ब्रह्मा से ईब्राहिम तक: सभ्यताओं, धर्मों और मानवता की साझा कहानी
सभी धर्मों, पंथों और सभ्यताओं की उत्पत्ति एक ही मूल स्रोत से हुई हो सकती है। समय के साथ अलग-अलग मान्यताओं, परंपराओं और विचारधाराओं ने उन्हें अलग पहचान दी, लेकिन मूल भाव एक ही रहा। स्वार्थ, सत्ता संघर्ष और ऐतिहासिक घटनाओं ने मानव समाज को विभिन्न वर्गों और समुदायों में बांट दिया, जिससे मतभेद और टकराव पैदा हुए। इसके बावजूद मानवता, सह-अस्तित्व और आपसी सम्मान की भावना ही सबसे बड़ा सत्य है। भिन्न मार्गों पर चलने के बाद भी सभी का अंतिम उद्देश्य जीवन, सत्य और शांति की खोज ही है।
-डॊ. (लेफ्टिनेंट कर्नल) राजेश चौहान-
मान्यता है कि त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु, महेश के अवतरण के पश्चात ही पृथ्वी पर जीवन का प्रारम्भ हुआ। ऐसे में सनातन की उत्पत्ति सबसे पहले हुई। जम्बू महाद्वीप और उसके आसपास इसका विस्तार सर्वप्रथम हुआ। विद्वान यह खोजने में लगातार लगे हुए हैं कि इसका छोर कहां तक था। बौद्ध, जैन धर्म और सिख पंथ भी इन्हीं में से थे। पहले दो तो ईसा पूर्व समय से ही थे।
लगभग सभी मिस्र, यूनानी, फारसी, असुर प्रदेश, मेसोपोटामिया, ग्रीस आदि अन्य समकालीन पनपती सभ्यताओं के विषय में जानते ही होंगे। ये सभी सभ्यताएं जब अपने यौवन पर थीं, तब ब्रह्मा जी का एक बार फिर से विवरण आता है, जब उन्हें ब्रह्मा न बुलाकर ए-ब्रह्मा या ईब्राह्म के नाम से पुकारा गया।
आज तर्क के हिसाब से यह कह पाना बेहद मुश्किल होगा कि ब्रह्मा अपभ्रंश था, या फिर पीढ़ियां गुजर जाने के बाद सामने आया सम्बोधन ईब्राह्म अपभ्रंश था। उत्पत्ति तो उन्हीं से हुई, और उनकी संगिनी भारत महाद्वीप पर सरस्वती को मानते आए हैं, तथा पश्चिम में ईब्राह्म जी के साथ सारा जी को उनकी संगिनी मानते हैं। यदि गूगल किया जाए अथवा चैट-जीपीटी से पूछा जाए, तो अनेक समानताओं के उदाहरण आसानी से मिल जाते हैं।
जगजाहिर है कि यहूदियों की उत्पत्ति भी ईब्राहम से ही तो है। 'तोराह' के दर्शन में ईब्राहम के भाव और दर्शन हैं। ईसा मसीह और ईसाई धर्म का जन्म भी यहूदियों से ही तो है। और एक शाखा मुहम्मद साहब से भी जुड़ी है, जिनका रहन-सहन, मान्यताएं, विचारधारा, सामाजिक संगठन तथा पूजा-अर्चना की विधि सभी कुछ समान होकर भी अलग है।
ब्रह्मा जी पर पुनः आते हैं। उनके लिए तो उनके सभी बच्चे समान होने चाहिए, चाहे उन्होंने कोई भी पंथ या धर्म अपनाया हो। परन्तु हुआ यह कि किसी को कहीं भेज दिया गया और कोई कहीं अन्य विचारधारा में चला गया। यहीं से तो दुश्मनी और संघर्ष के बीज पुरातन काल में ही बो दिए गए।
जानते-समझते तो सभी हैं कि सभी एक हैं। फिर भी पुराने जख्म हरे ही बने हुए हैं। कोई उन्हें भरने देने का समय ही नहीं दे रहा, और कुछेक तो गहरी खाई बनी रहने देना चाहते हैं। जब तक हालात थोड़े सुधरते हैं, तब तक कहीं से आवाज उठ खड़ी होती है कि उनको तो जीने का हक भी नहीं है। किसने आखिर हक दिया है यह तय करने का कि जीने का हक मिलेगा भी या नहीं। ब्रह्मा हों या ईब्राहिम? कैसे कोई मान लेगा? कैसे स्वतः ही अपना गला कोई काट लेगा, जिससे दूसरे को कम से कम खुशी और चैन की सांस मिले?
जीवन संघर्ष है, यह सर्वविदित है। परन्तु ब्रह्म माया की वजह से अनन्त काल से अनेक वरदान मिलते रहे हैं, जब विष्णु हरि और शिव जी को बीच-बीच में उतरना पड़ा है। करे कोई, भरे कोई। ब्रह्म माया सुनिश्चित है, और उसके फल तथा प्रतिफल समय-समय पर प्रकट होते ही रहेंगे। बड़े-बड़े ज्ञानी-ध्यानी जग में आते-जाते रहे। समझाने के लाख प्रयत्न किए। परन्तु हमारी फितरत बन चुकी है कि करेंगे हम वही जो हमें दुरुस्त लगेगा। और दुरुस्त तो अक्सर वही लगता आया है, जिसमें हमारा निहित स्वार्थ सिद्ध होता रहे।