वैज्ञानिक ट्रैकिंग, वन्यजीव कॉरिडोर की सुरक्षा तथा सीमावर्ती गांवों में व्यापक जनजागरूकता अभियान चलाने की आवश्यकता है। साथ ही मानव-हाथी संघर्ष को रोकने के लिए दीर्घकालिक और व्यावहारिक नीति तैयार करना समय की सबसे बड़ी जरूरत बन गई है।

यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो पीलीभीत टाइगर रिजर्व में यह बदलता वन्यजीव व्यवहार भविष्य में संरक्षण और मानव सुरक्षा, दोनों के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है।

SP_Singh AURGURU Editor