आगरा की कोर्ट में कंगना रनौत ने अपने केस में वादी को अनुचित लाभ देने के आरोप लगाकर 30 अप्रैल को आने वाला फैसला टलवाया, अब इस तारीख को कंगना के प्रार्थना पत्र पर होगा निर्णय, शिकायतकर्ता ने कहा- यह न्यायालय का अपमान
आगरा। हिमाचल प्रदेश के मंडी लोकसभा क्षेत्र से भाजपा सांसद व फिल्म अभिनेत्री कंगना रनौत ने स्पेशल कोर्ट एमपी-एमएलए में चल रहे एक प्रकरण में न्यायालय की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। कंगना की ओर से दाखिल प्रार्थना पत्र में आरोप लगाया गया है कि न्यायालय ने शिकायतकर्ता (वादी) को अनुचित लाभ प्रदान किया है और 30 अप्रैल 2026 को प्रस्तावित आदेश पारित न करने की मांग की गई है। दोनों पक्षों को सुनने के बाद न्यायालय ने 30 अप्रैल को पहले कंगना रनौत के प्रार्थना पत्र पर फैसले की बात कही। इस प्रकार इस केस में 30 अप्रैल को आने वाला फैसला टल गया।
बचाव पक्ष का आरोप- न्यायिक प्रक्रिया से हटकर दी गई छूट
कंगना रनौत की अधिवक्ता सुधा प्रधान ने अधिवक्ता अनुसुइया चौधरी के माध्यम से कोर्ट में प्रार्थना पत्र दाखिल करते हुए कहा कि इस मामले में 30 अप्रैल 2026 को अंतिम बहस पूरी हो चुकी थी और न्यायालय ने 16 अप्रैल 2026 को आदेश हेतु तिथि नियत की थी।
लेकिन उस दिन निर्णय पारित नहीं किया गया और शिकायतकर्ता रमाशंकर शर्मा को सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम पर अतिरिक्त बहस की अनुमति दे दी गई, साथ ही फाइल को मार्क करने का अवसर भी दिया गया, जो सीधे तौर पर वादी के पक्ष में लाभकारी है।
नए दस्तावेजों को लेकर भी उठे सवाल
प्रार्थना पत्र में यह भी कहा गया कि रिवीजन न्यायालय के 29 नवंबर 2025 के आदेश में स्पष्ट निर्देश था कि मामले का निस्तारण केवल पहले से उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर किया जाए।
इसके बावजूद 3 अप्रैल 2026 को शिकायतकर्ता द्वारा नए दस्तावेज प्रस्तुत किए गए और उन्हें अभिलेख में शामिल करने की अनुमति भी दे दी गई।
बचाव पक्ष का तर्क है कि इन नए दस्तावेजों पर विस्तृत जवाब देने के लिए पर्याप्त समय दिया जाना आवश्यक है, ताकि निष्पक्ष सुनवाई और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन सुनिश्चित हो सके।
30 अप्रैल को आने वाले आदेश पर रोक की मांग
कंगना रनौत की ओर से कोर्ट से स्पष्ट अनुरोध किया गया है कि 30 अप्रैल 2026 को कोई आदेश पारित न किया जाए और बचाव पक्ष को जवाब प्रस्तुत करने के लिए पर्याप्त समय दिया जाए।
शिकायतकर्ता का तीखा विरोध- न्यायालय का अपमान
वहीं, शिकायतकर्ता और राजीव गांधी बार एसोसिएशन के अध्यक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता रमाशंकर शर्मा ने इस प्रार्थना पत्र का कड़ा विरोध करते हुए कहा कि यह न्यायालय का सरासर अपमान है और कोर्ट पर झूठे व गंभीर आरोप लगाए गए हैं।
उन्होंने स्पष्ट किया कि 16 अप्रैल 2026 को सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम पर कोई बहस नहीं हुई थी और न ही कोई विशेष टिप्पणी की गई थी। केवल कुछ महत्वपूर्ण दस्तावेजों पर फ्लैग लगाए गए थे, ताकि निर्णय के समय उन्हें देखने में सुविधा हो सके।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद न्यायालय ने यह स्पष्ट कर दिया है कि विपक्षी के प्रार्थना पत्र पर 30 अप्रैल 2026 को ही आदेश पारित किया जाएगा।