जीएसटी ने बदली देश की कर व्यवस्था, लेकिन अब नौ वर्षों के अनुभव के बाद व्यापक समीक्षा की जरूरत

जीएसटी ने भारत में अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था को एकीकृत कर 'एक देश-एक कर' की अवधारणा को मजबूत किया, करों के दोहरे प्रभाव को समाप्त किया और कर संग्रह बढ़ाया। लेकिन नौ वर्षों के अनुभव के बाद यह स्पष्ट है कि एमएसएमई, इनपुट टैक्स क्रेडिट (आईटीसी), बार-बार होने वाले संशोधन, दोहरे प्रशासनिक नियंत्रण और जटिल अनुपालन जैसी समस्याओं के कारण कानून की व्यापक समीक्षा की आवश्यकता है। लेखक का सुझाव है कि प्रत्येक पांच वर्ष में जीएसटी अधिनियम की संस्थागत समीक्षा हो, जिसमें सरकार और व्यापार जगत दोनों की समान भागीदारी सुनिश्चित की जाए।

Jul 11, 2026 - 11:42
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जीएसटी ने बदली देश की कर व्यवस्था, लेकिन अब नौ वर्षों के अनुभव के बाद व्यापक समीक्षा की जरूरत

— पराग सिंघल—

1 जुलाई, 2017 को लागू हुआ वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) भारत के सबसे महत्वपूर्ण अप्रत्यक्ष कर सुधारों में से एक है। जीएसटी को देश के आर्थिक सुधार का प्रतीक कहा जाना चाहिए, क्योंकि इसने केंद्र और राज्यों के 17 विभिन्न करों को एकीकृत कर 'एक राष्ट्र-एक कर' की अवधारणा को साकार किया। इससे 'कर पर कर' की व्यवस्था समाप्त हुई, देश में एक निर्बाध राष्ट्रीय बाजार का निर्माण हुआ और कर अनुपालन तथा व्यापारिक औपचारिकता को उल्लेखनीय बढ़ावा मिला।

जीएसटी लागू होने से पहले उत्पादन और वितरण के प्रत्येक चरण पर करों के ऊपर कर लगाया जाता था। इनपुट टैक्स क्रेडिट (आईटीसी) व्यवस्था लागू होने के बाद यह दोहरा कराधान काफी हद तक समाप्त हुआ, जिससे उत्पादन लागत में कमी आई और उपभोक्ताओं को अपेक्षाकृत स्थिर मूल्य मिलने लगे।

जीएसटी ने देश में एकीकृत राष्ट्रीय बाजार की अवधारणा को भी मजबूत किया। राज्य स्तरीय चेकपोस्ट और चुंगी व्यवस्था समाप्त कर ई-वे बिल जैसी डिजिटल प्रणाली लागू की गई, जिससे परिवहन समय और लॉजिस्टिक्स लागत में उल्लेखनीय कमी आई। इस सुधार ने भारत को छोटे-छोटे क्षेत्रीय बाजारों के बजाय एक सशक्त आर्थिक संघ के रूप में विकसित होने की दिशा दी।

संघीय वित्तीय व्यवस्था को संतुलित बनाए रखने के लिए राज्यों को क्षतिपूर्ति उपकर (Compensation Cess) की व्यवस्था भी दी गई, जिससे उन्हें राजस्व हानि की भरपाई हो सके। इसके साथ ही जीएसटी नेटवर्क (GSTN) के माध्यम से डिजिटल रिटर्न, चालान मिलान और ऑनलाइन प्रक्रियाओं ने कर आधार का विस्तार किया, जिसका परिणाम लगातार बढ़ते जीएसटी संग्रह के रूप में सामने आया।

इन उपलब्धियों के बावजूद यह भी स्वीकार करना होगा कि जीएसटी लागू होने के लगभग नौ वर्ष बाद भी कई गंभीर चुनौतियां बनी हुई हैं। विशेष रूप से सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (एमएसएमई) तथा असंगठित व्यापारियों के लिए अनुपालन की जटिलताएं आज भी चिंता का विषय हैं। बार-बार होने वाले संशोधन, जटिल रिटर्न प्रणाली और लगातार बदलते नियम छोटे व्यापारियों पर आर्थिक और मानसिक दोनों प्रकार का बोझ बढ़ाते हैं।

निस्संदेह सरकार ने 'एक देश-एक कर प्रणाली' की दिशा में महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त की है, क्योंकि पूर्व की व्यवस्था में प्रत्येक राज्य के अलग-अलग कर कानून थे। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि जिस आधार पर जीएसटी कानून बनाया गया, उसमें एक बड़ी संरचनात्मक कमी रह गई। जीएसटी में केंद्रीय और राज्य कर विभाग, दो समानांतर प्रशासनिक इकाइयों को व्यापक अधिकार प्रदान कर दिए गए। अधिनियम की धारा-5 और धारा-6 के अंतर्गत दोनों विभागों को मिले अधिकार कई बार कार्यक्षेत्र के टकराव की स्थिति पैदा करते हैं, जिसका प्रतिकूल प्रभाव सीधे करदाताओं पर पड़ता है।

यदि शुरुआत में ऐसी व्यवस्था बनाई जाती कि दोनों विभागों के अधिकार स्पष्ट रूप से विभाजित हों और कार्यों में टकराव की संभावना न रहे, तो करदाताओं को वर्तमान जैसी समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ता। यह भी ध्यान देने योग्य है कि राज्य कर विभाग और केंद्रीय कर विभाग की कार्यप्रणाली में व्यवहारिक स्तर पर काफी अंतर है।

इनपुट टैक्स क्रेडिट (आईटीसी) की व्यवस्था का उद्देश्य दोहरे कराधान को समाप्त करना था, लेकिन वर्तमान में अनेक विवाद इसी व्यवस्था से उत्पन्न हो रहे हैं। आज ईमानदारी से व्यापार करने वाले करदाता को भी अपनी आईटीसी प्राप्त करने के लिए स्वयं को निर्दोष सिद्ध करना पड़ता है। कई बार विक्रेता द्वारा रिटर्न दाखिल न करने या कर जमा न करने की स्थिति में खरीदार को आईटीसी रिवर्स करनी पड़ती है, जबकि उसने विधिवत कर चुकाकर माल खरीदा होता है। ऐसी स्थिति में करदाता को दोहरी आर्थिक मार झेलनी पड़ती है और अनावश्यक विवादों का सामना करना पड़ता है।

इसी प्रकार, व्यापार प्रारंभ होने के दो या तीन वर्ष बाद भौतिक निरीक्षण के दौरान माल उपलब्ध न होने पर पंजीकरण निरस्त करना अथवा भारी अर्थदंड लगाना भी व्यावहारिक दृष्टि से उचित प्रतीत नहीं होता। व्यापार की स्वाभाविक प्रकृति में स्टॉक का बदलना सामान्य प्रक्रिया है।

रिवर्स चार्ज मैकेनिज्म (आरसीएम) की व्यवस्था भी छोटे व्यापारियों के लिए कठिन साबित हो रही है। अपंजीकृत विक्रेता से खरीद पर पंजीकृत व्यापारी को कर का भुगतान करना पड़ता है, लेकिन कई परिस्थितियों में उसका समुचित आईटीसी लाभ प्राप्त नहीं हो पाता। इससे दोहरे कर का बोझ महसूस होता है और अनुपालन की जटिलता बढ़ती है।

पूर्ववर्ती कर कानूनों में एकपक्षीय आदेशों के निराकरण की स्थानीय व्यवस्था उपलब्ध थी, जबकि जीएसटी कानून में एकपक्षीय आदेश पारित करने का अधिकार तो दिया गया है, लेकिन ऐसे मामलों के प्रभावी समाधान की स्पष्ट व्यवस्था दिखाई नहीं देती। यह स्थिति प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों की भावना के अनुरूप नहीं कही जा सकती।

आज यह भी विचारणीय प्रश्न है कि देश में अनेक व्यापारी पंजीकृत करदाता बनने से बचना चाहते हैं। यदि कर प्रणाली व्यापारियों में विश्वास और सहजता पैदा करने के बजाय भय और जटिलता का कारण बन रही है, तो इस पर गंभीर पुनर्विचार आवश्यक है।

समय आ गया है कि सरकार जीएसटी कानून की व्यापक संस्थागत समीक्षा करे। बार-बार छोटे-छोटे संशोधन करने के बजाय यह व्यवस्था बनाई जानी चाहिए कि प्रत्येक पाँच वर्ष में जीएसटी अधिनियम की समग्र समीक्षा हो। इस प्रक्रिया में सरकार, कर विशेषज्ञों, उद्योग संगठनों, व्यापारिक संस्थाओं और करदाताओं की समान भागीदारी सुनिश्चित की जाए।

सरकार का उद्देश्य केवल राजस्व बढ़ाना नहीं, बल्कि ऐसा कर वातावरण तैयार करना भी होना चाहिए जो सरल, पारदर्शी, न्यायसंगत और व्यवसाय-अनुकूल हो। कर कानूनों की सरलता और स्थिरता ही देश की अर्थव्यवस्था तथा सकल घरेलू उत्पाद (GDP) को गति देने का सबसे प्रभावी माध्यम बन सकती है। ऐसा होने पर न सरकार स्वयं को असंतुष्ट महसूस करेगी और न ही करदाता स्वयं को पीड़ित।

SP_Singh AURGURU Editor