आरटीआईः बीस वर्षों बाद भी अधूरी पारदर्शिता, लोक प्राधिकारियों की वेबसाइटें अब भी मौन

सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI Act) ने 20 वर्षों में लोकतंत्र को मज़बूत करने की दिशा में ऐतिहासिक योगदान दिया है, पर धारा 4(1)(बी) के अनुपालन, पारदर्शिता ऑडिट और वेबसाइटों पर स्वतः सूचना प्रकाशन में अब भी गंभीर कमी बनी हुई है, डिजिटल सुधारों के बावजूद पूर्ण पारदर्शिता का लक्ष्य अधूरा है।

Oct 12, 2025 - 12:45
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आरटीआईः बीस वर्षों बाद भी अधूरी पारदर्शिता, लोक प्राधिकारियों की वेबसाइटें अब भी मौन

-केसी जैन एडवोकेट-

आज स्वतंत्र भारत में बने सबसे महत्वपूर्ण कानूनों में से एक सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 ने अपनी 20 वर्षों की यात्रा पूरी कर ली है। यह कानून जनता को शासन की कार्यप्रणाली पर नजर रखने का अधिकार देता है, जिससे लोकतंत्र को सशक्त करने और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने में इसे एक मील का पत्थर माना गया है।

वर्ष 2023-24 में देश भर में केंद्रीय जन सूचना अधिकारियों को 17,50,863 आवेदन पत्र प्राप्त हुए। औसतन प्रत्येक अधिकारी को लगभग 5,000 आवेदन। यह आंकड़ा इस बात का प्रमाण है कि नागरिक इस कानून का व्यापक रूप से उपयोग कर रहे हैं, पर साथ ही यह भी दर्शाता है कि धारा 4(1)(बी) के तहत स्वतः प्रकटीकरण अब भी अधूरा है।

पारदर्शिता लोकतंत्र का स्तंभ - पर अनुपालन अब भी अधूरा

सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हर सार्वजनिक प्राधिकारी अपनी सभी महत्वपूर्ण सूचनाएं, नीतियां, निर्णय, वित्तीय विवरण और प्रक्रियाएं स्वतः अपनी वेबसाइट पर प्रकाशित करें। ऐसा होने पर जनता को सूचना प्राप्त करने के लिए अलग से आवेदन करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी और इससे अधिकारियों का कार्यभार भी कम होगा।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश और वास्तविकता का अंतर

यहां सुप्रीम कोर्ट की रिट याचिका सिविल सं. 990 वर्ष 2021 के निर्णय दिनांक 17 अगस्त 2023 का उल्लेख जरूरी है। यह वही याचिका थी जिसे उन्होंने (लेखक ने) स्वयं प्रस्तुत किया था और जिस पर तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चन्द्रचूड़ की अध्यक्षता वाली तीन-सदस्यीय पीठ ने निर्णय दिया।

कोर्ट ने यह निर्देश दिए थे कि सभी लोक प्राधिकारी धारा 4(1)(बी) का पालन करें। हर वर्ष पारदर्शिता ऑडिट कराएं। केंद्रीय व राज्य सूचना आयोग इस अनुपालन की सतत मॉनिटरिंग करें। इसके बाद भी स्थिति में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं हुआ है।

केंद्रीय सूचना आयोग की वार्षिक रिपोर्ट 2023-24 के अनुसार 2,298 पंजीकृत केंद्रीय लोक प्राधिकरणों में से मात्र 1,302 ने पारदर्शिता ऑडिट कराया, अर्थात केवल 56.65 प्रतिशत अनुपालन, और उनमें से भी अधिकांश विभाग ग्रेड सी, डी ई में रहे। यह जो बताता है कि वेबसाइटों पर सूचनाएं अधूरी या अनुपलब्ध थीं। राज्य स्तर पर स्थिति और भी खराब है।

ई-फाइलिंग और वर्चुअल सुनवाई - जनपहुंच की नई दिशा

मेरे द्वारा दायर की गई याचिकाओं से कई ऐतिहासिक बदलाव हुए हैं। रिट याचिका सं. 360 वर्ष 2021 (निर्णय 09.10.2023) के अनुसार अब देशभर के राज्य सूचना आयोगों में ई-फाइलिंग और वर्चुअल सुनवाई प्रारंभ हो चुकी है।

रिट याचिका सं. 1325 वर्ष 2020 (निर्णय 20.03.2023) के अनुसार सभी उच्च न्यायालयों में भी सूचना आवेदन पत्र और अपील की ई-फाइलिंग पोर्टल के माध्यम से संभव हुई है।

इन निर्णयों से नागरिकों को अत्यधिक सुविधा मिली है और डिजिटल पारदर्शिता की दिशा में भारत ने ठोस कदम बढ़ाया है।

विसंगतियां और सुधार की जरूरत

द्वितीय अपील में दस्तावेजों की अनावश्यक मांग की जाती है। अपील करते समय आयोगों द्वारा आवेदन पत्र, आदेश और साक्ष्य मांगे जाते हैं, जबकि ये सभी पहले से संबंधित लोक प्राधिकारी के पास उपलब्ध रहते हैं। इस विषय में भी मेरी एक जनहित याचिका संख्या 402 वर्ष 2024 सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।

वर्चुअल सुनवाई में असमानता

केंद्रीय सूचना आयोग में वर्चुअल सुनवाई हेतु एनआईसी के स्टूडियो तक जाना पड़ता है, जबकि राज्य आयोगों में यह सुविधा घर या कार्यालय से संभव है। इस विषय को लेकर भी मेरे द्वारा प्रस्तुत एक और रिट याचिका सिविल संख्या 580 वर्ष 2024 सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।

ऑनलाइन शुल्क जमा करने की समस्या

ऑनलाइन आवेदन करने पर अभिलेखों की प्रतिलिपि के शुल्क का भुगतान ऑनलाइन नहीं हो पाता, जबकि केंद्र सरकार ने इसकी अनुमति दी हुई है। कई बार लोक प्राधिकारी “थर्ड पार्टी सूचना” कहकर पारदर्शिता से बचने की कोशिश करते हैं, जो कानून की भावना के विपरीत है।

यदि लोक प्राधिकारी सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 4 के अंतर्गत अपने सभी अभिलेखों को स्वयं अपनी वेबसाइट पर सार्वजनिक नहीं करते, तो यह अधिनियम धीरे-धीरे अपनी प्रभावशीलता खो देगा। इस कानून का उद्देश्य यह था कि नागरिक को सूचना पाने के लिए आवेदन न करना पड़े - सूचना स्वतः उपलब्ध हो। हर विभाग को चाहिए कि वह अपनी वेबसाइट पर नियमित, अद्यतन और पूर्ण जानकारी प्रकाशित करे, और हर वर्ष पारदर्शिता ऑडिट कराना अनिवार्य बनाए।

मैं यह मानता हूं कि जब तक पारदर्शिता प्रशासन का स्वभाव नहीं बनेगी, तब तक सुशासन का सपना अधूरा रहेगा। मेरे द्वारा सूचना अधिकार अधिनियम के कार्यान्वयन को अधिक प्रभावी बनाने हेतु पांच याचिकाऐं दायर की गयीं जिसमें से 3 का निर्णय वर्ष 2023 में मेरे पक्ष में हो चुका है और 2 अन्य रिट याचिकाएं लम्बित हैं जिनमें नोटिस जारी किया जा चुका है।

SP_Singh AURGURU Editor