सिंधु जल संधि' पर भारत का सख्त, भारत के रुख में कोई बदलाव नहीं,  विदेश मंत्रालय ने  'मध्यस्थता कोर्ट' के फैसले को नकारा

भारत ने सिंधु जल संधि मामले में तथाकथित 'मध्यस्थता न्यायालय' के नए फैसले को पूरी तरह खारिज कर दिया है। विदेश मंत्रालय ने कहा कि यह अदालत अवैध है और सिंधु जल संधि को स्थगित रखने का भारत का फैसला अब भी जारी रहेगा।

May 16, 2026 - 19:34
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सिंधु जल संधि' पर भारत का सख्त, भारत के रुख में कोई बदलाव नहीं,  विदेश मंत्रालय ने  'मध्यस्थता कोर्ट' के फैसले को नकारा


 

नई दिल्ली। भारत सरकार ने सिंधु जल संधि से जुड़े मामले में तथाकथित 'मध्यस्थता कोर्ट' के फैसले को पूरी तरह खारिज कर दिया है। विदेश मंत्रालय के आधिकारिक प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि 15 मई को इस तथाकथित अदालत ने 'अधिकतम जल-भंडारण' से जुड़े मुद्दे पर एक निर्णय जारी किया, जिसे भारत मान्यता नहीं देता।

बीते साल अप्रैल में पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत की ओर से शुरू किए गए ऑपरेशन सिंदूर के तहत सिंधु जल संधि को अनिश्चितकाल के लिए निलंबित कर दिया गया है। भारत ने साफ कर दिया है कि जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद का समर्थन करना बंद नहीं करता, तब तक यह संधि स्थगित रहेगी।  

विदेश मंत्रालय ने साफ शब्दों में कहा कि भारत ने कभी भी इस तथाकथित 'मध्यस्थता कोर्ट' के गठन को स्वीकार नहीं किया। सरकार के मुताबिक, इस अदालत की ओर से जारी कोई भी कार्यवाही, फैसला या निर्णय पूरी तरह शून्य और अमान्य है। भारत ने दोहराया कि पहले दिए गए सभी फैसलों की तरह इस नए फैसले को भी सिरे से खारिज किया जाता है।

भारत सरकार ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि सिंधु जल संधि को फिलहाल स्थगित रखने का फैसला अभी भी लागू है। विदेश मंत्रालय के बयान से संकेत मिले हैं कि भारत इस मुद्दे पर अपने रुख में कोई नरमी दिखाने के मूड में नहीं है और राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देगा।

सिंधु जल संधि को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से विवाद बना हुआ है। ऐसे समय में भारत का यह कड़ा बयान दोनों देशों के बीच कूटनीतिक तनाव को और बढ़ा सकता है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी इस मुद्दे को लेकर नई बहस छिड़ने की संभावना जताई जा रही है।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल के बयान को भारत की स्पष्ट और सख्त कूटनीतिक लाइन माना जा रहा है। सरकार ने संकेत दिया है कि देश की संप्रभुता और राष्ट्रीय हितों से जुड़े मामलों में किसी भी बाहरी या 'गैरकानूनी' व्यवस्था को स्वीकार नहीं किया जाएगा।