आगरा में ‘फूड स्ट्रीट’ कब ‘स्ट्रीट फूड’ में तब्दील होता गया, पता ही न चला...
-डॉ. (लेफ्टिनेंट कर्नल) राजेश चौहान- हमारा बचपन और रिटायरमेंट के बाद के पंद्रह साल आगरा में बीते हैं। अच्छी तरह से जानते हैं कि यहां के किनारी बाजार में एक ‘सेठ गली’ नाम की एक बहुत प्रतिष्ठित खान-पान मिष्ठान, समोसे, भल्ले, गोलगप्पे, चाट वगैरह की एक गली है, जिसके दोनों तरफ छोटी-बड़ी अनेक पक्की दुकानें थीं। हम जैसे चटोरों के लिए उससे बढ़िया जगह न थी। आराम से दुकान के अंदर बैठो और बिल्कुल ताजा तथा सामने बनता हुआ व्यंजन जीभ चटकारते हुए ग्रहण करो। दुकान वालों को नगर निगम नंबर देती थी और प्रति माह थोड़ा-सा शुल्क।
नगर निगम के डॉक्टर साहब और सैनिटरी इंस्पेक्टर ताजगी, बीमारी और गंदगी पर तीखी निगाह रखते थे। उस समय बेहद साफ-सुथरी चाट की गली थी सेठ गली, जहां दोनों तरफ सड़क से परे मनचाहे प्रतिष्ठान के अंदर बैठकर लोग चाट, समोसे, जलेबी, दूध इत्यादि का आनंद लेते थे। तब वहां की दुकान में बीमारी और गंदगी कोसों दूर रहती थी। मजाल है कि किसी को हैजा, दस्त, डीसेंट्री, उल्टी, पीलिया इत्यादि कुछ हो जाए। सभी कुछ ताजा और बिना किसी मिलावट के मिलता था।
ऐसे ही दिल्ली के चांदनी चौक, कोच्चि, कानपुर, कोलकाता, मदुरै, पांडिचेरी, शिमला, नैनीताल, पुणे, मुंबई इत्यादि जगहों पर अलग से फूड स्ट्रीट थीं। और आज यह आलम है कि कोई भी, कहीं भी, किसी तरह का फूड धड़ल्ले से गली या सड़क किनारे खुले आसमान के नीचे बिकता और परोसा जाता मिल जाएगा। यह अब स्ट्रीट फूड बन गया है, जिसके आज असंख्य दीवाने हैं।
स्ट्रीट फूड के प्रति यह दीवानगी प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है, जिससे फूड स्ट्रीट की पक्की दुकानें और प्रतिष्ठान खत्म होते जा रहे हैं। बातों ही बातों में किसी ने बताया था कि एक छोटी-सी भी पक्की दुकान बनाने में एक लाख से कम नहीं लगता। फिर दुकान चलाने का झंझट। और यदि उसी एक लाख रुपये में पांच से दस घूमती-फिरती ठेल-धकेल-खोमचे बनवा दिए गए, तो व्यापार और भी चोखा हो जाएगा। दुकान पर नौकर रखने के बजाय किराए पर उठा देने से पांच-दस लोगों को सहारा भी तो मिल जाएगा। वैसे भी आजकल कितनों को नौकरी दे सकोगे, इसी का तो जमाना है। उनका भी पेट पल जाएगा।
वे कहां ठेल या खोमचा लगाते हैं, उससे ‘की फर्क पैंदा’ साहब। थोड़ा-बहुत सरकारी ‘मुट्ठियों’ को गर्म करते रहना है, बस। फिर लगा लो स्ट्रीट में कहीं भी फूड की ठेल। व्यस्ततम चौराहा हो तो बेस्ट। स्कूल, कॉलेज, अस्पताल, ऑफिस, बस स्टैंड, रेलवे—कहीं भी ठेल लग जाए, बस काम चल निकलेगा। फिर प्लास्टिक की पन्नी से भट्टी जलाओ, चमड़े की कतरनों से, या गंदे नाले की गैस से। ‘की फर्क पैंदा’। जो बना रहे हो उसमें क्या पड़ा है, किसे जानने की फिक्र है। कोई है जो एक बार मुट्ठी भर दो, तो पूछेगा क्या? टीवी में वैसे आता ही रहता है कि गोलगप्पे के पानी में एसिड और कभी-कभार थूक या मल-मूत्र इत्यादि भी डला हो तो भी ‘की फर्क पैंदा’। एक पिक्चर में कौवे की बिरयानी परोसने का भी सीन था। कुत्ते, जानवरों की भी बातें उठती आई हैं। यह भी ‘स्ट्रीट फूड’ में कई जगह शामिल हो गया है। किसी की नजरों में यदि आ भी गए, तो कहीं और अपनी ठेल लगा लो। धंधे पर भी असर नहीं पड़ेगा। ऊपर से यही तो हैं जो पक्के वोट बैंक भी हैं।
आज भीड़-भाड़, धूल, धुआं, आवारा पशुओं, कूड़ा-कर्कट, गंदे जलभराव और गंदगी के आसपास के ‘स्ट्रीट फूड’ की भरमार है। नगरवासियों ने देखा और समझा भी होगा कि कौन इसे प्रोत्साहित करते हैं और क्यों। बच्चों को स्कूल जाते समय हम उन्हें खुश रखने के लिए पैसे देते हैं, जो ज्यादातर ‘स्ट्रीट फूड’ पर खर्च होते हैं। सेहत के लिए कितना फायदेमंद है, यह किसको जानने की फुरसत है। जो जिम्मेदार हैं, उनकी मुट्ठियों का तापमान तो इन स्ट्रीट वेंडरों द्वारा नियमित बढ़ता ही रहता है, अन्यथा पड़ न जाएंगे डंडे या हो जाएगी ठेल जब्त। अब चाहे सड़क घेरकर खोमचा या ठेल लगाओ या पूरा फुटपाथ घेर लो। ‘की फर्क पैंदा।‘
यदि समझदारी की बात करें, तो इनको पहले सही तरह से पहचानो। वोटिंग कार्ड का परिचय न चलने दें। उन्हें परिचय प्रमाण देकर एक नंबर भी दो तथा वह क्या बेच सकता है, उसके लिए इजाजत भी। अलग से जगह उपलब्ध हो, जहां धूल-धक्कड़, गंदगी, आवारा पशु और जानवर न हों। साफ-सफाई अच्छी तरह से हो। साफ पेयजल की व्यवस्था रहे और शौचालय की भी। सड़क और गली के बीच या किनारे पर नहीं, बल्कि अलग से खुले मैदान में इन्हें जगह दी जाए, जहां गाड़ी न जाए। नजर रखी जाए और सीसीटीवी कैमरे भी हों। जरूरत के अनुसार उनका टीकाकरण भी होता रहे और प्रत्येक महीने सेहत की जांच भी। ऐसा यदि किया गया, तब सेफ्टी बढ़ेगी और ‘फूड’ भी ‘स्ट्रीट’ से हट सकेगा।
बोले तो मुगल सल्तनत या फिर अंग्रेजी दौर ने क्यों ‘सेठ गली’ को ‘फूड स्ट्रीट’ की तर्ज पर प्रोत्साहित किया? वे भी तो इस सबको आज की तर्ज पर ‘स्ट्रीट फूड’ के खोमचे, रेडियां और ठेल-धकेल लगवा सकते थे ना। तब था कोई उन्हें मना करने वाला? आजकल के जमाने के ‘स्ट्रीट फूड’ और बीते जमाने के ‘फूड स्ट्रीट’ में फर्क समझेंगे, तभी तो बढ़िया रहेगा सभी के लिए। वरना जैसा है, चलने दो जी। ‘मैनूं भी की फर्क पैंदा।‘ मजबूर हूं एक राष्ट्रीय प्रोफेसर होने के नाते कि सच से अवगत कराऊं और सेहत के लिए सचेत भी।
(लेखक इंडियन आर्मी से सेवानिवृत्त हैं और कई पुस्तकों के लेखक हैं।)