चार पुलिसकर्मियों पर एफआईआर के आदेश को पुलिस की चुनौती, सत्र न्यायालय में पहुंचा मामला
सिकंदरा थाने में महिला से कथित मारपीट के मामले में चार पुलिसकर्मियों पर मुकदमा दर्ज करने के आदेश के खिलाफ पुलिस सत्र न्यायालय पहुंची। राज्य पक्ष ने अधीनस्थ न्यायालय के आदेश को विधि विरुद्ध बताते हुए निरस्त करने की मांग की। डीजीसी फौजदारी ने छह जून को पारित आदेश को चुनौती देते हुए रिवीजन याचिका दाखिल की। महिला के मेडिकल परीक्षण में तीन अतिरिक्त चोटें मिलने के आधार पर अधीनस्थ न्यायालय ने मुकदमा दर्ज करने का आदेश दिया था। पीड़िता पक्ष ने जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगा, जिस पर जिला जज ने अगली सुनवाई 11 जून तय की।
आगरा। आगरा के सिकंदरा थाना क्षेत्र में महिला से कथित मारपीट के मामले में नया कानूनी मोड़ आ गया है। अधीनस्थ न्यायालय द्वारा चार पुलिसकर्मियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने के आदेश को चुनौती देते हुए पुलिस और राज्य पक्ष सत्र न्यायालय पहुंच गए हैं। मामले को लेकर दाखिल की गई रिवीजन याचिका पर जिला जज की अदालत में सुनवाई हुई।
राज्य सरकार की ओर से प्रस्तुत पक्ष में कहा गया कि अधीनस्थ न्यायालय द्वारा छह जून को पारित किया गया आदेश विधि सम्मत नहीं है और उपलब्ध तथ्यों व कानूनी प्रावधानों के अनुरूप नहीं माना जा सकता। इसी आधार पर आदेश को निरस्त किए जाने की मांग की गई है।
गौरतलब है कि यह मामला उस समय चर्चा में आया था जब एक महिला ने सिकंदरा थाने में तैनात पुलिसकर्मियों पर मारपीट और अभद्र व्यवहार के आरोप लगाए थे। मामले में महिला का मेडिकल परीक्षण कराया गया, जिसमें पूर्व में दर्ज चोटों के अतिरिक्त तीन अन्य चोटें भी पाई गईं। मेडिकल रिपोर्ट को महत्वपूर्ण आधार मानते हुए अधीनस्थ न्यायालय ने संबंधित चार पुलिसकर्मियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने का आदेश दिया था।
इस आदेश के बाद राज्य पक्ष की ओर से डीजीसी (फौजदारी) ने सत्र न्यायालय में रिवीजन याचिका दाखिल कर आदेश को चुनौती दी। सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि अधीनस्थ न्यायालय का निर्णय तथ्यों और कानून की कसौटी पर पुनर्विचार योग्य है।
वहीं, पीड़िता पक्ष की ओर से अदालत में जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगा गया। अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद मामले की अगली सुनवाई 11 जून की तिथि पर निर्धारित कर दी। अब सभी की नजरें आगामी सुनवाई पर टिकी हैं, जहां पीड़िता पक्ष अपना विस्तृत जवाब दाखिल करेगा और अदालत यह तय करेगी कि अधीनस्थ न्यायालय का आदेश बरकरार रहेगा या फिर उसे निरस्त किया जाएगा। यह मामला पुलिस जवाबदेही और न्यायिक प्रक्रिया के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।