पंजाब कांग्रेस में चन्नी-रंधावा की नई सियासी जुगलबंदी से बढ़ी हलचल, क्या 'ऑपरेशन वडींग' ने कांग्रेस हाईकमान को फिर उसी दुविधा में ला खड़ा किया, जो पांच साल पहले दिखी थी?
पंजाब कांग्रेस में प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वडींग और पूर्व मुख्यमंत्री चरनजीत सिंह चन्नी के बीच बढ़ती खींचतान अब नए राजनीतिक मोड़ पर पहुंचती दिखाई दे रही है। सुखजिंदर सिंह रंधावा का चन्नी गुट के साथ खड़ा होना और भाजपा में शामिल होने की चर्चाओं ने कांग्रेस की चिंता बढ़ा दी है। पांच वर्ष पहले कैप्टन अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू के बीच शुरू हुआ सत्ता संघर्ष जिस तरह पार्टी को भारी नुकसान पहुंचा गया था, मौजूदा हालात उसी दिशा की पुनरावृत्ति का संकेत देते नजर आ रहे हैं।
पंजाब कांग्रेस में अंदरूनी कलह लगातार गहराती जा रही है। पंजाब कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वडींग के खिलाफ पूर्व मुख्यमंत्री चरनजीत सिंह चन्नी द्वारा खोला गया मोर्चा अब व्यक्तिगत असहमति से आगे बढ़कर संगठनात्मक शक्ति प्रदर्शन का रूप लेने लगा है। चन्नी के साथ हुई बैठक में सात कांग्रेस विधायकों की मौजूदगी यह संकेत देती है कि असंतोष केवल बयानबाजी तक सीमित नहीं है, बल्कि उसे राजनीतिक समर्थन भी मिलने लगा है।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण पहलू वरिष्ठ नेता सुखजिंदर सिंह रंधावा का चन्नी गुट के साथ दिखाई देना है। रंधावा की हालिया गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात पहले ही राजनीतिक चर्चाओं को हवा दे चुकी थी। ऐसे में यदि वह खुलकर चन्नी के साथ खड़े दिखाई देते हैं तो कांग्रेस नेतृत्व के लिए यह महज गुटबाजी नहीं, बल्कि संभावित राजनीतिक पुनर्संरेखण का संकेत भी है।
इसी बीच कांग्रेस आलाकमान द्वारा विभिन्न गुटों में समन्वय स्थापित करने की कोशिशें भी शुरू हो चुकी हैं। छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को पंजाब भेजा जाना इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। हालांकि यदि चन्नी गुट उनसे भी दूरी बनाए रखता है तो यह संदेश जाएगा कि असंतोष अब केवल संवाद से शांत होने वाला नहीं है।
पंजाब की राजनीति पर नजर डालें तो मौजूदा हालात पांच वर्ष पहले के घटनाक्रम की याद दिलाते हैं। उस समय प्रदेश अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू ने तत्कालीन मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के खिलाफ मोर्चा खोला था। अंततः कैप्टन को मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा और उसी राजनीतिक उथल-पुथल के बीच चरनजीत सिंह चन्नी राज्य के पहले दलित मुख्यमंत्री बने। लेकिन कांग्रेस का यह प्रयोग विधानसभा चुनाव में पार्टी को सत्ता बचाने में सफल नहीं कर पाया।
उस समय भी कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष पर कांग्रेस नेतृत्व का हाथ था जबकि मौजूदा अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वडींग भी कांग्रेस के सर्वोच्च नेता राहुल गांधी के भरोसेमंद हैं।
आज परिस्थितियां अलग होते हुए भी कई मायनों में समान दिखाई देती हैं। फर्क केवल इतना है कि इस बार संघर्ष मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष के बीच नहीं, बल्कि पूर्व मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष के बीच है। लेकिन परिणाम यदि संगठनात्मक टूट के रूप में सामने आता है तो उसका असर आगामी चुनावी राजनीति पर भी पड़ सकता है।
कांग्रेस नेतृत्व के सामने सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती संतुलन बनाने की है। यदि राजा वडींग को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाया जाता है तो जाट सिख मतदाताओं में गलत संदेश जाने का जोखिम रहेगा, क्योंकि वडींग को इसी सामाजिक और राजनीतिक वर्ग का प्रतिनिधि माना जाता है। वहीं यदि उन्हें पद पर बनाए रखा जाता है तो चरनजीत सिंह चन्नी जैसे बड़े दलित चेहरे के अलग राह पकड़ने या पार्टी से दूरी बनाने की आशंकाएं भी पार्टी के लिए बड़ा संकट पैदा कर सकती हैं।
यह समीकरण इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पंजाब में दलित आबादी लगभग 30 प्रतिशत मानी जाती है। ऐसे में चन्नी केवल एक पूर्व मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि कांग्रेस के सबसे प्रभावशाली दलित नेताओं में से एक हैं। यदि उनके भविष्य को लेकर उठ रही भाजपा में जाने की अटकलें सच साबित होती हैं तो कांग्रेस को राजनीतिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है।
फिलहाल चन्नी के भाजपा में शामिल होने की चर्चाओं की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन लगातार उठ रहे सवाल, नेताओं की गतिविधियां और बढ़ती गुटबाजी यह संकेत जरूर दे रही हैं कि पंजाब कांग्रेस एक निर्णायक दौर से गुजर रही है। यदि समय रहते कांग्रेस आलाकमान ने संगठनात्मक संकट का समाधान नहीं निकाला तो पांच वर्ष पहले की राजनीतिक उथल-पुथल एक बार फिर पार्टी के सामने खड़ी हो सकती है।