मुद्दा गर्म है...असल चोरी जेब की नहीं, चरित्र की है; 'स्व' का बोध ही है सबसे बड़ी जांच

केवल दूसरों पर आरोप लगाने के बजाय प्रत्येक व्यक्ति को अपने दैनिक जीवन में होने वाली छोटी-छोटी बेईमानियों और नियम उल्लंघनों पर भी विचार करना चाहिए। लालबत्ती तोड़ना, कार्यालय में समय की अनदेखी करना या जिम्मेदारियों से बचना भी एक प्रकार की चोरी है। कानून हर चोरी नहीं रोक सकता, बल्कि 'स्व' (अपनेपन) का बोध, नैतिक साधना और राष्ट्र तथा समाज के प्रति अपनापन ही व्यक्ति के चरित्र में वास्तविक परिवर्तन ला सकता है।

Jul 14, 2026 - 12:34
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मुद्दा गर्म है...असल चोरी जेब की नहीं, चरित्र की है; 'स्व' का बोध ही है सबसे बड़ी जांच
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-कीर्ति कुमार-

आजकल एक मुद्दा सुनते-सुनते और पढ़ते-पढ़ते मन में विचार आया कि जिधर देखो, उधर एक ही विषय की चर्चा हो रही है- चंदा चोरी। हर कोई किसी न किसी को आरोपी बना रहा है। एसआईटी की जांच चल रही है, ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय एवं ट्रस्टी अनिल मिश्र के त्यागपत्र स्वीकार हो चुके हैं। कानून अपनी प्रक्रिया के अनुसार कार्य कर रहा है और विभिन्न पहलुओं की जांच भी जारी है। इसके बावजूद यह मुद्दा अभी भी गर्म है, और ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ तथाकथित लोग इसे लगातार गर्म बनाए रखना चाहते हैं।

लेकिन यदि हम स्वयं अपने भीतर झांकें, तो पाएंगे कि हम अपने दैनिक जीवन में जाने-अनजाने अनेक प्रकार की चोरियां करते हैं। इन चोरियों की जांच के लिए एसआईटी कब बनेगी? इनका हिसाब कौन करेगा?

सुबह से लेकर रात तक हम कितनी ही बार नियमों और जिम्मेदारियों की चोरी करते हैं। वास्तव में चोरी केवल धन या वस्तु की नहीं होती, चोरी वह भी है, जब हमें यह लगने लगता है कि कोई हमें नहीं देख रहा है।

प्रतिदिन की भागदौड़ में हम लालबत्ती जलने पर भी चौराहा पार कर जाते हैं। पहले इधर-उधर देखते हैं कि कहीं कोई पुलिसकर्मी तो नहीं है, फिर बिना हेलमेट और तीन सवारी के साथ मोटरसाइकिल दौड़ा देते हैं। क्या यह चोरी नहीं है?

इसी प्रकार कार्यालय पहुंचने में देर हो जाती है। निर्धारित समय का पालन नहीं करते, फिर बहाने बना लेते हैं। यदि कोई पूछ ले तो तरह-तरह के स्पष्टीकरण देकर स्वयं को सही साबित करने का प्रयास करते हैं। क्या यह भी ईमानदारी है?

आज समाज में ऐसे अनेक उदाहरण आसानी से दिखाई देते हैं। यह प्रवृत्ति तब तक समाप्त नहीं होगी, जब तक हम अपने कार्य, अपने कार्यालय, अपने समाज और अपने राष्ट्र को अपना नहीं मानेंगे। जिस दिन यह भावना जागृत हो जाएगी कि यह कार्य मेरा है और यह स्थान मेरा है, उसी दिन से ऐसी चोरियां स्वतः समाप्त होने लगेंगी।

कोई भी कानून, कोई भी अदालत या कोई भी जांच एजेंसी मनुष्य के भीतर बैठे इस दोष को पूरी तरह समाप्त नहीं कर सकती। वास्तविक परिवर्तन केवल अपनेपन और 'स्व' के बोध से ही संभव है। यह बोध एक दिन में उत्पन्न नहीं होता, बल्कि इसके लिए निरंतर साधना और आत्मानुशासन आवश्यक है।

जिस प्रकार प्रतिदिन कुएं से पानी निकालने वाली साधारण रस्सी भी समय के साथ पत्थर पर निशान बना देती है, उसी प्रकार सतत आत्मचिंतन और स्व-बोध की साधना भी मनुष्य के व्यक्तित्व में गहरा परिवर्तन ला सकती है।

स्व का बोध तभी जागृत होगा, जब हम इस धरती, इस मातृभूमि और इस समाज को अपना मानेंगे। जब इस भूमि से आत्मीयता होगी, तभी हमारे भीतर सकारात्मक परिवर्तन संभव होगा। इतिहास के अनेक महापुरुषों ने समय-समय पर सत्य, नैतिकता और कर्तव्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी है। आवश्यकता केवल इतनी है कि हम उनके बताए मार्ग का ईमानदारी से अनुसरण करें।

इन दिनों चर्चा का एक और विषय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी है। संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने स्वयं को गुरु के रूप में स्थापित करने के बजाय सनातन परंपरा के प्रेरणास्रोत परम पवित्र भगवा ध्वज को गुरु का स्थान दिया। उनका मानना था कि किसी व्यक्ति को आदर्श बनाने पर यदि उसमें कोई मानवीय कमजोरी दिखाई दे जाए तो श्रद्धा टूट जाती है, जबकि सिद्धांत और आदर्श स्थायी होते हैं। इसलिए यदि हमारा जुड़ाव इस राष्ट्र, इस संस्कृति और इस भूमि से बना रहेगा, तो स्व के बोध का जागरण अवश्य होगा और वही समाज में वास्तविक परिवर्तन का आधार बनेगा।

(लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं।)

SP_Singh AURGURU Editor