राघव चड्ढा ने आप छोड़ी, विपक्ष में सन्नाटा, केजरीवाल की राजनीति को झटका, आगे की रणनीति बना रहे केजरीवाल
जिस समय केजरीवाल पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी, तमिलनाडु में एम.के. स्टालिन और गुजरात में विपक्षी ताकतों को जीत दिलाने का अटूट वचन दे रहे थे, उसी दौरान उनके सबसे भरोसेमंद 'सिपहसालार' राघव चड्ढा ने पार्टी छोड़ दी। दूसरों की नैया पार लगाने चले थे अरविंद, खुद की आम आदमी पार्टी ही बीच मझधार के भवंर में फंस गई है। घर की इस आग ने पूरे विपक्षी खेमे को हिलाकर रख दिया है। केजरीवास अब आगे की रणनीति बनाने में जुट गए हैं।
नई दिल्ली। बंगाल चुनाव 2026 के पहले चरण की स्याही अभी मतदाताओं की उंगलियों से सूखी भी नहीं थी कि दिल्ली से उठी सियासी चिंगारी ने कोलकाता तक हड़कंप मचा दिया है। 23 अप्रैल को 152 सीटों पर वोटिंग के बाद, जब विपक्ष अपनी जीत के दावे कर रहा था, तभी केजरीवाल के सबसे भरोसेमंद राघव चड्ढा ने ‘आप’ को अलविदा कह दिया है। अब सवाल यह है कि 29 अप्रैल को होने वाले दूसरे चरण के मतदान पर इसका क्या असर पड़ेगा? क्या केजरीवाल की यह ‘घरेलू आग’ ममता बनर्जी के ‘मिशन बंगाल’ को झुलसा देगी? बंगाल में दीदी और तमिलनाडु में स्टालिन को साथ देने वाले केजरीवाल अब क्या अपना वचन पूरा कर पाएंगे।
राजनीति की बिसात पर दूसरों को मात देने का हुनर रखने वाले अरविंद केजरीवाल आज खुद ‘चेक-मेट’ हो गए हैं। जिस वक्त केजरीवाल दिल्ली से लेकर बंगाल की खाड़ी तक विपक्षी गठबंधन का झंडा बुलंद कर रहे थे, ठीक उसी वक्त उनके सबसे भरोसेमंद सिपहसालार राघव चड्ढा ने पार्टी छोड़ दी। यह खबर सिर्फ एक नेता के जाने की नहीं है, बल्कि उस भरोसे की है जिसने आम आदमी पार्टी की नींव रखी थी। इस खबर ने राजनीति के गलियारों में वो सुनामी ला दी है, जिसने केजरीवाल के दिल और दिमाग दोनों को झटका तो दिया ही होगा। सरल भाषा में कहे तो दूसरों की नैया पार कराने की कोशिश करने वाले अरविंद केजरीवाल के खुद का जहाज डूबने की कगार पर है। या यूं कहे कि मुसीबतों के दौर में हैं।
केजरीवाल ने हाल ही में बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को फोन कर यह वादा किया था कि ‘आप’ की पूरी ताकत उनके साथ खड़ी होगी। केजरीवाल ने ‘दीदी’ को जीत का वचन दिया था और संदेश दिया था कि वे भाजपा के खिलाफ उनके सबसे बड़े मददगार बनेंगे लेकिन विडंबना देखिए, जिस वक्त वे कोलकाता में दीदी की जीत की रणनीति बना रहे थे, उसी वक्त उनके अपने ही ‘वजीर’ ने दिल्ली में बगावत का झंडा गाड़ दिया। केजरीवाल जो दूसरों का घर बचाने चले थे, लेकिन उनकी अपनी सल्तनत में ही आग लग गई है।
केजरीवाल की राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाएं सिर्फ बंगाल ही नहीं तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन और गुजरात के विपक्षी मोर्चे तक फैली हुई थीं। केजरीवाल ने स्टालिन को भरोसा दिलाया था कि दक्षिण में ‘आप’ का युवा चेहरा उनके पक्ष में लहर पैदा करेगा। गुजरात में भी केजरीवाल भाजपा विरोधी वोटों को एकजुट करने का दम भर रहे थे. मगर अब, जब राघव चड्ढा ने ही साथ छोड़ दिया है, तो केजरीवाल का वह ‘सपोर्ट’ खोखला नजर आने लगा है। विपक्षी नेताओं के बीच अब यह चर्चा आम होगी कि जो अपने दाहिने हाथ को नहीं संभाल सका, वह दूसरों का साथ क्या खाक निभाएगा?
जैसे ही राघव के पार्टी छोड़ने की खबर वायरल हुई, विपक्षी खेमे में सन्नाटा पसर गया। ममता बनर्जी और स्टालिन जैसे दिग्गज नेता अब केजरीवाल की राजनीतिक स्थिरता को लेकर संशय में हो सकते हैं। मीडिया में छपी खबर के मुताबिक, इस घटना ने यह मैसेज दिया है कि केजरीवाल की पकड़ अपनी ही पार्टी पर ढीली हो गई है। जब घर का सबसे प्रमुख स्तंभ ढह जाए, तो बाहरी गठबंधन की इमारत का गिरना तय माना जाता है। केजरीवाल ने जो ‘किंगमेकर’ इमेज बनाई थी, उसे राघव की इस बगावत ने पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है।