समझदारी से हल हो सकता है आरक्षण का मुद्दाः जरूरत है एक व्यावहारिक राह की
जाति-आधारित भेदभाव आज भी हिंदू समाज में गहराई से मौजूद है। आरक्षण अनिश्चितकाल तक जारी नहीं रह सकता और विवाह-नीति जैसे व्यावहारिक समाधानों से समाज में समरसता लाई जा सकती है। उद्देश्य यह होना चाहिए कि आरक्षण विवाद बिना संघर्ष के खत्म होकर समानता और एकता की राह खोले।
-डॊ. (लेफ्टिनेंट कर्नल) राजेश चौहान-
कुछेक दिन पहले एक आईएएस अफसर ने आम सभा में सरेआम कुछ ऐसा कहा कि पूरा देश मानो स्तब्ध रह गया था। संतोष वर्मा नाम के इस व्यक्ति ने जो कुछ कहा, वह दोहराना भी ठीक न होगा। कहा ही कुछ ऐसा था, जिससे आम जन भावनायें व्यथित और उत्तेजित हुईं। इस कथन के पीछे आरक्षण को अनंत समय तक बदस्तूर चलाये रखने का भी ऐलान था। बात वहीं पहुंचा दी गई, जहां न नौ मन तेल होगा, और फिर कैसे भला राधा नाचेंगी?
वर्ण व्यवस्था भारत के लिए एक अभिशाप है। ऐसा नहीं कि हमेशा से ही ऐसी ही वर्ण व्यवस्था चली रही हो। कदापि नहीं। महाभारत काल के वेद व्यास ऋषि के विषय में कौन नहीं जानता होगा? बोलें तो, यदि वे न होते, तो नियोग विधि द्वारा अपनी मातेय मत्स्यगंधा के आदेश से न फिर धृतराष्ट्र होते, और न पाण्डु। तब न कौरव ही होते, और न एक भी पांडव। वेद व्यास एक मत्स्य कन्या के पुत्र थे, जिनके पिता ब्राह्मण श्रेष्ठ पराशर ऋषि माने जाते हैं। बोले तो, गीता में भी वर्णशंकर का उल्लेख है।
ऋषि माना गया है वेद व्यास को। परन्तु न जाने कब और किन हालातों में जाति प्राथमिकता से जन-मन में बसती चली गई। हालांकि भगवान परशुराम ने एक बार ही नहीं, बल्कि 21 बार समस्त क्षत्रियों का संहार किया और उनका धन, राज्यपाठ, और जायदाद ब्राह्मणों में बांटते रहे। क्षत्रिय कुल से जैन धर्म के भगवान महावीर जी और बौद्ध धर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध जी हुए, जो समस्त मानवता को एक ही दृष्टि से देखते और समझते थे। उनके हिसाब से कोई भेदभाव नहीं था। सिख धर्म के अधिकतर गुरु क्षत्रिय/खत्री थे। और सिख धर्म भी भेदभाव और जाति-पाती में कभी फर्क नहीं करता। यह धर्म बने ही इसी वजह से थे कि इंसानियत की पहचान हो, और जाति-पाती का भेद हमेशा के लिए मिटे। ईसाई धर्म और इस्लाम में भी कोई जात-पात का भेद नहीं है।
कहें तो यदि कहीं भेदभाव बचा है, तो वह हिन्दू धर्म में। अंग्रेजों के समय में मैसूर और दक्खन के कुछेक अन्य इलाकों में 1910 के आसपास आरक्षण देने का क्रम शुरू हुआ। इतिहास बताता है कि उसके नतीजे देखने समझने के बाद भारत रत्न डॉ. भीमराव अम्बेडकर आरक्षण के विरुद्ध थे। यह बात उनके एक अभिन्न मित्र ने ही बताई है। काफी समझाने के बाद वे तैयार हुए आरक्षण के लिए, और वह भी केवल दस साल के लिए। यह तो सच है कि यदि वे जीवित रहते, तो दस साल में आरक्षण समाप्त हो सकता था।
परन्तु आरक्षण को खत्म न करने के पीछे की हकीकत को समझिए। जिनको आरक्षण मिल गया, उन्होंने पीढ़ी दर पीढ़ी उसे एक तरह से अपना जन्मजात अधिकार समझ लिया। वे अन्य पिछड़ों और दलित समुदाय के लोगों के लिए भी आरक्षण त्यागने को तैयार नहीं हैं, जिनको भारत की आजादी के बाद से तनिक भी आरक्षण का फायदा न मिला हो। अब आते हैं इन आईएएस महोदय की मनोकामना पर, जो चाहते हैं कि आरक्षण तब तक चलता रहे जब तक कि उनके बेटे का संबंध किसी ब्राह्मण कन्या से न हो जाए, या फिर शादी न हो जाए। सुरसा का मुख बढ़ता गया, और भी बढ़ता गया। परन्तु उसका मुख की भी एक सीमा थी, जिसे श्री हनुमान जी पहचान गये थे। परन्तु है क्या यहां कोई सीमा? श्री राम ने न केवल केवट को अपना अभिन्न मित्र समझा, बल्कि उन्हें गले भी लगाया। दलित शबरी के जूठे बेर श्रीराम ने कितने स्वाद से चखे। तब कोई जाति-धर्म का भेदभाव नहीं था। अब क्यों, किसलिए, और कब तक?
और अब बात कुछ मुद्दों की। क्या है सरकार या समाज, अथवा विचारकों की झोली में कोई आइडिया? जब इस तरह का आरक्षण दुनिया में कहीं और नहीं, तो भारत में क्यों, और कब तक?
एक विचार पर यदि समाज और देश ध्यान दे, तब शायद दो-तीन वर्षों में ही बात बन सकती है। न कोई झगड़ा-फसाद होगा, और न कोई मन-मुटाव। हमें कश्मीर से सीख लेनी चाहिए। वहां जमीन-जायदाद का हक केवल पुरुष को है, और उसे कश्मीर का बाशिंदा होना जरूरी है। यदि कश्मीरी कन्या किसी गैर-कश्मीरी से शादी कर ले, तो उसे अपना हक खोना पड़ता है।
यही एक पेच है, जिसमें ध्यान देने का समय आ गया है। आज SC–ST–OBC का लड़का किसी अन्य जाति-धर्म की बेटी से शादी कर ले, तो उसका आरक्षण का टिकट उसके बच्चों और पत्नी को भी मिलता है। परन्तु SC–ST–OBC की कन्या को यही बात लागू नहीं होती। बोले तो यदि एक सामान्य वर्ग के लड़के से एक SC–ST–OBC लड़की की शादी हो जाए, तब आरक्षण का लाभ उस सामान्य वर्ग के लड़के को नहीं मिलता। परन्तु यदि यह लाभ सरकार द्वारा अब से तत्काल सुनिश्चित कर दिया जाए, तब?
समाज देखेगा कि पिछड़े वर्ग और SC–ST–OBC की बेटियां सामान्य वर्ग के पुरुषों से शादी कर उन्हें आरक्षण का बहुमूल्य रत्न प्रदान कर सकेंगी। तब दो-तीन वर्षों में ही समस्त हिन्दू समाज एकधारा का हो चुका होगा और तब सभी को आरक्षण भी मिल सकेगा। या इस तरह से समझें कि क्या आरक्षण की होड़ फिर यूं ही बनी रहेगी? और इसका नतीजा होगा समाज से जात-पात का भेदभाव मिट जाना, जो अन्य किसी तरह से अब तक तो सम्भव नहीं हो पाया है। यदि गंगा की असंख्य धाराएं एक होकर गंगासागर में विलीन होना ही ध्येय समझें, तो ऐसे क्यों नहीं।
(लेखक "रायटर्स" द्वारा प्रमाणित हैं और कई पुस्तकों के लेखक हैं)