गीतानंद महाराज की 20वीं पुण्यतिथि पर कल वृंदावन में जुटेंगे देश-विदेश से अनुयाई, गोविंदाचार्य भी पहुंचेंगे

Nov 23, 2024 - 17:13
Nov 23, 2024 - 21:33
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गीतानंद महाराज की 20वीं पुण्यतिथि पर कल वृंदावन में जुटेंगे देश-विदेश से अनुयाई, गोविंदाचार्य भी पहुंचेंगे

वृंदावन/मथुरा। राष्ट्रसंत गीतानन्द महाराज की 20वीं पुण्यतिथि वृंदावन के गांधी मार्ग स्थित गीता आश्रम में 24 नवंबर को भव्यता के साथ मनाई जा रही है। भारतीय जनता पार्टी के थिंकटैंक और महामंत्री संगठन रहे केएन गोविंदाचार्य ब्रह्मलीन गीतानंद महाराज को पुष्पांजलि देने के लिये वृंदावन पहुंच रहे हैं।

मुमुक्षु मंडल और गीता आश्रम वृन्दावन के प्रमुख महामंडलेश्वर डॉ. स्वामी अवशेषानन्द महाराज ने बताया कि इस भव्य आयोजन में अमेरिका,  इंग्लैंड,  कनाडा आदि देशों में रहने वाले महाराजश्री के शिष्य और अनुयायी बड़ी संख्या में भाग लेंगे।इस अवसर पर हजारों साधुओं तथा जरूरतमंदों को ऊनी वस्त्र और कंबल आदि दिये जायेंगे। 24 नवंबर को सुबह 10 बजे से 11.30 तक श्रद्धांजलि सभा होगी। उसके बाद 11.30 बजे से भंडारा शुरू हो जायेगा।

डॉ. स्वामी अवशेषानंद ने बताया कि ब्रह्मलीन संत गीतानन्द महाराज ने अपने जीवन के आखिरी समय तक जनहितकारी कार्यों से समाज के प्रत्येक वर्ग की मदद करने का प्रयास किया था। उत्तर भारत के वे ऐसे महान संत थे जो घट- घट में भगवान के दर्शन करते थे तथा जिनका कार्य क्षेत्र उनके द्वारा देश के विभिन्न भागों में स्थापित किए गए आश्रमों के साथ आश्रम के बाहर भी था। उनकी आराधना का मूल मंत्र था "प्रभु तुम हरौ जनन की पीर''।

वे ऐसे महान बिरले संत थे जिन्हें गीता न केवल कंठस्थ थी बल्कि गीता को उन्होंने अपने जीवन में उतारा भी था। गाय में 33 करोड़ देवताओं का वास होता है, इसलिए उन्होंने गोशालाओं,  पढ़ने के लिए संस्कृत पाठशाला,  चिकित्सा के लिए समय-समय पर विभिन्न प्रकार के शिविरों का आयोजन कराया। संतों के लिए अन्न क्षेत्र, वृद्धों के लिए वृद्धाश्रम की स्थापना, हरिजन बच्चों के लिए हरिजन छात्रावास स्थापित किए। प्राकृतिक आपदा में पुनर्वास एवं राहत कार्य भी इस महान संत के त्यागमय जीवन की कहानी के पन्ने बोलते हैं।

स्वामी गीतानन्द महाराज ने गीता के रहस्य को मानव जीवन में उतारने के मूलमंत्र को इस प्रकार प्रस्तुत किया कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के मुंह से सहज ही निकल पड़ा था कि यदि अन्य संत इसी भावना को लोगों तक पहुंचाने का प्रयास करें तो भारत अपने पुराने गौरव को प्राप्त कर सकता है।

कारगिल युद्ध के बाद प्रधानमंत्री कोष में जमा करने के लिए जब महान संत ने 11 लाख रुपये की थैली तत्कालीन प्रधानमंत्री  अटल बिहारी वाजपेयी को सौंपी तो वाजपेयी अभिभूत होकर उक्त प्रतिक्रिया व्यक्त कर गए थे, परन्तु अहंकार से सर्वथा परे संतजी ने यह कहकर वाजपेयी को और आश्चर्यचकित कर दिया था कि इसमें उनका कुछ भी योगदान नहीं है। उन्होंने तो वही काम किया है जो एक पोस्टमैन करता है। यह धनराशि उनके शिष्यों की है जिसे उन्होंने प्रधानमंत्री रक्षा कोष को दिया है।

उनका सिद्धान्त था कि दान इस प्रकार दिया जाना चाहिए कि दाहिने हाथ से दिये गए दान का पता बाएं हाथ को भी न चल सके। स्वामी गीतानन्द महाराज दीपक की तरह थे, जिन्होंने न केवल शिष्यों को बल्कि सम्पूर्ण मानवता को अंधकार से निकालकर समाजसेवा का ऐसा सन्मार्ग दिखाया जो वास्तविक मोक्ष का साधन है। उनका कहना था कि भगवत गीता मानव जीवन के जीने का विज्ञान है।

स्वामी गीतानन्द महाराज ने गीता पर प्रवचनों के माध्यम से समाज को बताया कि मनुष्य अपने कार्य एवं साधना से मानव की सेवा किस प्रकार कर सकता है। महाराजश्री के पास जो भी आया उसके मन को ऐसी शांति मिली कि उसके लिए वृन्दावन का अनूपयति गीता आश्रम ही तीर्थ बन गया।

SP_Singh AURGURU Editor