हरित आंदोलन का हरा चश्मा और आगरा की धुंधली तस्वीरः कभी मिल बैठकर साझा एजेंडा और स्ट्रेटजी भी बने!

पर्यावरण संरक्षण आंदोलन की अब तक की दिशा और उसकी सीमाएं सवालों के घेरे में हैं। वर्षों से अदालतों, एनजीटी और आरटीआई के माध्यम से कानूनी लड़ाई तो लगातार लड़ी गई, लेकिन हवा और यमुना की स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ। केवल न्यायिक आदेश, जुर्माने और मुकदमे पर्याप्त नहीं हैं। पर्यावरण संरक्षण के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति, जवाबदेह प्रशासन, वैज्ञानिक नगर नियोजन, विभागों के बीच समन्वय और सबसे बढ़कर जनता की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है। व्यापक जनआंदोलन और साझा रणनीति के बिना आगरा के पर्यावरण संकट का स्थायी समाधान संभव नहीं है।

Jul 20, 2026 - 17:35
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हरित आंदोलन का हरा चश्मा और आगरा की धुंधली तस्वीरः कभी मिल बैठकर साझा एजेंडा और स्ट्रेटजी भी बने!

-बृज खंडेलवाल-

आगरा में पर्यावरण बचाने की लड़ाई पिछले कई दशकों से सिर्फ एक ही ढर्रे पर घूम रही है ;  अदालत, आरटीआई, एनजीटी। याचिका दायर होती है, आदेश आता है, जुर्माना लगता है, अखबारों में खबर छपती है ,  और फिर सब कुछ वहीं का वहीं। हवा वैसी ही ज़हरीली, यमुना वैसी ही मरी हुई। साफ बात यह है कि इलाज खूब हो रहा है, बीमारी ठीक होने का नाम नहीं ले रही।

वरिष्ठ पर्यावरणविद एम.सी. मेहता की जनहित याचिका से ताज ट्रेपेजियम ज़ोन (TTZ) बना, उद्योग बंद हुए या बाहर धकेले गए, कोयला-कोक जैसे ईंधनों पर रोक लगी। उम्मीद थी कि हवा साफ होगी, नदी ज़िंदा होगी। हुआ उल्टा ,  हज़ारों लोगों का रोज़गार छिन गया, उद्योग तबाह हुए, लेकिन हवा और गंदी हुई, यमुना और सड़ी।

आज भी आगरा का AQI अक्सर 100 से 150 के बीच झूलता रहता है। हवा में धूल के महीन कण विश्व स्वास्थ्य संगठन की तय सीमा से कई गुना ज़्यादा हैं। ताजमहल कई-कई दिन धुंध की चादर में गुम रहता है, और पर्यटक खुली हवा में सांस लेने से पहले दो बार सोचते हैं। यह किसी शहर की नहीं, एक विश्व धरोहर की बेइज़्ज़ती है।

यमुना का हाल तो और भी शर्मनाक है। बिना ट्रीट किया सीवर सीधे नदी में उंडेला जा रहा है। पानी में गंदगी इतनी है कि कई जगह ऑक्सीजन लगभग खत्म हो चुकी है ; यानी नदी नहीं, यह एक बहता हुआ नाला है। जलीय जीव इसमें ज़िंदा नहीं रह सकते, इंसान तो दूर की बात है।

हाल ही में एनजीटी ने यमुना में गंदा पानी बहाने पर आगरा नगर निगम पर 58.39 करोड़ रुपये का पर्यावरणीय जुर्माना ठोका। सुप्रीम कोर्ट ने भी इसे बरकरार रखा। निगम को 10 करोड़ जमा करने और नया सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट बनाने का आदेश मिला। ठीक है, कार्रवाई हुई ,  मगर असली सवाल यह है: क्या जुर्माना भरने से नदी साफ हो जाएगी? यह पैसा भी आखिर जनता की जेब से ही निकलेगा। जब तक अफसर और नेता निजी तौर पर जवाबदेह नहीं ठहराए जाते, तब तक ऐसे आदेश सिर्फ फाइलों की शोभा बढ़ाते रहेंगे।

आगरा में जोशी साहब, रमन जी, डॉ देवाशीष भट्टाचार्य, डॉ संजय चतुर्वेदी, डॉ शरद गुप्ता, डॉ मुनीश्वर गुप्ता, डॉ संजय कुलश्रेष्ठ, एडवोकेट के.सी. जैन, डॉ मुकुल पांड्या, श्री जगन प्रसाद तेहरिया जैसे लोगों ने बरसों पर्यावरण के लिए लड़ाई लड़ी है। उनकी नीयत और मेहनत पर कोई उंगली नहीं उठा सकता। लेकिन कड़वा सच यह भी है कि यह लड़ाई मुट्ठी भर लोगों तक सिमट कर रह गई। अदालत से आदेश मिलते रहे, ज़मीन पर अमल नहीं हुआ। कीठम झील का जंगल नहीं बचा, तालाब एक-एक कर घिरते गए। विभागों में तालमेल नहीं, नेताओं में इच्छाशक्ति नहीं, और खुद सिविल सोसाइटी में भी एकजुटता और साफ रणनीति की कमी रही।

सबसे बड़ा तमाशा यह है कि TTZ बनने के बाद भी अवैध कॉलोनियां बेरोकटोक बसती गईं, हरित क्षेत्र सिकुड़ते गए, यमुना और गंदी होती गई। मुकदमे चलते रहे, अफसर जवाब देते रहे, निगम जुर्माना भरता रहा ; लेकिन जिन जनप्रतिनिधियों को असली जवाबदेही तय करनी थी, उनसे कभी सख्ती से सवाल नहीं पूछा गया। शहर बिना किसी दिशा के बढ़ता रहा, और नगर नियोजन सिर्फ फाइलों में क़ैद रहा।

सच कहें तो पूरा दोष अदालतों या कार्यकर्ताओं पर मढ़ना नाइंसाफी होगी। असली ज़िम्मेदारी राजनीति और शासन की है। लेकिन हरित आंदोलन को भी आईने में अपनी शक्ल देखनी होगी। सिर्फ अदालत के भरोसे बैठे रहना अब चलने वाला नहीं। लोगों को साथ जोड़ना होगा, जनमत तैयार करना होगा, नेताओं पर लोकतांत्रिक दबाव बनाना होगा, और वैज्ञानिक सोच के साथ शहर की योजना बनानी होगी ; वरना यही चक्र दोहराता रहेगा।

अदालतें इंसाफ़ दिला सकती हैं, शासन नहीं चला सकतीं। आगरा को मुकदमों से ज़्यादा जवाबदेह राजनीति, ईमानदार प्रशासन और जनता की सक्रिय भागीदारी चाहिए। तभी पर्यावरण बचाने की मुहिम सच में कामयाब होगी, और आगरा की धुंधली तस्वीर साफ़ होगी।

अब वक्त सिर्फ मुकदमे लड़ने का नहीं, नीयत और ज़मीन पर अमल दिखाने का है। जनता को लामबंद किए बिना कोई बड़ा बदलाव नहीं आएगा ;  वरना हर कोई अपनी ढोलक बजाता रहेगा, अपना भजन गाता रहेगा, और शहर धुंध में डूबा रहेगा।

SP_Singh AURGURU Editor