रिवर कनेक्ट कैंपेन का सवाल- क्या यमुना जी से हमारा मोह भंग हो गया है?

आगरा शहर में कभी यह स्थान आस्था का दीप था। कभी यहां हर संध्या यमुना मैया के जयकारों से गूंज उठती थी। कभी यहां की सीढ़ियां श्रद्धालुओं के कदमों से आबाद रहती थीं। आज वही यमुना आरती स्थल वीरान आंखों से अपनी बदहाली का मंजर देख रहा है।

Jun 24, 2026 - 20:08
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रिवर कनेक्ट कैंपेन का सवाल- क्या यमुना जी से हमारा मोह भंग हो गया है?
आगरा में यमुना आरती स्थल के पास यमुना की तलहटी में पड़ी गंदगी।

आगरा। आगरा के यमुना आरती स्थल को भव्य स्वरूप देने के लिए वर्षों तक अथक प्रयास हुए। अनेक यमुना सेवकों ने अपना समय, श्रम और प्रेम लगाया। पूर्व नगर आयुक्त अंकित खंडेलवाल ने तो मानो इस क्षेत्र की काया ही पलट दी थी। आरती स्थल से लेकर लड्डू गोपाल मोड़ तक का पूरा इलाका एक जीवंत सांस्कृतिक परिसर बन गया था। स्वच्छता थी, सौंदर्य था, व्यवस्था थी और सबसे बढ़कर यमुना के प्रति सम्मान था। लेकिन आज उस सपने की तस्वीर धुंधली पड़ती जा रही है।

रिवर कैंपेन सदस्य बृज खंडेलवाल,डॉ देवाशीष भट्टाचार्य, पंडित जुगल किशोर, गोस्वामी नंदन श्रोत्रिय, अभिनव लाला, डॉ हरेंद्र गुप्ता, चतुर्भुज तिवारी,पद्मिनी अय्यर, डॉ ज्योति खंडेलवाल, विशाल झा  राहुल राज, दीपक राजपूत, निधि पाठक, जगन प्रसाद तेहरिया, दिनेश शर्मा, शहतोष गौतम ने संयुक्त बयान में कहा है कि जहां कभी आरती की घंटियां बजती थीं, वहां अब कूड़े के ढेर दिखाई देते हैं। जहां श्रद्धालु बैठकर यमुना दर्शन करते थे, वहां भैंसों का जमावड़ा है। सीढ़ियां गंदी हैं, परिसर उपेक्षित है और सफाई व्यवस्था मानो कहीं खो गई है। ऐसा लगता है जैसे इस स्थल को उसके हाल पर छोड़ दिया गया हो।

रिवर कनेक्ट अभियान ने बार-बार नगर निगम का ध्यान इस ओर आकर्षित किया। अधिकारियों को पत्र लिखे गए। निवेदन किए गए। भाजपा के जनप्रतिनिधियों और नेताओं तक भी बात पहुंचाई गई। लेकिन नतीजा सिफर रहा। आश्वासन मिले, मगर हालात नहीं बदले।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर ऐसा क्यों? क्या यमुना केवल उत्सवों और तस्वीरों तक सीमित रह गई हैं? क्या यमुना के प्रति हमारी संवेदनाएं केवल भाषणों तक सिमट गई हैं? क्या सचमुच हमारा मोह भंग हो गया है?

यह केवल एक आरती स्थल की दुर्दशा नहीं है। यह हमारी सामूहिक उदासीनता का आईना है। यह बताता है कि हम विरासत को संवारने में जितने उत्साहित होते हैं, उसे संभालने में उतने ही लापरवाह हो जाते हैं।

यमुना सेवकों की वेदना केवल शिकायत नहीं है। यह एक पुकार है। यह उस नदी के सम्मान की पुकार है जिसने सदियों से आगरा को पहचान दी, संस्कृति दी और जीवन दिया।

आज यमुना आरती स्थल मानो खामोश खड़ा पूछ रहा है—"क्या मेरी सुध लेने वाला कोई नहीं बचा?"

नगर निगम, जनप्रतिनिधियों और समाज के जागरूक नागरिकों को इस प्रश्न का उत्तर देना होगा। क्योंकि यदि हम अपनी आस्था के प्रतीकों को भी नहीं बचा सके, तो आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी।

यमुना आज भी बह रही हैं। उनकी धारा में वही करुणा है, वही वात्सल्य है। बदल गया है तो केवल हमारा रवैया। और यही सबसे बड़ा दुःख है।

SP_Singh AURGURU Editor