ताजमहल के हर रूप को कैमरे में कैद किया था रघु राय ने, आगरा में महीनों रह कर की थी फोटोग्राफी, चार किलो वजन की है 160 पृष्ठ की उनकी पुस्तक
विख्यात छायाकार रघु राय ने ताज महल को केवल एक स्मारक नहीं, बल्कि बदलते मौसम, रोशनी और मानवीय जीवन के साथ एक जीवंत चरित्र के रूप में कैमरे में उतारा। 1980 के दशक में आगरा में रहकर उन्होंने ताज और उसके आसपास के जीवन को गहराई से कैद किया। उनकी 160 पृष्ठों की पुस्तक (1997) आज भी उनकी दृष्टि और संवेदनशील फोटोग्राफी का प्रमाण मानी जाती है।
आगरा। भारत की दृश्य-संस्कृति को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने वाले विख्यात छायाकार रघु राय आज नहीं रहे, पर अपने द्वारा ताजमहल की ली गईं तस्वीरों में वे हमेशा जीवित रहेंगे।
रघु राय ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के फोटोग्राफर थे। अंतरराष्ट्रीय स्तर की फोटोग्राफी की, लेकिन उनका मन तो ताजमहल पर ही लगा था। सन् 1980 में उन्होंने आगरा में प्रवास किया। उन दिनों ताजमहल की कोई सुरक्षा भी नहीं थी। वहीं फोटोग्राफी के लिए कोई संसाधन भी नहीं थे। बताते हैं कि ताजमहल में चारपाई पर ही पड़े रहते थे और तरह-तरह के मौसम और मौकों की तलाश में रहते। उन्होंने कई साल तक यहां रह कर ताजमहल और उसके आसपास के इलाकों के लुभावने क्षणों को कैद किया गया है।
रघु राय ने ताजमहल को सिर्फ “सुंदरता” के फ्रेम में कैद नहीं किया, बल्कि उसे बदलते मौसम, रोशनी और मानवीय गतिविधियों के साथ देखा। उनकी तस्वीरों में कभी धुंध में लिपटा ताज एक रहस्य जैसा दिखता है, तो कभी सुबह की पहली किरणों में वह आशा का प्रतीक बन उठता है। यह दृष्टि बताती है कि ताज उनके लिए एक स्थिर इमारत नहीं, बल्कि समय के साथ संवाद करता जीवंत चरित्र है।
रघु राय की दृष्टि केवल ऐतिहासिकता तक सीमित नहीं रहती। वे शहर के आम जीवन—गलियों, बाजारों, पर्यटकों और स्थानीय लोगों के बीच के उस संबंध को पकड़ते हैं, जहाँ इतिहास और वर्तमान एक साथ सांस लेते हैं। उनकी तस्वीरें यह एहसास कराती हैं कि ताजमहल केवल प्रेम का प्रतीक नहीं, बल्कि एक ऐसा केंद्र है जिसके इर्द-गिर्द पूरा शहर अपनी लय में चलता है।
रघु राय का फोटोग्राफी दर्शन “क्षण को पकड़ना” नहीं, बल्कि “क्षण में छिपे अर्थ को उजागर करना” था। यही कारण है कि जब वे ताजमहल को फ्रेम में लेते थे, तो उसमें सिर्फ संगमरमर नहीं, बल्कि भावनाओं, इतिहास और मानवीय संवेदनाओं की परतें भी उभरती थीं। आज, जब लाखों तस्वीरें हर दिन ताजमहल की ली जाती हैं, रघु राय की छवियाँ हमें यह याद दिलाती हैं कि असली फोटोग्राफी कैमरे से नहीं, दृष्टि से जन्म लेती है। और यही दृष्टि ताज और आगरा को एक नए, गहरे और मानवीय रूप में हमारे सामने लाती है।
रघु राय ने जो चित्र लिये, उसकी उन्होंने 160 पृष्ठों की एक पुस्तक तैयार की थी, जिसे टाइम्स बुक ने सन् 1997 में प्रकाशित किया था। चार किलोग्राम वजन की यह पुस्तक देश के अनेक विख्यात लाइब्रेरियों में उपलब्ध है। आगरा के अधिकांश होटल्स, एम्पोरियम में भी देशी-विदेशी सैलानियों के लिए यह पुस्तक रखी रहती है, जो उनके आकर्षण का केंद्र होती है।Top of Form
-प्रस्तुति-आदर्श नंदन गुप्ता, वरिष्ठ पत्रकार