मानसून सत्र से पहले उद्धव ठाकरे को बड़ा झटका, लोकसभा में शिंदे गुट की ताकत दोगुनी; छह सांसदों के विलय को लोकसभा अध्य़क्ष ने दी मान्यता

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने शिवसेना (यूबीटी) के छह बागी सांसदों के शिंदे गुट में विलय को मान्यता दे दी है। इससे शिंदे गुट की लोकसभा में संख्या 13 हो गई, जबकि उद्धव ठाकरे की संसदीय ताकत घटकर तीन सांसदों तक सीमित रह गई।

Jul 18, 2026 - 22:16
 0
मानसून सत्र से पहले उद्धव ठाकरे को बड़ा झटका, लोकसभा में शिंदे गुट की ताकत दोगुनी; छह सांसदों के विलय को लोकसभा अध्य़क्ष ने दी मान्यता

नई दिल्ली। संसद के मानसून सत्र से ठीक पहले लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के एक अहम फैसले ने महाराष्ट्र की राजनीति और संसद के शक्ति संतुलन में बड़ा बदलाव ला दिया है। लोकसभा अध्यक्ष ने शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के छह बागी सांसदों के एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में विलय को औपचारिक मान्यता दे दी है। इसके साथ ही लोकसभा सचिवालय ने दलगत स्थिति में संशोधन जारी कर दिया, जिससे शिंदे गुट की लोकसभा में संख्या 7 से बढ़कर 13 हो गई है। इस फैसले को एनडीए के लिए राजनीतिक मजबूती और उद्धव ठाकरे के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।

जानकारी के अनुसार, उद्धव गुट छोड़ चुके छह सांसदों ने पहले ही शिंदे गुट में शामिल होने का फैसला कर लिया था। इसके बाद उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष के समक्ष आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत करते हुए अपने विलय का दावा किया। निर्धारित प्रक्रिया पूरी होने के बाद लोकसभा अध्यक्ष ने उनके दावे को स्वीकार कर लिया। अब संसदीय रिकॉर्ड में ये सभी सांसद शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना का हिस्सा माने जाएंगे और सदन में उनकी बैठने की व्यवस्था तथा दलगत पहचान भी उसी के अनुरूप होगी।

इस फैसले का सबसे बड़ा असर उद्धव ठाकरे की संसदीय ताकत पर पड़ा है। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में शिवसेना (यूबीटी) ने महाराष्ट्र में नौ सीटें जीतकर अच्छा प्रदर्शन किया था, लेकिन छह सांसदों के अलग होने के बाद अब पार्टी की लोकसभा में संख्या घटकर केवल तीन रह गई है। वहीं, शिंदे गुट 13 सांसदों के साथ एनडीए के भीतर कहीं अधिक मजबूत स्थिति में पहुंच गया है।

विलय की प्रक्रिया के दौरान शिवसेना (यूबीटी) ने इसका विरोध भी किया था। पार्टी ने बागी सांसदों को कानूनी नोटिस भेजते हुए लोकसभा अध्यक्ष से आग्रह किया था कि इस विलय को मान्यता न दी जाए। उद्धव गुट का तर्क था कि संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत केवल सांसदों का समूह किसी दूसरे दल में विलय का निर्णय नहीं ले सकता, जब तक मूल राजनीतिक दल स्वयं विलय का फैसला न करे। इसी आधार पर पार्टी नेताओं ने लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात कर अपनी आपत्ति भी दर्ज कराई थी।

हालांकि, लोकसभा अध्यक्ष के निर्णय के बाद यह विलय संसदीय रिकॉर्ड का हिस्सा बन गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस फैसले से संसद में एनडीए की स्थिति और मजबूत होगी, जबकि विपक्ष इसे दल-बदल विरोधी कानून की व्याख्या से जुड़ा गंभीर संवैधानिक मुद्दा मान रहा है। दूसरी ओर, शिंदे गुट का कहना है कि पूरी प्रक्रिया संविधान और संसदीय नियमों के अनुरूप पूरी की गई है।

अब राजनीतिक हलकों की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या शिवसेना (यूबीटी) इस फैसले को न्यायालय में चुनौती देती है। यदि ऐसा होता है, तो दल-बदल कानून और राजनीतिक दलों के विलय की संवैधानिक व्याख्या पर एक बार फिर न्यायिक बहस देखने को मिल सकती है।

SP_Singh AURGURU Editor