भारत में बढ़ती धार्मिकता: सेक्युलर परछाइयों से खुली आस्था तक का सफ़र

धार्मिक _सांस्कृतिक उभार  क्या भारत सशक्त होगा या विश्वास की खाई चौड़ी होगी?

Sep 28, 2025 - 22:58
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भारत में बढ़ती धार्मिकता: सेक्युलर परछाइयों से खुली आस्था तक का सफ़र

बृज खंडेलवाल द्वारा 

नए भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक क्रांति अब वैश्विक धरातल पर अपनी पहचान बना रही है। भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में हिंदू दर्शन, योग, आयुर्वेद, सात्विक आहार और जीवनशैली के प्रति एक नया आकर्षण और जिज्ञासा का उभार देखने को मिल रहा है। 

इस बदलाव की एक झलक विदेशों में तैंतीस वर्षों से कार्यरत एक डॉक्टर के इस विश्लेषण में मिलती है: "आज की युवा पीढ़ी, जो प्रोफेशनल्स के तौर पर विदेश जा रही है, वह अपनी सांस्कृतिक जड़ों पर गर्व महसूस करती है। यह गर्व और आत्मविश्वास कई बार स्थानीय लोगों को 'अभिमान' या 'उद्दंडता' तक लगने लगता है। जहाँ पिछली पीढ़ियां भारतीय कुली के रूप में जाते थे, दबे-कुचले रहते थे, आज का भारतीय अपनी संस्कृति और धर्म के प्रति पूरी तरह से सजग और प्रदर्शनकारी है।"

यह सिर्फ प्रवासी मानसिकता का बदलाव नहीं, बल्कि एक नए वैश्विक नैरेटिव का जन्म है। पिछले पचीस बरसों में भारत का धार्मिक लैंडस्केप ग़ज़ब की तब्दीली से गुज़रा है। जो मुल्क कभी सेक्युलरिज़्म की नक़ाब ओढ़े, पश्चिमी असर वाले झूठे प्रोग्रेसिव उसूलों की बात करता था, वही आज खुलेआम ईमान और आस्था को गले लगाता दिखाई देता है। टेक्नॉलॉजी, सोशल मीडिया, सियासी जागरूकता और क़ौमी तनावों ने इस रुझान को और तेज़ किया है। नतीजा –" समाज में दरारें, सख़्तगी, और मज़हबी इज़हार का शोर-शराबे वाला तमाशा। जो कभी दिलों में दबा हुआ सूफ़ियाना जज़्बा था, अब सड़कों पर जुलूसों, नए मंदिरों और नौजवानों में बढ़ रहा फंडामेंटलिज्म में नज़र आता है," अमेरिका से लौटे झा साहब बताते हैं।

सामाजिक एक्सपर्ट्स मानते हैं कि अल्पसंख्यकों की तुष्टिकरण सियासत, पड़ोसी मुल्कों में हिंदुओं पर ज़ुल्म, और डिजिटल दौर की नफ़रत भड़काने वाली ताक़तें इस तबदीली की असली वजहें हैं। आँकड़े साफ़ बताते हैं कि आज़ादी के बाद के "सेक्युलर ढोंग" से समाज अब अपनी मौलिक पहचान की तरफ़ लौट रहा है। इसका एक आयाम है शहरों में धार्मिक स्थलों की संख्या में विस्फोट। NCR में तो हर हाउसिंग सोसाइटी अपने कॉम्प्लेक्स में पूजा स्थल  बना रही है ताकि लोग वहाँ रहना पसंद करें। सरकार का अरबों डॉलर का "मंदिर टूरिज़्म" प्रोजेक्ट, और धार्मिक आयोजनों को सपोर्ट इस रुझान को मजबूती देता है। यहाँ तक कि अमरीका में सालों गुज़ारने वाले पढ़े-लिखे नौजवान भी अब कह रहे हैं कि "सेक्युलरिज़्म पश्चिम का इम्पोर्ट है, हमारी तहज़ीब से मेल नहीं खाता।"

मंदिरों की दीवानगी इतनी है कि नोएडा में अन्य जगहों की सोसाइटीज लोग उनके यहाँ रहने के लिए प्रेरित हों, इसके लिए मंदिर बनाने की होड़ में हैं। Prof पारस नाथ चौधरी इस उछाल का कारण "धर्मनिरपेक्षता के अतिशय प्रवचन" और हिंदुओं का गैर-हिंदुओं द्वारा "भारी पड़ने" का डर मानते हैं, जो यह दर्शाता है कि पश्चिम में पढ़े-लिखे पेशेवर भी आयातित धर्मनिरपेक्षता को खारिज कर स्वाभाविक आध्यात्मिकता को गले लगा रहे हैं।

समाज शास्त्री टीपी श्रीवास्तव एक्सप्लेन करते हैं, "एक समय धर्मनिरपेक्षता का लबादा ओढ़े, जो प्रगतिशील, पश्चिमी प्रभावित मूल्यों को बढ़ावा देता था, अब देश में आस्था का खुला प्रदर्शन हो रहा है। यह बदलाव, प्रौद्योगिकी, सोशल मीडिया, राजनीतिक जागृति और सांप्रदायिक तनावों से प्रेरित, ने विभाजन को बढ़ाया, उग्रवाद को हवा दी और धार्मिक अभिव्यक्ति को प्रतिस्पर्धी तमाशे में बदल दिया। जो कभी सूक्ष्म धार्मिक धाराएँ थीं, वे अब शोर-शराबे वाले जुलूसों, बढ़ते मंदिरों और युवा पीढ़ी के कट्टर रुझान में उभर आई हैं।"

टेक्नॉलॉजी ने बदलाव की प्रक्रिया तेज की है। सोशल मीडिया के "echo chambers" मज़हबी उन्माद फैलाते हैं। मीडिया भी धार्मिक कवरेज को काफी महत्व दे रही है।  Gen Z  मॉडर्न सोच के साथ अब यात्राओं, जागरण, भंडारों में जोश और सख़्त रवैयों की तरफ़ बढ़ रही है। सोशल मीडिया पर "स्पिरिचुअल टूरिज़्म" का नया जुनून है। पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिंदुओं पर ज़ुल्म की ख़बरें इस तबके को और प्रेरित कर रही हैं।

युवा पीढ़ी, जिसे कभी आधुनिकता का प्रतीक माना जाता था, तेजी से धार्मिक उग्रवाद को अपना रही है। सर्वेक्षण दिखाते हैं कि अब 70% से अधिक भारतीय उच्च शक्ति में दृढ़ विश्वास रखते हैं, जो पहले की तुलना में बढ़ा है, और जनरेशन Z सोशल मीडिया के माध्यम से आध्यात्मिक पर्यटन को बढ़ावा दे रही है।  पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचारों ने इस जनसांख्यिकीय को और जागृत किया है, जिसने धर्मनिरपेक्ष निद्रा को झकझोर दिया है।

लंबे अरसे से चली आ रही "माइनॉरिटी अपीज़मेंट पॉलिटिक्स" ने बहुसंख्यक हिंदुओं में बेचैनी और जागरूकता पैदा की है। अब हर मज़हब अपनी-अपनी ताक़त दिखाने में लगा है। भारत आज इस मज़हबी नवीनीकरण के दौर से गुज़र रहा है। सवाल यह है कि क्या यह समाज को एक करेगा या और बाँट देगा। लेकिन इतना साफ़ है कि सेक्युलरिज़्म की किताब अब पीछे छूट चुकी है और आस्था का सफ़ा खुलकर लिखा जा रहा है।