यूपी पुलिस को हाई कोर्ट की कड़ी फटकार, कोर्ट ने कहा- किसी बालिग जोड़े का पीछा करना काम नहीं, अपराधों की जांच करना पुलिस का काम
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने यूपी पुलिस पर तल्ख टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि बालिग, शादीशुदा जोड़ों का पीछा करना नहीं, अपराध की जांच उनका काम है।
प्रयागराज। उत्तर प्रदेश पुलिस को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट ने पुलिस की कार्यप्रणाली को ही सवालों के घेरे में ला दिया है। हाई कोर्ट ने कहा कि पुलिस का काम अपराधों की जांच करना है। दरअसल, एक पिता ने पुलिस में बेटी के अपहरण का केस दर्ज कराया था। इस मामले में लगाए गए आरोपों को लेकर आरोपी पक्ष कोर्ट चला गया। कोर्ट की इसी मामले में तीखी टिप्पणी सामने आई है। कोर्ट ने पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए गंभीर धाराओं में केस दर्ज किए जाने पर भी सवाल उठाए।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने यूपी पुलिस पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि उनका काम अपराधों की जांच करना है। बालिग जोड़ों की शादियों की जांच करना और उनका पीछा करना पुलिस का काम नहीं है। कोर्ट ने कहा कि जब कोई व्यक्ति बालिग हो जाता है तो वह अपने जीवन से संबंधित निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र होता है। बालिग लोगों को किसी को भी यह बताने का अधिकार नहीं है कि वह किसके साथ रहेगा? वह किससे शादी करेगा या अपना जीवन कैसे बिताएगा?
मामले में हाई कोर्ट ने पक्षों को सुनने के बाद पाया कि युवती बालिग है। उसने अपने बॉयफ्रेंड के साथ मंदिर में हिंदू रीति-रिवाज के साथ शादी की। उन्होंने शादी के प्रमाण पत्र और तस्वीरें भी कोर्ट में पेश की। मामले में हाई कोर्ट ने हैरानी जताते हुए कहा कि पुलिस इसमें गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कर सकती थी। पुलिस ने केवल गंभीर धाराओं में केस दर्ज किया। विवाहित जोड़े को परेशान किया गया।
हाई कोर्ट ने इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर हमला करार दिया। कोर्ट ने कहा कि संविधान किसी भी बालिग को दूसरे बालिग की इच्छा पर शासन करने या उसे नियंत्रित करने की अनुमति नहीं देती है। कोर्ट ने चिंता जताते हुए कहा कि पुलिस की विवेकहीन कार्रवाई के कारण कोर्ट में अनावश्यक मामलों का बोझ बढ़ रहा है।
हाई कोर्ट ने पुलिस पर तल्ख टिप्पणी के साथ ही अपहरण के आरोप में दर्ज प्राथमिकी रद्द कर दिया। हाई कोर्ट के जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने यह आदेश दिया है। मामला सहारनपुर का है। सदर बाजार थाने में एक पिता ने याची के खिलाफ उनकी बालिग बेटी का अपहरण करने और विवाह के लिए मजबूर करने के आरोप में प्राथमिकी दर्ज कराई थी। आरोपी ने एफआईआर को हाई कोर्ट में चुनौती दी।
मामले में हाई कोर्ट ने यूपी डीजीपी और अपर मुख्य सचिव गृह को तत्काल एक्शन के आदेश दिए हैं। कोर्ट ने थाने में दर्ज कराई गई एफआईआर को पूरी तरह से रद्द कर दिया है। कोर्ट ने परमादेश जारी करते हुए सभी प्रतिवादियों को निर्देश दिया है कि वे विवाहित जोड़े के घर में प्रवेश न करें। कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि उनके जीवन में किसी प्रकार की बाधा न उत्पन्न की जाए।