दलित बस्तियों में शराब के ठेकों को लेकर मानवाधिकार आयोग सख्त, डीएम और कमिश्नर से मांगी चार सप्ताह में रिपोर्ट, 'वाइन जोन' नीति लागू करने का प्रस्ताव
आगरा। दलित, मलिन और घनी आबादी वाले इलाकों में संचालित शराब की दुकानों को लेकर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने गंभीर रुख अपनाया है। मानवाधिकार कार्यकर्ता एवं अधिवक्ता नरेश पारस की शिकायत पर आयोग ने मामले को संज्ञान में लेते हुए जिला मजिस्ट्रेट और संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों से कार्रवाई सुनिश्चित करने को कहा है। आयोग ने चार सप्ताह के भीतर एक्शन टेकन रिपोर्ट (एटीआर) प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। शिकायत में आबादी वाले क्षेत्रों से शराब के ठेके हटाकर शहर के बाहरी क्षेत्रों अथवा औद्योगिक इलाकों में 'वाइन जोन' (नियंत्रित क्षेत्र) विकसित करने का सुझाव दिया गया है।
महिलाओं की सुरक्षा और सामाजिक न्याय का उठाया मुद्दा
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को भेजी शिकायत में अधिवक्ता नरेश पारस ने कहा है कि आगरा की दलित, मलिन एवं घनी आबादी वाली बस्तियों में हाल के समय में शराब के ठेके खोले गए हैं। इन ठेकों के बाहर दिन-रात शराबियों और असामाजिक तत्वों की भीड़ लगी रहती है, जहां खुलेआम शराब पीने, गाली-गलौज, मारपीट, महिलाओं से अभद्रता और छींटाकशी जैसी घटनाएं आम हो गई हैं। इससे महिलाओं, छात्राओं और आम नागरिकों में भय एवं असुरक्षा का वातावरण बन गया है।
नगला बूढ़ी हादसे का भी किया उल्लेख
शिकायत में थाना न्यू आगरा क्षेत्र के नगला बूढ़ी में हुई हालिया सड़क दुर्घटना का भी उल्लेख किया गया है, जिसमें कथित रूप से शराब के नशे में वाहन चला रहे चालक की बेकाबू कार से सात लोग कुचल गए थे और पांच लोगों की मौत हो गई थी। शिकायतकर्ता ने इसे प्रशासनिक उदासीनता और सामाजिक संवेदनहीनता का उदाहरण बताते हुए कहा कि इस प्रकार की घटनाएं शराब ठेकों के अनियंत्रित संचालन पर गंभीर प्रश्न खड़े करती हैं।
संविधान और कानूनों का दिया हवाला
नरेश पारस ने अपनी शिकायत में कई संवैधानिक एवं कानूनी प्रावधानों का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्तमान स्थिति नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन कर रही है।
उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 21 प्रत्येक नागरिक को सुरक्षित जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। अनुच्छेद 46 राज्य को अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों के सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक हितों की रक्षा का दायित्व सौंपता है। भारतीय दंड संहिता की धाराएं 268, 290 एवं 304ए लोक उपद्रव, सार्वजनिक असुविधा और लापरवाही से मृत्यु के मामलों से संबंधित हैं। अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 दलित समाज में भय, अपमान और उत्पीड़न उत्पन्न करने वाले कृत्यों को अपराध मानता है। उत्तर प्रदेश आबकारी अधिनियम, 1910 की धारा 34 जिला प्रशासन को ऐसे शराब ठेकों के लाइसेंस निरस्त करने का अधिकार देती है, जो लोक शांति भंग करते हों।
'वाइन जोन' बनाने का दिया सुझाव
शिकायत में प्रस्ताव दिया गया है कि दलित, मलिन एवं घनी आबादी वाले आवासीय क्षेत्रों से सभी शराब ठेकों को हटाकर शहर के बाहरी हिस्सों या औद्योगिक क्षेत्रों में नियंत्रित 'वाइन जोन' बनाए जाएं। वहां सीसीटीवी निगरानी, पुलिस सुरक्षा और निर्धारित समय (सुबह 10 बजे से रात 10 बजे तक) के भीतर ही बिक्री की अनुमति हो।
अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की मांग
शिकायतकर्ता ने यह भी मांग की है कि जिन आबकारी अधिकारियों ने आबादी वाले क्षेत्रों में शराब के ठेकों की अनुमति दी, उनकी जिम्मेदारी तय कर विभागीय जांच एवं दंडात्मक कार्रवाई की जाए। भविष्य में किसी भी नए ठेके की अनुमति से पहले जनसुनवाई अनिवार्य किए जाने का भी सुझाव दिया गया है।
उच्चस्तरीय समिति गठित करने का प्रस्ताव
शिकायत में राज्य स्तर पर एक उच्चस्तरीय समिति गठित करने की मांग की गई है, जो उन क्षेत्रों की समीक्षा करे जहां शराब ठेकों के कारण कानून-व्यवस्था और सामाजिक शांति प्रभावित हो रही है। साथ ही महिला सुरक्षा के लिए स्थायी पुलिस गश्त, सीसीटीवी निगरानी, सुरक्षित हेल्पलाइन, प्रत्येक छह माह में लाइसेंस की समीक्षा तथा विद्यालयों, धार्मिक स्थलों और आवासीय परिसरों से कम से कम 200 मीटर दूर शराब ठेके स्थापित करने की नीति लागू करने का सुझाव भी दिया गया है।
नशा मुक्त अभियान और मुआवजे की मांग
शिकायत में नशा मुक्त शहर अभियान चलाने, नशा मुक्ति केंद्र स्थापित करने, सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन को प्रत्येक ठेका स्वीकृति की पूर्व शर्त बनाने तथा शराब के कारण होने वाली दुर्घटनाओं में मृतकों के परिजनों को मुआवजा और दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई सुनिश्चित करने की भी मांग की गई है।
नरेश पारस ने कहा कि यह केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं, बल्कि महिला सम्मान, सामाजिक न्याय और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा का प्रश्न है। दलित और गरीब बस्तियों में शराब के ठेकों का संचालन सामाजिक ताने-बाने को कमजोर कर रहा है तथा भय और असुरक्षा का वातावरण पैदा कर रहा है। इसलिए इस दिशा में तत्काल प्रभावी कार्रवाई आवश्यक है।