कर्नाटक हेट स्पीच बिल: नफ़रत पर कानून या असहमति पर ताला? कर्नाटक से उठता लोकतंत्र का सवाल

कर्नाटक सरकार द्वारा पारित हेट स्पीच और हेट क्राइम्स (रोकथाम) एक्ट, 2025 नफरत फैलाने वाली अभिव्यक्तियों पर सख्त कार्रवाई का दावा करता है, लेकिन इसकी व्यापक और अस्पष्ट परिभाषाएं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर खतरे की आशंका पैदा करती हैं। सरकार इसे सामाजिक सौहार्द और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप बताती है, जबकि विपक्ष, कानूनी विशेषज्ञ और नागरिक समाज इसे असहमति, आलोचना और पत्रकारिता को दबाने का संभावित औज़ार मान रहे हैं। मूल प्रश्न यह है कि क्या यह कानून नफरत पर प्रभावी अंकुश लगाएगा या लोकतांत्रिक बहस और असहमति को भय के साये में ले जाएगा।

Dec 24, 2025 - 20:03
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कर्नाटक हेट स्पीच बिल: नफ़रत पर कानून या असहमति पर ताला? कर्नाटक से उठता लोकतंत्र का सवाल

-बृज खंडेलवाल-

लोकतांत्रिक सरकारें आलोचना से क्यों डरती हैं? यह प्रश्न भारत के सार्वजनिक जीवन में बार-बार उभरता रहा है। असहमति और सत्ता के बीच का तनाव नया नहीं है। आपातकाल के दौर में जब इंदिरा गांधी सरकार ने अभिव्यक्ति की आज़ादी पर अंकुश लगाया था, तब जनता ने लोकतांत्रिक मूल्यों के पक्ष में निर्णायक जवाब दिया। उसके बाद भी इतिहास खुद को दोहराता दिखता है। हर बार जब सत्ता आलोचना को असुविधाजनक मानती है, लोकतंत्र की सेहत पर सवाल खड़े हो जाते हैं।

आज यही बहस कर्नाटक से उठ रही है। 18 दिसंबर को राज्य विधानसभा ने “कर्नाटक हेट स्पीच और हेट क्राइम्स (रोकथाम) एक्ट, 2025” पारित किया है। यह देश का पहला राज्य-स्तरीय कानून है जो हेट स्पीच को स्पष्ट रूप से परिभाषित करने और उससे जुड़े अपराधों पर सख्त दंड का दावा करता है। बिल फिलहाल राज्यपाल की मंजूरी की प्रतीक्षा में है, लेकिन इसके साथ ही समर्थन और आशंकाओं का तीखा टकराव शुरू हो चुका है।

कानून का दायरा व्यापक है। धर्म, जाति, लिंग, यौन, भाषा, विकलांगता, जन्म स्थान या किसी भी सामुदायिक पहचान के आधार पर घृणा, भेदभाव या हिंसा फैलाने वाली मौखिक, लिखित, डिजिटल या दृश्य अभिव्यक्ति को हेट स्पीच माना गया है। पहली बार दोषी पाए जाने पर एक से सात साल तक की जेल और पचास हजार रुपये तक जुर्माने का प्रावधान है। दोहराव की स्थिति में सज़ा और जुर्माना दोनों बढ़ जाते हैं। अपराध संज्ञेय और गैर-जमानती हैं, यानी पुलिस बिना वारंट गिरफ्तारी कर सकती है और कथित आपत्तिजनक ऑनलाइन सामग्री को तुरंत हटाने का अधिकार रखती है।

सरकार ने यह भी कहा है कि जनहित, कला, साहित्य, शोध या धार्मिक उद्देश्यों से की गई अभिव्यक्तियां, यदि ईमानदार और वास्तविक हों, तो कानून के दायरे से बाहर रहेंगी। पीड़ितों को मुआवज़ा देने का प्रावधान भी जोड़ा गया है। काग़ज़ पर यह सब सामाजिक न्याय और सुरक्षा का भरोसा देता है।

सरकार का तर्क है कि यह कानून समय की मांग है। गृह मंत्री जी. परमेश्वर के अनुसार सांप्रदायिक उकसावे, ऑनलाइन नफरत अभियानों और हिंसा की बढ़ती घटनाओं से निपटने के लिए मौजूदा कानूनी ढांचा अपर्याप्त है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के मई 2025 के निर्देशों का हवाला दिया, जिसमें हेट स्पीच को लोकतांत्रिक समाज के लिए गंभीर खतरा बताया गया था। सरकार का दावा है कि भारतीय न्याय संहिता की मौजूदा धाराएं डिजिटल युग की जटिलताओं को समुचित रूप से संबोधित नहीं कर पातीं, इसलिए एक विशेष कानून जरूरी हो गया है।

लेकिन विपक्ष और नागरिक समाज इस दावे से सहमत नहीं हैं। भाजपा और अन्य दलों ने इस बिल को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सीधा हमला बताया है। नेता प्रतिपक्ष आर. अशोक का कहना है कि कानून की भाषा इतनी व्यापक है कि राजनीतिक आलोचना, व्यंग्य, पत्रकारिता और सामाजिक टिप्पणी भी अपराध के दायरे में आ सकती है। उनके अनुसार यह कानून व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर असहमति को दबाने का औज़ार बन सकता है।

कानूनी विशेषज्ञों की चिंता इससे भी गहरी है। उनका कहना है कि यह कानून अस्पष्टता की समस्या से ग्रस्त है। जब किसी कानून की परिभाषाएं स्पष्ट न हों, तो उसका मनमाना इस्तेमाल आसान हो जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने 2015 में आईटी एक्ट की धारा 66A को इसी आधार पर रद्द किया था, क्योंकि उसका उपयोग आलोचना और असहमति को कुचलने के लिए हो रहा था। आशंका है कि कर्नाटक का यह कानून भी उसी राह पर न बढ़ जाए।

संवैधानिक स्तर पर भी सवाल गंभीर हैं। अनुच्छेद 19(1)(a) हर नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है। भले ही सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और सुरक्षा के नाम पर उचित प्रतिबंध संभव हों, लेकिन आलोचकों का कहना है कि यह कानून उन सीमाओं को लांघता दिखाई देता है। इसमें वास्तविक हिंसा या सीधे उकसावे की स्पष्ट शर्त नहीं है। ऐसे में सरकार की नीतियों या धार्मिक-सामाजिक गतिविधियों की आलोचना करने वाला सामान्य सोशल मीडिया पोस्ट भी हेट स्पीच के रूप में दर्ज किया जा सकता है।

पत्रकार, शिक्षाविद् और सामाजिक कार्यकर्ता पहले से ही आशंकित हैं। हाल के महीनों में कुछ मामलों में सांप्रदायिक बयानबाज़ी के आरोपों के तहत विपक्षी नेताओं और एक्टिविस्टों पर कार्रवाई हुई है। इससे यह डर और गहरा हुआ है कि नया कानून सत्ता को असहमति पर लगाम कसने का अतिरिक्त हथियार दे सकता है।

असली बहस आज़ादी और व्यवस्था के बीच संतुलन की है। समर्थक मानते हैं कि यदि कानून निष्पक्ष और पारदर्शी ढंग से लागू हुआ, तो यह समाज में बढ़ती नफरत को रोकने में सहायक हो सकता है। विरोधियों का कहना है कि किसी भी लोकतंत्र की असली ताकत आलोचना सहने की क्षमता में होती है, न कि उसे अपराध घोषित करने में।

भारत जैसे विविध और बहुलतावादी देश में सामाजिक सौहार्द और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। सवाल यह नहीं है कि नफरत पर रोक हो या नहीं, सवाल यह है कि रोक किस कीमत पर लगाई जाए। आने वाले समय में अदालतें और नागरिक विवेक तय करेंगे कि यह कानून लोकतंत्र को मजबूत करता है या उसे भय के साए में धकेलता है। क्योंकि अंततः भारत की आत्मा डर से नहीं, खुली बहस और असहमति से जीवित रहती है।

SP_Singh AURGURU Editor