सड़क सुरक्षा: स्पीड लिमिटर, जीपीएस और पैनिक बटन पर 12 मई को सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई
आगरा/नई दिल्ली। देशभर में रोज सैकड़ों लोगों की जान लेने वाली सड़क दुर्घटनाओं पर अब न्यायपालिका सख्त रुख में नजर आ रही है। सार्वजनिक वाहनों में स्पीड लिमिटर, जीपीएस ट्रैकर और पैनिक बटन जैसे जरूरी सुरक्षा उपकरणों को अनिवार्य रूप से लागू कराने के मुद्दे पर 12 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई होने जा रही है। साथ ही राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा बोर्ड के गठन पर भी बड़ा फैसला संभव है, जिससे करोड़ों यात्रियों की सुरक्षा सीधे जुड़ी हुई है। यह सुनवाई आगरा के वरिष्ठ अधिवक्ता व सड़क सुरक्षा कार्यकर्ता केसी जैन की तीन महत्वपूर्ण याचिकाओं पर होगी, जिन्हें 9 अप्रैल 2026 को कोर्ट ने सूचीबद्ध किया था। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन की पीठ करेगी।
आम यात्री की जान क्यों दांव पर?
अधिवक्ता केसी जैन कहते हैं, कल्पना कीजिए- आप एक बस में सफर कर रहे हैं, ड्राइवर थका हुआ है, बस तेज रफ्तार में है और न तो कोई स्पीड कंट्रोल है, न जीपीएस, न पैनिक बटन। हादसे या किसी आपराधिक घटना की स्थिति में आपकी मदद के लिए कोई तंत्र मौजूद नहीं। यही हकीकत आज भी देश के करोड़ों यात्रियों की है।
पहला मुद्दा: स्पीड गवर्नर- कानून कागजों तक सीमित
केसी जैन एडवोकेट के अनुसार, केंद्रीय मोटर वाहन नियम, 1989 के नियम 118 के तहत हर सार्वजनिक वाहन में स्पीड लिमिटिंग डिवाइस लगाना अनिवार्य है। इसके बावजूद हालात बेहद चिंताजनक हैं।
केंद्र सरकार को पहले ही कोर्ट ने राज्यों से रिपोर्ट लेकर जुलाई 2025 तक हलफनामा दाखिल करने को कहा था, लेकिन पेश की गई रिपोर्ट अधूरी और असंतोषजनक पाई गई। अब इस मामले (आईए संख्या 77921/2024) पर 12 मई को फिर सुनवाई होगी।
चौंकाने वाली बात यह है कि देश में 2.18 करोड़ परिवहन वाहनों में से केवल 10.70 लाख (महज 4.9%) में ही स्पीड गवर्नर लगे हैं। यानी करीब 95% वाहन बिना किसी गति नियंत्रण के सड़कों पर दौड़ रहे हैं।
दूसरा मुद्दा: जीपीएस और पैनिक बटन- महिलाओं की सुरक्षा अधर में
श्री जैन ने बताया कि निर्भया कांड के बाद सरकार ने सभी सार्वजनिक वाहनों में पैनिक बटन और जीपीएस लगाने की बात कही थी। मोटर वाहन नियम 125H इसे अनिवार्य भी बनाता है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि आज भी बड़ी संख्या में बसों, टैक्सियों और यहां तक कि ऐप-आधारित सेवाओं जैसे Ola और Uber में यह व्यवस्था पूरी तरह लागू नहीं है। ऐसे में महिलाओं, बच्चों और आम यात्रियों की सुरक्षा भगवान भरोसे बनी हुई है।
तीसरा मुद्दा: राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा बोर्ड- अब तक अधूरा सपना
मोटर वाहन अधिनियम 1988 की धारा 215बी के तहत राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा बोर्ड के गठन का प्रावधान है, जो सड़क सुरक्षा नीतियों का समन्वय कर सकता है। कोर्ट ने अप्रैल 2025 में केंद्र से जवाब मांगा था, जिसके बाद मई 2025 में सरकार ने 6 महीने का समय लिया। लेकिन आज तक बोर्ड का पूर्ण गठन नहीं हो पाया है। अब 12 मई को इस पर भी जवाबदेही तय हो सकती है।
ओवरस्पीडिंग है मौत का सबसे बड़ा कारण
परिवहन मंत्रालय के आंकड़े बेहद डराने वाले हैं। 2019 से 2023 के बीच 68% से 73% सड़क दुर्घटनाएं ओवरस्पीडिंग के कारण हुईं। 2023 में 3.28 लाख दुर्घटनाएं, 1.17 लाख मौतें हुईं। 2022 में 3.33 लाख दुर्घटनाएं और 1.19 लाख मौतें हुईं।
जब अधिकांश वाहनों में स्पीड कंट्रोल ही नहीं है, तो हादसों पर लगाम कैसे लगेगी?
केंद्र पर बढ़ा दबाव, 12 मई अहम
अब सुप्रीम कोर्ट के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सरकार कानून को जमीन पर उतार पाएगी या सड़क सुरक्षा सिर्फ कागजों तक ही सीमित रहेगी?
देश का हर नागरिक चाहता है कि सभी सार्वजनिक वाहनों में स्पीड गवर्नर अनिवार्य हो। जीपीएस और पैनिक बटन के बिना फिटनेस सर्टिफिकेट न मिले। राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा बोर्ड तुरंत गठित हो। 12 मई से पहले सच्ची अनुपालन रिपोर्ट पेश हो।
वरिष्ठ अधिवक्ता के.सी. जैन ने कहा कि स्पीड गवर्नर, जीपीएस और पैनिक बटन सिर्फ उपकरण नहीं, बल्कि करोड़ों यात्रियों की जिंदगी की सुरक्षा कवच हैं। गरीब मजदूर से लेकर छात्र तक, हर किसी की जान बराबर कीमती है।
अब फैसला ज़रूरी
यह मामला सिर्फ अदालत का नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति का है जो रोज सड़क पर चलता या सफर करता है। अब वक्त आ गया है कि कानून किताबों से निकलकर सड़कों पर दिखाई दे, वरना हर दिन सैकड़ों मौतें इसी लापरवाही की कीमत चुकाती रहेंगी।