संसद में सांसद राजकुमार चाहर ने उठाया प्राचीन पांडुलिपियों के संरक्षण का मुद्दा
संसद के मानसून सत्र के पहले दिन फतेहपुर सीकरी सांसद राजकुमार चाहर ने ‘ज्ञान भारतम्’ योजना को लेकर संस्कृति मंत्रालय से सवाल पूछे। केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने बताया कि 491.66 करोड़ रुपये की इस योजना के तहत वर्ष 2025-2031 तक देश की प्राचीन पांडुलिपियों का सर्वेक्षण, संरक्षण और डिजिटलीकरण किया जाएगा। अब तक 8 लाख से अधिक पांडुलिपियां डिजिटल रूप में संरक्षित की जा चुकी हैं, जबकि 3.53 लाख से ज्यादा पांडुलिपियां सार्वजनिक पोर्टल पर उपलब्ध हैं। सरकार AI, OCR और HTR जैसी आधुनिक तकनीकों की मदद से भारत की ज्ञान-विरासत को संरक्षित और वैश्विक स्तर पर सुलभ बनाने की दिशा में काम कर रही है।
‘ज्ञान भारतम्’ पर संसद में सवाल, सरकार ने बताया 491 करोड़ रुपये की योजना का रोडमैप
नई दिल्ली। संसद के मानसून सत्र के पहले ही दिन फतेहपुर सीकरी से सांसद और भाजपा किसान मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजकुमार चाहर ने भारत की प्राचीन ज्ञान-संपदा और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण का मुद्दा जोरदार ढंग से उठाया। उन्होंने संस्कृति मंत्रालय से ‘ज्ञान भारतम्’ पहल के उद्देश्यों, जनजातीय ज्ञान-परंपराओं के संरक्षण, पांडुलिपियों के डिजिटलीकरण, भारतीय सभ्यता से इसके संबंध और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के इस्तेमाल को लेकर सरकार की कार्ययोजना पर विस्तृत जानकारी मांगी।
सांसद राजकुमार चाहर ने संसद में सवाल उठाते हुए कहा कि भारत हजारों वर्षों से ज्ञान, दर्शन, विज्ञान, साहित्य और आध्यात्मिक परंपराओं का केंद्र रहा है। देश के विभिन्न हिस्सों में आज भी लाखों प्राचीन पांडुलिपियां सुरक्षित हैं, जिनमें भारतीय सभ्यता और संस्कृति का अमूल्य खजाना समाहित है। ऐसे में इन धरोहरों का संरक्षण और आधुनिक तकनीकों के माध्यम से इन्हें आम लोगों तक पहुंचाना समय की बड़ी आवश्यकता है।
केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने दी विस्तृत जानकारी
सांसद के सवाल का जवाब देते हुए केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने बताया कि ‘ज्ञान भारतम्’ भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय की एक महत्वाकांक्षी राष्ट्रीय पहल है। इसकी घोषणा केंद्रीय बजट 2025-26 में 1 फरवरी 2025 को की गई थी। उन्होंने बताया कि इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य देशभर में बिखरी हुई प्राचीन पांडुलिपियों का सर्वेक्षण, प्रलेखन, संरक्षण, डिजिटलीकरण और व्यापक स्तर पर प्रचार-प्रसार करना है। इस महत्वाकांक्षी योजना के लिए वर्ष 2025 से 2031 तक कुल 491.66 करोड़ रुपये की राशि स्वीकृत की गई है।
‘ज्ञान भारतम्’ के तहत होंगे ये प्रमुख कार्य
मंत्री ने बताया कि इस योजना के अंतर्गत कई महत्वपूर्ण कार्य किए जा रहे हैं, जिनमें देशभर की पांडुलिपियों का सर्वेक्षण और पंजीकरण, पांडुलिपियों का सूचीकरण और प्रलेखन, संरक्षण और डिजिटलीकरण, राष्ट्रीय डिजिटल रिपॉजिटरी (NDR) का निर्माण, भारतीय भाषाओं और लिपियों के अध्ययन को बढ़ावा, शोध और प्रकाशन को प्रोत्साहन, तकनीकी साझेदारी और क्षमता निर्माण, जनजातीय और पारंपरिक ज्ञान-परंपराओं का संरक्षण शामिल हैं। उन्होंने कहा कि सरकार आधुनिक तकनीकों की मदद से इन ऐतिहासिक दस्तावेजों को सुरक्षित रखने के साथ-साथ उन्हें आम नागरिकों और शोधकर्ताओं के लिए सुलभ बनाने की दिशा में तेजी से काम कर रही है।
8 लाख से अधिक पांडुलिपियां हो चुकी हैं डिजिटाइज
सरकार ने संसद में जानकारी दी कि अब तक देशभर में आठ लाख से अधिक पांडुलिपियों का डिजिटलीकरण किया जा चुका है। इनमें से 3,53,947 पांडुलिपियों को ‘ज्ञान भारतम्’ पोर्टल पर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराया गया है। इस डिजिटल संग्रह से विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं, इतिहासकारों और आम नागरिकों को भारत की प्राचीन ज्ञान-परंपरा तक आसानी से पहुंच मिल सकेगी। इसके माध्यम से भारतीय संस्कृति, आयुर्वेद, गणित, खगोल विज्ञान, दर्शन, साहित्य और लोक परंपराओं से जुड़ी महत्वपूर्ण सामग्री संरक्षित रहेगी।
AI तकनीक से सुरक्षित होगी भारत की ज्ञान-संपदा
केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने बताया कि सरकार पांडुलिपियों के संरक्षण और अध्ययन के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित तकनीकों का इस्तेमाल कर रही है। इसके तहत ऑप्टिकल कैरेक्टर रिकग्निशन तकनीक, एचटीआर (हैंडरिटन टेक्स्ट रिकग्निशन) प्रणाली, एआई आधारित भाषा और लिपि मॉडल, अनुवाद और लिप्यंतरण, उन्नत सर्च और डेटा विश्लेषण प्रणाली, इन तकनीकों के जरिए प्राचीन हस्तलिखित ग्रंथों को डिजिटल रूप में संरक्षित करने के साथ-साथ उनका अनुवाद और अध्ययन भी आसान बनाया जाएगा। इससे दुनिया भर के शोधकर्ताओं को भारतीय ज्ञान-विरासत तक पहुंच मिलेगी।
भारतीय सभ्यता और संस्कृति से जुड़ी बड़ी पहल
विशेषज्ञों का मानना है कि ‘ज्ञान भारतम्’ केवल पांडुलिपियों के संरक्षण की परियोजना नहीं है, बल्कि यह भारत की हजारों वर्षों पुरानी सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का एक राष्ट्रीय अभियान है। संसद में सांसद राजकुमार चाहर द्वारा उठाया गया यह मुद्दा भारत की सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण और उसे आधुनिक तकनीक से जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है। यह प्रश्न देश की प्राचीन ज्ञान-परंपरा को वैश्विक मंच पर स्थापित करने की सरकार की रणनीति को भी सामने लाता है।