वसुधैव कुटुम्बकम’ से ही मजबूत होगा राष्ट्रवाद, साहित्य और सिनेमा को बनाना होगा जनचेतना का माध्यम, राष्ट्रीय संगोष्ठी में कुलपति प्रो. आशुरानी ने कहा—देशप्रेम को व्यापक मानवीय दृष्टि से जोड़ने की जरूरत
आगरा। राष्ट्रवाद को केवल देश की सीमाओं और राजनीतिक विचारधारा तक सीमित रखने के बजाय मानव कल्याण, सांस्कृतिक चेतना और विश्वबंधुत्व से जोड़ने की जरूरत है। आरबीएस कॉलेज में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में डॉ. आंबेडकर विवि की कुलपति प्रो. आशुरानी ने कहा कि वसुधैव कुटुम्बकम ही राष्ट्रवाद को व्यापक और मानवीय स्वरूप देने का उपाय है। साहित्य और सिनेमा देशभक्ति तथा स्वदेश प्रेम की भावना को जन-जन तक पहुंचाने के सशक्त माध्यम हैं।
साहित्य और सिनेमा में राष्ट्रवाद
कुलपति ऑथर्स गिल्ड ऑफ इंडिया, चैप्टर-आगरा के तत्वावधान में राव कृष्णपाल सिंह ऑडिटोरियम, आरबीएस कॉलेज में ‘राष्ट्रवाद के विविध आयाम: साहित्य और सिनेमा के विशेष संदर्भ में’ विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में बोल रही थईं। इसमें साहित्य, सिनेमा, संस्कृति और राष्ट्रवाद के बदलते स्वरूप पर विचार-विमर्श हुआ।
नीति-नियंताओं को जगानी होगी देशभक्ति
मुख्य अतिथि प्रो. आशुरानी ने कहा कि देश का भविष्य नीति-नियंताओं की राष्ट्रभक्ति तथा साहित्यकारों और फिल्म निर्माताओं की रचनात्मक दृष्टि पर भी निर्भर करता है। देशहित में नीति-नियंताओं को हृदय से स्वदेश प्रेम का प्रसार करना होगा।
अध्यक्षता करते हुए एजीआई महासचिव प्रो. एस.एस. अवस्थी ने कहा कि राष्ट्रवाद उन कार्यों में निहित है, जो स्वाध्याय और समाज के हित में किए जाते हैं। साहित्य और सिनेमा का उद्देश्य सकारात्मक तथा मानव कल्याणकारी होना चाहिए।
लोकमंगल के लिए सांस्कृतिक सरोकार
अति विशिष्ट अतिथि युवराज अम्बरीश पाल सिंह ने कहा कि हर परिस्थिति में देश के प्रति प्रेम की निरंतरता बनाए रखना जरूरी है। साहित्य, संगीत और सिनेमा इसके प्रभावी माध्यम हैं।
मुख्य वक्ता प्रो. प्रदीप श्रीधर ने कहा कि साहित्य और सिनेमा में राष्ट्रवाद को केंद्र में रखते हुए लोकमंगल के लिए सांस्कृतिक सरोकार विकसित करना समय की आवश्यकता है। कार्यक्रम संरक्षक एवं प्राचार्य प्रो. विजय श्रीवास्तव ने कहा कि अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठा भी राष्ट्रवाद का प्रतीक है।
स्वदेशी चेतना और भारतीय संस्कृति पर जोर
विशिष्ट वक्ता प्रो. सुनीता रानी घोष ने कहा कि भारत को विश्वगुरु बनाने के लिए स्वदेशी चेतना को मजबूत करना होगा। ब्रज और हिंदी सहित भारतीय भाषाओं का साहित्य देश की सांस्कृतिक चेतना को जीवंत बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
डॉ. मुकेश अग्रवाल ने कहा कि भारत की संस्कृति ही उसकी आत्मा और पहचान है। सशक्त राष्ट्र की परिकल्पना राष्ट्रप्रेम के आधार पर ही संभव है।
डिजिटल दौर में मौलिकता का संकट
बीज वक्ता प्रो. राजेश कुमार ने कहा कि डिजिटल दौर में साहित्य में मौलिकता कम और महत्वाकांक्षा अधिक दिखाई दे रही है। शॉर्टकट की प्रवृत्ति और सम्मान की होड़ के कारण रचनाकार अपनी लेखनी की मौलिकता खोता जा रहा है।
शोधपत्र संवाद और राष्ट्रीय कवि सम्मेलन
द्वितीय सत्र शोधपत्र संवाद के रूप में आयोजित हुआ। इसमें डॉ. राजेन्द्र मिलन, डॉ. एस.एस. अवस्थी, डॉ. युवराज सिंह, डॉ. सुषमा सिंह, रंजीत भदौरिया, डॉ. संदीप कुमार शर्मा, डॉ. सुरेश कुमार, डॉ. अंजली अवस्थी और श्रुति सिन्हा सहित विद्वानों ने शोधपत्र वाचकों के विचारों पर चर्चा की।
तृतीय सत्र में राष्ट्रीय कवि सम्मेलन हुआ। डॉ. शशि तिवारी, डॉ. मधु भारद्वाज, डॉ. शशि गोयल, डॉ. यशोयश, अशोक गोयल, डॉ. अशोक अश्रु, दुर्ग विजय सिंह, डॉ. सुषमा सिंह, रमा वर्मा, रेखा कक्कड़, आभा चतुर्वेदी, यशोधरा यादव, हरीश भदौरिया और शोधार्थी ममता पाल सहित कवियों ने रचनाओं का काव्य-पाठ किया। रचनाओं में राष्ट्रवाद, देशप्रेम और सामाजिक चेतना का संदेश प्रमुखता से उभरा।
प्रथम सत्र का संचालन डॉ. युवराज सिंह, द्वितीय का श्रुति सिन्हा और तृतीय का सुशील सरित ने किया। प्रारंभ में डॉ. ज्योत्सना शर्मा ने मां शारदे की वंदना की। डॉ. यशोयश और डॉ. सौरभ देवा ने अतिथियों का स्वागत किया। समापन पर मीडिया प्रभारी डॉ. यशोयश ने सभी अतिथियों, वक्ताओं, शोधपत्र वाचकों और कवियों के प्रति आभार व्यक्त किया।